हम होगें कामयाब

नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से हमेशा एक कदम आगे रहती है। उदाहरण के तौर पर सत्युग के दिव्यदृष्टि वाले संजय और कलियुग के दूरदृष्टि वाले संजय जी को देखिए। धृतराष्ट्र के संजय तो हाथ पर हाथ धरे केवल कौरवों और पांडवों की सेना का समाचार ही सुनाते थे परन्तु तरकश के संजय कभी नारद की सेना की गतिविधियां बांचते है तो कभी मातृभाषा के उद्धार के लिए शब्दों के अस्त्रशस्त्र लेकर, चिट्ठाक्षेत्र में अपनी कार्यकुशलता के झंडे गाड़ते नज़र आते हैं। कभी अन्य योद्धायों को तरकश थमा युद्धकरकी प्ररेणा देते है और कभी हमारे जैसे साधारण सैनिकों के प्रयासों पर टिप्पणी कर हमारी हिम्मत बंधाते है। इतना ही नहीं, एक सच्चे नायक की तरह जब उन्होंने देखा कि हिन्दीसेना की लेखन शक्ति पर शीत की लहर का असर कुछ बढ़ रहा है तो झट अपने सेनापति के बेबाक मंतव्य के ज़रिए चुनाव की सरगर्मी फैला सैनानियों में नई ऊर्जा का संचार किया।

अब इससे पहले कि हम पर एक जज को बरगलानेे का और चुनावआयोग को पोस्ट के बक्से में भर कर प्रशंसा के नोट पहुंचाने का आरोप लगे, हम अपनी स्थिती सपष्ट कर देते है और इस प्रशंसा के पीछे की मंशा एवं इस आभार का आधार बनी परिस्थितियों से आपको अवगत करा देते है।

वो हुया यूँ

कुछ अर्सा पहले हमने एक शायर बेनाम का विडीयो अपने चिट्ठे पर चिपकाया था और आप लोंगों से उसके विषय में जानकारी देने की गुज़ारिश की थी। काफी रोज़ बाद समीर भाई ने हमारे शायर बेनाम का नाम डाक्टर कुमार विश्वासबताया और सागर जी के अनुसार —-

फरवरी (बसंतपंचमी ) को पिलखुवा (गाज़ियाबाद) में जन्में डॉ कुमार विश्वास का नाम हिन्दी कविताप्रेमियों के लिए परिचय का मोहताज नहीं है। कविसम्मेलन के मंचों पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी वाक्पटुता, विद्वता, और समयअवसर पर अपनी विराट स्मरणशक्ति का प्रयोग है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कविसम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है। आई.आई.टी , आई.आई.एम या कॉरपरेटजगत के अधिक सचेत श्रोता हों, या कोटामेले के बेतरतीब फैले दो लाख के जन समूह का विस्तार हो , प्रत्येक मंच को अपने संचालन में डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं। तो प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं। हास्यरसावतार लालू यादव, अभिनेता राजबब्बर , खिलाड़ी राहुल द्रविड़, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी , नीतिश कुमार, टेली न्यूज के चेहरे आशुतोष, कुमार संजोय सिंह ,प्रभात शुंगलू, उद्योग समूह के नवीन जिंदल व श्रीजयप्रकाश गौड़ से लेकर भोपाल स्टेशन के कुलियों और मंदसौर मध्यप्रदेश की अनाज मंडी के पल्लेदारों तक फैला उनका प्रशंसक परिवार ही डॉ कुमार विश्वास की सचेत प्रज्ञा का परिचायक है।

समीर भाई और सागर जी की सशक्त व सजग सामान्य समझबूझ से सम्मोहित हो, उनकी संयुक्त सहायता के लिए, उन दोनों के समक्ष हम साभार सिर झुकाने ही वाले थे कि औरकुट क्षेत्र (ORKUT) से उचित जी टपक पड़े। उन्होंने सागर जी का बयान दोहराया और हमें औरकुट पर बने विश्वास जी के फैन क्लब का निमन्त्रण पकड़ाया। हम भी सब भूलकर खुशीखुशी औरकुट जा पहुंचे। भीड़ भाड़ वाली वहां की भूलभूलैयां में भटकते भटकते हम जाने कैसे घूमते घूमाते वहाँ पर मंडली जमाए अपने दोनों सपूतों से जा टकराए। औरकुट पर हमें पाकर दोनों को मानो साँप सूंघ गया। तुरन्त फोन मिला कर ताकीद दी कि औरकुट टीनएजर या यंग कराउड की भ्रमणस्थली है। माता जी, आप उधर का रुख न करें तो बेहतर है।

हमें अपनी बढ़ती उमर का एहसास था पर इतनी बेदर्दी से हम यंग कराउड के घेरे से धकिया कर बाहर कर दिए जाएंगे, यह कभी सोचा न था। दिल पर ऐसी चोट लगी कि क्या बताएं। मन हुया कि कमन्डल लेकर हिमालय की ओर कूच कर जाएं। खैर किसी तरह खुद को समझाया कि दुनिया की रीत ही ऐसी हैसन्तान के लिए जहान और माँबाप के लिए एक कोना बियाबान।

कई रोज़ तक हम आईने के सामने खड़े होकर सिर में सफेद बाल ढ़ूंढते रहे, आखों का चेकअप करवा आए,जिम में ट्रेडमिल पर बिना हांफे जोगिंग करी और सठियानेबुढ़ाने का जब कोई भी सिम्टम नज़र नहीं आया तो बुढ़ापे के अवसाद को दूर धकेल, ‘अभी तो मैं जवान हूँगुनगुनाते हुए, इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बच्चे अपने राज़ खुलने से घबराते है, थोड़ी स्पेस चाहते है। जाने दो, उन्हें उनका चिरकुट औरकुट मुबारिक और हमें हमारी रसोई।

पर हाय री किस्मत। लौटे तो पाया कि हमारी रसोई में उचित जी की कृपा से ओरकुट वासियों का मेला लगा था और सब के सब शायर बेनाम पर बलिहारी जा रहे थे। चिट्ठे का टी आर पी तो टैक्सी के मीटर की भांति भाग रहा था। परन्तु यूटयूब के होटल से मंगवाए पकवान के प्रशंसक हज़ार और हमारी पकाई डिश के लिए मुश्किल से सातसत्तरसौ की कतार।

हमें ऐसा लगा कि आंकड़े दबी आवाज़ में कह रहे थे कि अपनी फुल्ली फालतु बकवास को बंद करो, सृजन चाह पर लानत भेजो, कल्पना शक्ति को आराम दो और इधर उधर से सामान ला डिब्बासर्विस शुरू कर दो। इसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। हो सके तो लम्बी छुट्टी लेकर टैलेंट की तलाश में संजाल के भ्रमण पर निकल जाओ। अन्यथा कुछ अच्छा साहित्य पढ़ कर अपना टैलेंट चमकाओ।अगर किसी विधी यह सम्भव न हो तो रसोई पर ताला डालो। दूसरा ब्लाग बनाओ , नई पहचान सजाओ, उस पर किसी सोलहवें सावन वाली की सुन्दर तस्वीर चिपकाओ और औरकुट से वर्डप्रेस तक जहाँ चाहो आँख मटकाओ। पंख पसारो और उड़ान लगायो।

अंतर्मन की इस निराशा जनित सुनामी में बहते बहते, हमारे भीतर पलते रचनाकार की धड़कन मंदी पड़ गई। मूंछों पर ताव देते, अपने को तीस मार खाँ समझते हमारे कानफिडेंस का एक दम कचरा हो गया और सर्दी के मौसम में ठंड से कंपकंपाते हमारे लिखने के जोश पर घड़ो पानी पड़ गया। हम लम्बी छुट्टी का आवेदनपत्र नारद जी को भेजने और आप लोगों से टाटाबाय करने ही वाले थे कि तरकश का चुनावी तीर सामने आ गिरा।

डूबते को मानो तिनके का सहारा मिल गया। क्या करें क्या न करें का कोहरा छट गया और कलम की भक्ति का इनाम मिलने की आशा जगी। यही नहीं, आशा की किरणों के इस उजले प्रकाश में, हमें अपने दोनों हाथों में लड्डू दिखाई पड़े। यानि चित भी मेरी और पट भी मेरी। जीत गए तो वाहवाह। हो सकता है कि इनाम के तौर पर कोई औरकुट पर हमारे लिए एक फैनक्लब बना कर ससम्मान हमें वहाँ विराज दें। नहीं जीते तो भी बल्ले-बल्ले। अपनी जुझारू शक्ति से, फुरसतिया जी के पदचिन्हों का अनुसरण कर, दोतीन साल में जज की कुर्सी ज़रूर हथिया लेगें। हम भी फुरसत में है, हमें कौन जल्दी है। लब्बोलुआब यह कि हम होंगे कामयाब एक दिन।

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11 responses to “हम होगें कामयाब

  1. जल्दी बाजी का काम यूँ भी शैतान का होता है. आप तो बस धीरज रखें, इस बार तो थोड़ी मजबूरी अटकी है, वरना आपकी कामयाबी में प्रश्न चिंन्ह का कोई सवाल नही होता. 🙂

    वैसे आपको हमारी हार्दिक शुभकामनायें कि आप ही चुनी जायें एक न एक दिन. फिर बात चाहे जज चुने जाने की ही क्यूँ न हो!!

    और वो जो आशा की किरणों के इस उजले प्रकाश में, हमें अपने दोनों हाथों में लड्डू दिखाई पड़ रहे हैं न, उन्हें खा लें वरना मौसम की नमीं में आजकल खराब बहुत जल्दी हो जाते हैं. 🙂 (स्माईली नोट करते चलें)

  2. इनाम-विनाम तो चलते-फिरते छलावे हैं! वो तो जनता तय करेगी। हम लोग तो दस अच्छे ब्लाग छांटेंगे! आपके लेखन की बोलती हुयी शैली गज़ब की है, कबिले तारीफ़!

  3. वो भगवान जी बोल गये हैं ना, “कर्मण्येव …’ आप भी हमारी तरह बिंदास होके लिखे जाओ। हमारा ब्लॉग पढ़ा है न सिर ना पैर, बस लिखे जाते हैं। कभी पढ़ाने बैठ गए और कभी खुद पढ़ने , जिस दिन और कुछ नहीं सूझा उठा के मखौल चेप दिए। 🙂

  4. सन्तान के लिए जहान और माँ-बाप के लिए एक कोना बियाबान।

    मगर मेरे हिसाब से तो आपकी रसोई का यह कोना, जहान से कम नहीं. 🙂

  5. जब-जब ‘औरकुटियन अवसाद’ घेरे , हफ़ीज़ जलंधरी के लिखे और मलिका पुखराज के गाये जवानी के अमर-गीत ‘अभी तो मैं जवान हूं’ का सुबह-शाम बिना नागा आद्योपरांत श्रवण और पारायण कीजिये . अवसाद छूमंतर हो जायेगा , चुनाव के लिये नई ऊर्जा मिलेगी .

  6. मजेदार पोस्ट है आपकी ! वैसे आरकुट में तो सारी दुनिया ही है ये अलग बात है की नई पीढ़ी उसमें कुछ ज्यादा ही रमी हुई है ।

  7. आपकी रसोई वाकयी लाजबाब है. मैं तो कुछ ऐसे ही पकवान को चाओअ से हजम करता हुं.हम होंगे कमयाब से लेकर संगम तट की बातें दिल को टच करती है…कसम से.खासकर राणा जी की शायरी को पेश करने के लिए धन्यवाद्….खुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े सुखन आया है,
    पांव दाबे है बुज़ुर्गों के तो फन आया है।
    मेरे बुज़ुर्गों का साया था जब तलक मुझ पर
    मैं अपनी उमर से छोटा दिखाई देता रहा।
    गिरीन्द्र नाथ झा.Delhi

  8. औरकुट पर हमें पाकर दोनों को मानो साँप सूंघ गया। तुरन्त फोन मिला कर ताकीद दी कि औरकुट टीन-एजर या यंग कराउड की भ्रमण-स्थली है। माता जी, आप उधर का रुख न करें तो बेहतर है।

    🙂
    🙂 मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ पर हम अभी इसी चिरकूट पर जमे हैं 🙂

    बहुत अच्छी रचना लिखी है आपने ….शुक्रिया

  9. http://www.orkut.com/Community.aspx?cmm=28172629
    Yahan aana tha Mata ji ko
    Par na janey kahan pahunch gayin
    Khair aap to yahan aa hi jaiye sab

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