कुम्भ मेला-तथ्य और भ्रान्तियां

बुद्धिजीवियों की यह खासियत है कि वे स्वंय को बहुत बुद्धिमान समझते है। जीवन की हर वास्तविकता को तर्क की कसौटी पर कसते है। हर गुत्थी बुद्धि के सहारे खोलते है, उसे विद्यमान ज्ञान की तुला पर तोलते है और जो तथ्य उनके परिभाषित माप दंडों के सीमित दायरे में नहीं आते, वे उनके प्रति तटस्थता या अविश्वास दिखाते है।

चार: किताबें पढ़ कर और एकदो डिग्रीयां बगल धर, मैं भी बुद्धिवाद के इस भाव से प्रभावित थी। यही कारण रहा कि सालों संगम तट के निकट रहने पर भी मैंने कभी अपने पापों को गंगा में धोने का यत्न नहीं किया, सोचा वैसे ही गंगा इतनी मैली है, काहे को उसका बोझ बढ़ाया जाए। माघ मेलों व कुम्भ मेलों में बाज़ार से निकली हूँ मगर खरीदार नहीं हूँ की तर्ज़ में कुछ देर को उपस्थिती लगाने तो अवश्य गई पर हर बार स्वांग रचाते साधु, शोर मचाते भौंपू, रिरीयाते भिखारी, बरगलाते पंडें और धक्कियाते पुलिस के डंडे देखकर, विरक्त हो लौट आई। मेरी बुद्धि यह समझने में असमर्थ थी कि कौन सी गुड़ की भेली वहां मौजूद है जिसकी चाहत में लोग चींटियों के समान एक दूसरे के पीछे कतार बांधे बड़ी तन्यमता से मीलों पैदल चले जा रहे है। किस सुख की आशा में वे जनवरी की कड़कती ठंडक में बर्फीले पानी में डुबकी लगा रहे है और एक माह तक कल्प वास का घोर कष्ट उठा रहे है।

दूर दराज़ से आई भक्तों की उस उफनती भीड़ के अन्धविश्वास पर मुझे तरस से अधिक गुस्सा आता क्योंकि उनके कारण महिनों पहले शहर में बिजली की कटौती बढ़ जाती और सड़के पुन: निर्माण के लिए खुद जाती। मेले के दौरान यात्रियों से पटी सड़के, रुका यातायात, मंहगी सब्ज़ियां, मेहमानों से भरा घर, डुबकी लगाने के चक्कर में गायब हुए नौकरमेरी उलझन को और बढ़ा देते। गंगानहान से लौटे लोगों से मैंने कई बार यह जानने की कोशिश की कि आखिर क्यों वे साल दर साल इस मेले की ओर खिंचे चले आते है। दिव्य तेज़ से दमकती आँखों को झपका सभी ने एक ही उत्तर दिया था— “ मेलाक्षेत्र में दो दिन रह कर देख लें आप स्वंय ही समझ जाएंगी।

पूंछ कटा भेड़िया सबकी पूंछ कटवाना चाहता हैइस ख्याल को खारिज करने में कई साल बीत गए। धीरे धीरे भीड़जनितकोफ्त एवं घबराहट पर जिझासा और उत्सुकता अधिक हावी हो गई और 2001 के कुम्भ में, तीन दिन के लिए, मेलाक्षेत्र में लगे एक कैम्प में रह कर, मैंने भी मुफ्त में बंटते अमृत को चखने का निश्चय किया। अमृत की आस और उसकी तलाश कैसी रही, यह बताने से पहले मैं कुम्भ मेले के विषय में आपको कुछ बताना चाहूँगी।

कुम्भ मेले का आयोजन इलाहाबाद(प्रयाग) में गंगायमुना और अदृश्य सरस्वती के संगमस्थल पर, उज्जैन में क्षिपरातीरे, नासिक में गोदावरी के तट पर और हरिद्वार में गंगाकिनारे किया जाता है। चारों स्थानों पर यह मेला तीन साल के अन्तराल पर बारीबारी लगता है. अर्थात एक स्थान विशेष पर इसका आयोजन बारह वर्ष में एक बार होता है। प्राचीन समय में साधु समाज को आपसी विचारविमर्श के लिए यह अन्तराल बेहद लम्बा लगता था, अत: 1837 में पहली बार हरिद्वार में छ: साल बाद होने वाले अर्द्धकुम्भ की शुरूवात की गई। प्रयाग में इसका आयोजन पहली बार 1940 हुया। 

प्रयाग में प्रत्येक वर्ष माघ में एक मेला और लगता है जो माघमेले के नाम से जाना जाता है व जिसे खींचतान कर मिनीकुम्भ कहा जा सकता है ।

कुम्भमेला किस स्थान पर, किस माह में, किस तिथी से आरम्भ होगा, इसका निर्णय सूर्य, चन्द्रमा और गुरू का विभिन्न राशियों में आवागमन के आधार पर किया जाता है। इन्हीं तीन ग्रहों की स्थिती विशेष के कारण इलाहाबाद में यह मेला माघ (Jan-Feb), हरिद्वार में फागुन और चैत्र (Feb-March-April), उज्जैन में बैसाख (May) और नासिक में श्रावण अर्थात जुलाई में लगता है।

केवल इन्हीं नगरों में कुम्भ का आयोजन क्यों होता है, इस तथ्य के पीछे एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि एक बार देवों और दानवों ने मिल कर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया। अनेकों अमुल्य व अतुल्य पदार्थों की प्राप्ति के पश्चात जब अमृतकुम्भ प्रगट हुया तो उस पर अधिकार जमाने के लिए देवों और दानवों में बारह वर्ष तक युद्ध चला। कुम्भ की छीन झपट के दौरान अमृत की कुछ बूंदे इन चार स्थलों पर गिरी। इसी अमृत की चाह में असंख्य लोग इन स्थलों की ओर खींचे चले आते है।

एक अन्य कथा यह भी है कि शंखासुर नामक एक राक्षस ने सागर की तलहटी से मिट्टी में रहने वाले जीवों ( दीमक) की सेना को वेदों को नष्ट करने भेजा। ज्ञान एंव शक्तिशाली मंत्रों के भंडार वेदों के नष्ट होते ही देवों की शक्ति क्षीण हो गई और असुरों से हार कर वे कैलास पर्वत पर जा छुपे। देवों के हारने से चारों ओर अराजकता छा गई । नैतिकता का नाश हो गया,अनाचार फैल गया और धरती पर हाहाकार होने लगी। इस स्थिती से व्यथित हो ऋृषियों और मुनियों ने भगवान् विष्णु से उद्धार करने की गुहार लगाई। विष्णु जी ने मुनिजगत् को कहा–” आप सब मिलकर अपनी शक्तियों को केन्द्रित करें और ध्यान पूर्वक एकचित्त हो कर वेदों का पुन: निर्माण करें। जब आपका कार्य समाप्त हो जाए तो प्रयाग जाकर संगमतट पर मेरा इंतज़ार करें। मैं समस्त देवों को लेकर आप से वहीं मिलूंगा।

मुनिगण विष्णू जी के आदेश के पालन में जुट गए। इस दौरान विष्णु जी ने एक बड़ी मछली का रूप धारण कर शंखासुर को मार डाला और देवों की मदद से असुरों की सेना को हरा दिया। तदोपरांत वे ब्रह्मा, शिव और सभी देवों को लेकर प्रयाग पहुँचे। यहां पर पुन:निर्मित हुए वेदों के ज्ञान को सम्पूर्ण जगत् के हित में प्रयोग करने केलिए उन्होंने अश्वमेघ यज्ञकिया जो बारह वर्ष तक चलता रहा। यज्ञ समाप्ति पर मुनियों ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे भविष्य में हर बारहवें वर्ष एक माह के लिए प्रयाग में सभी देवों सहित अवतरित हो। विष्णु जी ने प्रार्थना स्वीकार की और प्रयाग को तीरथराज की उपाधि दी तथा कहा कि संगम तट पर ध्यानअर्चना में बिताया गया एक दिन अन्य स्थानों पर कमाए गए दस सालों के पुण्य के समान होगा।

इन कथायों की सच्चाई प्रामाणित करना कठिन है परन्तु इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि अन्य तीन नगरों में आयोजित होने वाले कुम्भ की अपेक्षा जमा देने वाली सर्दी के बावजूद इलाहाबाद के कुम्भ में श्रृद्धालुयों का जमावाड़ा अधिक होता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सगंम तट पर भीड़ जुटने के लिए विस्तृत खाली स्थान आसानी से उपलब्ध है। यहाँ के कुम्भ के विराट स्वरूप का अंदाज़ा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि 20 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक के इलाके में बसी तम्बूयों की इस नगरी के प्रशासन के लिए अलग से प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाते है। आवागमन के लिए रेत पर इस्पात की चादरें डाल कर लगभग1850 किलोमीटर लम्बी सड़कें बनाई जाती है। हस्पताल, फायरब्रिगेड, दूर दराज से आई दुकानों, बांस और कनात से बने मकानों, फोल्कथेयटर, सरकस इत्यादि सभी सुविधायों से युक्त इस कुम्भ नगरी में जनसख्यां समान्य दिनों में दस लाख और शाहीस्नान के दिन एक करोड़ तक पहुंच जाती है। नीचे दिखाई गई तस्वीरे इस नगर की भव्यता का अंश मात्र चित्रित कर रही है। पहली फोटो में गंगा पर बने पीपों (पोन्टून)के पुलों पर और दूसरी में संगम तट पर लोगों की भीड़ दिख रही है

तीसरी तस्वीर में गंगा पर रात का दृश्य और चौथी में आप तम्बूयों की नगरी देख सकते है।

 

अपनी भव्यता से समस्त संसार को प्रभावित करने के दो माह बाद इस नगरी का नामोनिशान तक नहीं बचता है। सारा इलाका ऐसे उजाड़ हो जाता है कि जैसे कभी वहाँ कोई नगरी बसी ही न हो। करोड़ों रूपए एक माह के आयोजन पर पानी की भांति बहाने का क्या औचित्य है, कहीं गंदगी से अटी गंगा में नहाने से बिमार तो न हो जाएंगे? कभी डुबकी से भी पाप धुलते है? इस धार्मिक आडम्बर की ज़रूरत क्या है? कुम्भ मेले का जिक्र आते ही बुद्धिजीवियों के मन को यह प्रश्न अवश्य मथते हैl इन प्रश्नों का ऊत्तर जानने के लिए आइए आपको कुम्भ मेला क्षेत्र में एक दिन के सफर पर ले चलें। इस सफ़र से आपके सभी संशय दूर हो पाएंगें या नहीं यह तो मै नहीं जानती परन्तु कुम्भ मेले के विषय में फैली कई भ्रान्तियां अवश्य मिट जाएंगी।

—-क्रमश:

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11 responses to “कुम्भ मेला-तथ्य और भ्रान्तियां

  1. इलाहाबाद में मैं भी करीब 13 साल रहा, औक कुंभ में नहीं नहाया। आपके अगले लेख का इंतज़ार है।

  2. I Think U R Too Right…kabhi-kabhi buddhibad ke parde me rahakar hum jaroor andhviswas ko 2-4 kadam piche chodte hai kintu ye ahankaar saath lekar chale aate hai.ur writing ability is undoubtedly very good. good work Thanks

  3. बुद्धिजीवियों की यह खासियत है कि वे स्वंय को बहुत बुद्धिमान समझते है।
    या बुद्धिमान समझते है शायद इसीलिये बुद्दिजीवि कहलाते हैं। बिल्कुल सही कह रही हैं रत्ना जी आप मैं भी कुंभ पर ऐसा ही लिखने वाला था लेकिन कठोर सिंह की न्यूज से पोस्टपोंड कर दिया था। अब लिखने की जरूरत नही क्योंकि जो कहना था वो आपने ही सब शब्दशः कह दिया। बहुत अच्छा और विस्तार से लिखा है। सही में संगम नही हुआ गुड‌ की ढेली हो गया।

  4. 🙂 🙂 अब क्या कहूँ!!!!
    इलाहाबाद तो मेरी फुफेरी ससुराल है, और कुंभ में नहाना अभी बाकी है. देखिये कब यह पुण्य मिलता है. अब आपका लेख पढ़ कर तो लग रहा है शायद कभी न मिले. चलो, नर्मदा ही नहा लेंगे जबलपुर में. 🙂

  5. Are aapne apne lekhan par achanak se break kyun laga diya ? asha hai is lekh ka agla bhaag shigra padhne ko milega.

  6. कुंभ स्नान तो नहीं किया परंतु माघ मेले के दौरान डुबकी लगाई… नहीं….लगवा दी गई थी आठ साल की उम्र में। मैं भी भ्रांतियाँ मिटने की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। लेख का शेष भाग कब आ रहा है?

  7. हाँ, सही कहा आपने.
    यह त्योहार और मेले भ्रांतियाँ की खोखली नींव पर टिके हुऐ हैं. आखिर इन का औचित्य है ही क्या? आशा है कि आप जैसे बुद्धिजीवी इन भ्रांतियों का हनन कर भारत का उत्थान करेंगे.

  8. I have also bathed in last kumbh in allahabad.
    It was marvellous expereince with my family.
    It seems we have gone back 500 years back.
    We also got the good luck to see many saints those comes down during kumbh. thanking you for providing better knowledge.

  9. uper jo apne likha bahut barik se sahi likha hai maine bhe abhi tak 3 kumbh naha liya ujjain haridwar aur allahabad chki allahbhad me jushi ka hoo picla
    32 nahi to 25 saal se dekh raah ho aur sabhi kumbh vislesad kiya allhabd jaisa
    nahi dikha allahaobad kumbh kumbh he hai coh se kahi jayda i thanks very -2
    to allahabad g ovt addminstration mo no. 9720564573
    jushi

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