Lost Friends

Valentine’s day is over but  I suppose its hangover is still  on me. Relaxing  in my rocking  chair I drifted into a reminiscent mood and   several faces started dancing before my  eyes. These were the faces of people with whom I have lost touch over the past decades. They are lost in the labyrinth of life and  had become characters of a forgotten story . But  today when I started thinking about them every face became alive and  every memory associated with them was crystal clear. Each one of them had touched my life in their own unique  way.  They had shared my smiles, my tears and a certain period of my growing years and though I do not know where they are today  but I  wish them all the happiness  and every  success in their lives.  This post is a note of  gratitude to them

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Happy Valentine’s Day

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चारों तरफ़ वेलनटाइन डे की धूम है, हर जगह प्रेमीयों का हजूम है  और बाज़ार में गिफ्टस की बिक्री में बूम है। छोटी- मोटी गिफ्ट तो छोड़िए एक अदद मुसा गुलाब तक दो सौ से कम नहीं मिल रहा है। भला हो अंग्रेज़ों का, उनके कवि चौसर का और  सबसे ज्यादा इस सोशल मिडिया का जिसकी वजह से हम हिन्दोस्तानियों  को वेलनटाइन डे, रोज़ डे, टेडी बियर डे इत्यादि के बारे में पता चला।  हमारे यहां  हज़ारों अवतार है , ढेरों त्योहार है पर एक भी दिन प्यार के इज़हार के लिए मुकर्रर नही । पुराने ज़माने में लड़की को पहली बार गुलाब जयमाला में गुंथे हुए मिलते थे और दूसरी बार तब  जब  वो सफेद चादर ओड़ कर जमीन पर लेटती थी । टैडी- बियर तो हाथ में तब आता था जब गोद में कोई मुन्ना या मुन्नी खेलता था । खैर—-
                        छोड़ें कल की बातें कल की बात पुरानी
                      नए दौर में लिखेगें हम मिल कर नई कहानी।
कहावत है– जब जागो तभी सवेरा ।  आज मौका भी है और दस्तूर भी तो क्यों ना अपन लोग भी बहती गंगा में हाथ धो लें ,वैसै आप चाहें तो नहा मी सकते है। सब आपकी इच्छा शक्ति पर निर्भर है और रहा  सवाल हमारा , तो भई  दिमाग कहता है—
      
प्यार खुशगवार खुशबू  है
हर लम्हा बिखरने दे फिज़ायों में
वक्त की बंदिशों में इसे कैद न कर                                                                 
                                              और दिल की ज़ुबान में—‘

सिर्फ एहसास है यह रूह से महसूस करो
प्यार को प्यार ही रहने दो कोई नाम न दो।।

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मौन

      

कदाचित मन चाहे कुछ भी न बोलें
आँखों की खिड़की मरज़ी से खोलें 

ज़हन पर ना हो किसी रिश्ते का बोझ
अपनी रज़ा हो बस अपनी ही सोच ।
      
किसी को रिझाएं ना किसी को मनाएं
अपनी ही धुन पर अपनी लय सजाएं

छोड़ दे कुछ पल हर  साया साथ
हाथों में बस हो सिर्फ अपना ही हाथ ।

सुध बुध बिसराएं ना होश रहे खुद की
चलती फिरती काया लगे एक बुत सी

आज की चिन्ता ना खबर रखें कल की
खाली करें खुद को बेहद हो जाए हल्की

घड़ियों की बंदिश से हम होकर आज़ाद
मुलाकात करें खुद से कई बरसों के बाद

आँखें बंद कर लें पर दिखे सारी खुदाई
मौन की गूंज में दे मीठी अनहद सुनाई

शून्यता हो तन में शून्यता नख नख में
शून्यता हो मन में शून्यता रग रग में

शून्यता से उभरे एक शाश्वत अस्तित्व
रिक्तता को पाकर हम  हो जाएं तृप्त।।

                    

                    

बंद दरवाज़ा

दरवाज़े के बंद किवाड़ आवाज़ दे बुलाते हैं

अपनी सांकल खोलने को पल पल उकसाते हैं

चाह कर भी न क्यों ना  कर पाए  देहरी को पार

क्यों दिवार मांनिद बने हैं ये बंद लगते किवाड़

इन किवाड़ों के पीछे धुंधली यादें खड़ी हैं

अब तलक जिनकी छाप मेरे मन पर जड़ी हैं

काश खुला हो कोई खिड़की या झरोखा

जहां से आ रहा हो हवा का हल्का झोंका

वो झोंका जो उड़ा दे सारी हिचकिचाहट 

रगों में जगा दे थोड़ी सुगबुगाहट

वो झोंका जो खोले दरवाज़े के बंद पाट 

मुकम्मल  करा दे बस एक मुलाकात 










भूले-बिसरे किस्से-1

                 यात्राविवरण मैंने कभी नहीं लिखे। मुझे लगता था कि यात्रा अगर अनूप जी साइकिल यात्रा की तरह ज़रा वखरी टाइप की हो तभी लिखने में कुछ नवीनता हैवरना चटपट बस, कार, रेल या जहाज़ में बैठे और गंतव्य पर पंहुच कर घिसेपिटे पर्यटनस्थल देखकर उस पर बयानबाज़ी करना तो सरासर अधजल गगरी छलकत जाए के समान बचकाना और बेमाना है। परन्तु  उन्मुक्त जी, मनीष जी व अन्य चिट्ठाकारों के यात्रासंस्मरण पढ़कर  महसूस किया कि मेरी यह धारणा ही बचकानी और बेमानी है।

                अन्तरजाल पर और पर्यटनपुस्तकों में किसी स्थान के विषय में चाहे पूर्ण जानकारी मिल जाए पर उस स्थान का आँखों देखा हाल उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी पुस्तक को पढ़कर उसके विषय में बात करना या लिखना । इससे न केवल उस किताब/स्थान के बारे में अन्य लोगों के मन में दिलचस्पी पैदा होती है बल्कि जिन्होने उस किताब को पढ़ा होता है या वो स्थान देखा होता है उन्हें उस विषय से सम्बन्धित, दिमाग के पिछवाड़े वाले स्टोर में पड़ी, ढेरों बातें याद आ जाती है और विचारों की रेल सरपट दौड़ने लगती है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुया है। इसलिए अगली कुछएक पोस्ट में हम नारद पर पढ़ी यात्रायों के दौरान तरोताज़ा हुए किस्सों को आपके सामने रख रहे है। पहला किस्सा उन्मुक्त जी की गोआ यात्रा से सम्बन्धित है।

              जब उन्मुक्त जी अपनी गोआ की यात्रा और अपने होटल (Cicade-de-Goa) का सरस वर्णन कर रहे थे तो यकायक मेरी आँखों के सामने उस होटल के शेफ का चेहरा घूम गया था। अब आप कहेंगेलो जी यह भी क्या बात हुई उन्मुक्त जी तरणताल के किनारे लेटी सुन्दर कन्यायों से रूबरू करवा रहे थे और हमें खानसामा नज़र आ रहा था।। कितना डिफेक्टिव और लचर इमेजीनेशन है हमारा। पर आपने यह तो सुना ही होगाजाको जैसी भावना। उन्मुक्त जी उन्मुक्त है और हम ठहरे रसोईदार, हमारे तो लेख,किस्से, कविताएं भी सबको पकवान नज़र आते है और सच मानिए, हम उन्हें आपके लिए लिखते, मेरा मतलब है पकाते भी बड़ी शिद्दत से है। इसीलिए शायद बिकनी पहनी नार की जगह हमें लम्बी टोपी वाला ऱसोईदार दिखा।

हमारा रसोईदार यानि कि शेफ खाना बेहद बढ़िया और लज़ीज़ बनाता था और चीनी कमके अमिताभ के अनुसारसच्चे मायने में उच्चकोटि का कलाकार था। पाँच दिन हम उस होटल में रहे । रोज़ बुफेसकीम के तहत नाश्ता, लंच और डिनर मिला पर एक दिन भी मैन्यू में पकवानों को दोहराया नहीं गया। इतना ही नहीं वो रोज़ लंच पर कैरेमल ( भुनी,कड़ी शक्कर जिसका स्वाद लेमनड्राप की तरह होता है) से इतने खूबसूरत दृश्य बनाता था कि ऐसा प्रतीत होता था जैसे वे भूरे,रंगीन कांच से बने हो। कभी नाचता जोड़ा, कभी खजूर के पेड़ो से भरा जलज़ीरा तो कभी सुन्दर गुढ़िया। उसकी कला मुझे इतनी भाई कि मन हुया उसे मिलकर उसकी प्रशंसा करूं।

                       खाली तारीफ करना अच्छा नहीं लगा। परन्तु पाँच सितारा होटल के शेफ को 100-500 देना उसकी तौहीन करना था और इससे ज्यादा गाढ़ी कमाई मुफ्त में बाँटना ज़रा कष्टकारी। इसलिए जिन्दगी में पहली बार हमने कैसिनो जाने का विचार बनाया। सोचा बस पाँच सौ लगाएगें अगर जीते तो सारा माल शेफ का और हारे तो समझेगे हमने पाँच सौ का नोट उस पर वार दिया। उस रात हम तीन हज़ार जीते। अगले दिन शेफ से मिले, उसकी तारीफ की और इमानदारी से एक-एक हज़ार के तीन नोट दिए। जब उसको कैसिनो वाली बात बताई तो उसके दिल के भाव उसके चेहरे और उसकी आँखों में साफ ज़ाहिर थे। चेहरा मुस्कुरा रहा था पर आँखों में नमी थी। चुपचाप एक हज़ार का एक नोट उसने अपनी ऊपर की जेब में रखा ,टोपी उतार कर हाथ में ली और बोला— “मैम, अगर आप बुरा न मानें तो मैं दो हज़ार अपनी टीम में बांटना चाहूंगा क्योंकि मेरे प्रयास में उनकी मेहनत भी शामिल है। पर आपका यह एक नोट हमेशा मेरे दिल के करीब वाली जेब में रहेगा क्योंकि इसमें आपकी दुआ और मेरी किस्मत छुपी है। आपने मेरे लिए इतना सोचा, मुझे समझ नहीं आ रहा मै आपको कैसे थैक्य़ू कहूँ।मैंने हाथ मिलाने के लिए जो हाथ बड़ाया तो उसने अदब से झुक कर हाथ को चूमा और भरी आँखें लिए किचेन के भीतर चला गया।

                       मेरी यह पोस्ट नमन है उस कलाकार की कला एंव उसकी शालीनता के प्रति और धन्यवाद है उन्मुक्त जी को जिनके विवरण से इस किस्से को हवा मिली।

हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

हम भी उन्मुक्त जी की तरह भारत के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले एक आम भारतीए है। अपने कस्बे की गलियों में हम सालों से चप्पल चटका रहे है, हर मेहमान के संग खरीदो-फरोख्त करवा रहेे है और सड़कें नपवा रहे है, शायद इस कारण हमारे कस्बे के दरो दिवार हमें अच्छी तरह से जानने पहचानने लगे है और हम खुद को कुछ खास यानि कि व्यक्ति विशेष मानने लगे है।

आखिर क्यों न मानें। हमारे मुंह खोलने से पहले ही साड़ी वाला बज़ाज हमें देखते ही हल्के फुल्के रंगों की साड़ियों से रिझाता है और जूतेचप्पल वाला लोहील की सैंडिल पहनाता है। बेकरी पर ब्राऊनब्रेड पकड़ाई जाती है व मिष्ठानभन्डार पर लाल लाल कुरकुरी जलेबी सिकवाई जाती है। चाट वाला गोलगप्पों में खट्टी चटनी के संग मीठी चटनी मिलाता है, सब्ज़ी वाला रोज़ सब्ज़ी के संग फ्री में मिर्चाधनिया सरकाता है और राशन वाला चाय, साबुन, पेस्ट पर निकली नईनई स्कीमें दोहरता है। शहर भर में हमारा चेहरा ही हमारा क्रेडितकार्ड है।

अपने शहर की इस ज़र्रानवाज़ी को शीश धरे हम चैन की बंसी बजा रहे थे, अपने कस्बे की तलैया में मज़े से टर्रटर्रा रहे थे, उछलकूद मचा रहे थे कि एक दिन उड़ती उड़ती खबर हम तक आ पहुँची कि अपना लुड़कतापुड़कता, दुबलापतला, पिद्दी सा रुपया पहलवान हो गया है औऱ डालर के खिलाफ कुछ बलवान् हो गया है। नतीजन इस समय विदेशयात्रा करना लाभप्रद है क्योंकि विदेश यात्रा सस्ती हो गई है।

सैल(SALE) और सस्ता शब्द स्त्रियों को सदैव ही सम्मोहित करता है। सो बेबस हुए हम भी उसके आकर्षण में बंधे रुपए की पहलवानी भुनाने ट्रेवलएजेंट के द्वारे जा पहुँचे। मामला फायदे का था, अत: हमने अपने और पति के संगसंग दोनों बच्चों का भी टिकट बनवा लिया। सोचा बहती गंगा में उनको भी डुबकी लगवा दें और फारेनरिर्टन का जामा पहना दें। इस जादुई जामे से बच्चों के व्यकित्व में आए निखार की सुखद कल्पना करते हुए हम खुशी खुशी थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर की पन्दरह दिवसिए यात्रा पर निकल गए।

पराए देश में पावं रखते ही आँखें वहां की भव्यता की चकाचौंध से चुंधिया गई। परन्तु एक पराएपन का एहसास हर समय मन को मथने लगा। पराए लोग, पराई भाषा, पराया खानपान, पराया रहनसहन। चारों और व्याप्त इस पराएपन के शुष्क वातावरण में मुझे अपने शहर का अपनापन रह हर कर याद आने लगा और पल पल भारतीए होने का एहसास गहराने लगा। पहली बार यह महसूस हुया किसी भी साधारण से आम व्यक्ति को खास उसके जाननेपहचानने वाले आसपास के लोग बनाते है। यही लोग चाहे वो परिवार के हो, पड़ोस के हो, किसी नगर के हो या फिर देश के, व्यक्ति विशेष को एक पहचान देते है और बताते है कि वह फलां परिवार, फलां समाज ,फलां शहर, प्रदेश या देश का सदस्य है। यही पहचान अन्जान परिस्थितियों में उस व्यक्ति का संबल बनती है।

हमारी पहचान गली मुहल्ले में हमारे परिवार से, शहर में हमारे मुहल्ले से, प्रदेश में हमारे शहर से, देश में प्रांतप्रदेश से और विदेश में केवल हमारे देश से होती है। अपने देश में चाहे हम खुद को हिन्दू ,मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई,उत्तरी, पूर्वी, पश्चिमी या दक्षिणी भारतीय कहते है परन्तु देश के बाहर विदेशी धरती पर सब भेद भाव अपने आप मिट जाते है और हम सब भारतीय पुकारे जाते है। इसी भारतीयता के कारण दो अपरिचित, साधारण से आम भारत वासी अन्जाने देश में एक दूसरे के लिए, आत्मीय और कुछ खास हो जाते है क्योंकि दोनों की पहचान एक है, दोनों का समूह एक है, दोनों का देश एक है।

थाईलैंड में एक प्रोग्राम के दौरान इसी पहचान, इसी देशप्रियता का नज़ारा देखने को मिला। प्रोग्राम शुरू होने में थोड़ी देर थी इसलिए विभिन्न देशों का संगीत बारी बारी से बज रहा था। जिस देश का गीत बजता था उसके निवासी अपने देश के गीत पर ताली बजा कर अपने देशप्रेम का इज़हार करते थे। जैसे ही एक भारतीए गीत बजाया गया, पंडाल में मौजूद हर भारतीय ने न केवल ताली बजा कर ताल दी बल्कि सभी खड़े हो गए और सबने मिल कर गाना और नाचना शुरू कर दिया। शायद य़ह वहां मौजूद ढेर सारे भारतीयों का जोश और उत्साह था जिसे देख कर अगला गीत लगाया गयाये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का ,मस्तानों का। इस गीत पर तो खूब जम कर नाच हुया। भारतीए खड़े होकर झूम रहे थे और पंडाल में बैठे अन्य दर्शक ताली बजा कर ताल दे रहे थे। उस समय मुझे लगा कि उस विदेशी धरती पर हर एक आम भारतीए विशेष और महत्वपूर्ण हो गया है और वह विशेषता है हमारी भारतीयता।