ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी

छ: दिसम्बर की चौदहवीं बरसी पर शुऐब भाई के विचार जान बहुत अच्छा लगा और इस विषय पर लिखी अपनी एक कविता मुझे याद आ गई। हृदय के यह उदगार उस समय पन्नों पर बिखर गए थे जब विवादित स्थल पर खुदाई का आदेश दिया गया था। आइए,आप भी सुनिए, ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी —

परम् पिता के थे

दो पुत्र होनहार

करते थे जो उसे

जी जाँ से ज़्यादा प्यार

दोनों हर इक शैय में

थे उसका रूप तकते

वो इनके दिल में रहता

ये उसके दिल में बसते

ऊँचा जो ज़रा हो गया

बच्चों का जीवन स्तर

बन गए पिता के लिए

दो आलीशान घर

एक ने अपने घर में

उसकी मूर्ति बिठाई

आयतों से दूजे ने

दिवारें थी सजाईं

इस दिशा में टनटनाता

घन्टी रूपी साज़

उस दिशा में गूंजती

आज़ान की आवाज़

मन्दिर और मस्जिद हुया

उन दो घरों का नाम

हृदय से सरके पिता का

अब यही था धाम

 

 

सदियों तक समय का रथ

अपनी राह चलता रहा

पालनहार का परिवार

फूलता फलता रहा

फैले हुए परिवार में

कुछ बढ़ने लगे फ़ासले

सन्तानों और औलादों के

दूर हो गए काफ़िले

दूरी से गलतफहमी

नफ़रत की आंधी लाई

टकरा गए गुबार में

इक दूसरे से भाई

मन्दिर भी गया टूट

मस्जिद भी गई ढाई

पिता की खोज में वहाँ

फिर होने लगी खुदाई

काश धरा की कोख इन्हें

इसका सबूत दे पाए

एक पिता के पुत्र है

इक माता के है ये जाए।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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12 responses to “ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी

  1. सुन्दर विचारों वाली सुन्दर कविता.

  2. अतिसुन्दर और भावुक कर देने वाली कृति…

  3. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण कविता! लेकिन इस सच्चाई का दूसरा पहलू यह भी है कि धर्म रुपी जहर ने इन्सानों की बुद्दि को कुंद कर दिया है।

  4. पिता की खोज में वहाँ

    फिर होने लगी खुदाई

    काश धरा की कोख इन्हें

    इसका सबूत दे पाए

    एक पिता के पुत्र है

    इक माता के है ये जाए।।

    वाह ! बेहद सटीक पंक्तियाँ लगीं ये !

  5. बढिया पन्क्तियाँ रत्ना जी! इसी पर मैने भी कुछ लिखा था, मेरे पूछने पर भगवान का ये जवाब था-
    “हमारा ये फैसला लोगों को तुम बताओ,
    एक ही इमारत मे मन्दिर मस्जिद बनाओ!
    अब इस नफरत को दूर हम ही करेंगे,
    जहाँ मै रहूँगा,वहीं अल्लाह भी रहेंगे!!

  6. ठीक कहा रत्ना जी। शायर आगा शाइर देहलवी ने क्या खूब फरमाया है:

    तुम्हारा ही बुतखाना, काबा तुम्हारा
    है दोनों ही घरों में उजाला तुम्हारा।

  7. वाह रचना जी, बहुत अच्छा कहा है। अगर यह सच में बदल जाए तो सारी मुसीबतें टल जाएं।

  8. वाह , बहुत अच्छा कहा है। अगर यह सच में बदल जाए तो सारी मुसीबतें टल जाएं।

  9. धन्यवाद रत्ना दी
    आपने बहुत ख़ूबसूरती से दिल की बात कविता मे उतारदी।
    क्या हम लोग ये सब लिख कर अपने दिल की सिर्फ भड़ास निकालते हैं?
    हमारे इन विचारों को पढ कर बाक़ी दुनिया वाले हमें पागल कहेंगे या इन्सान ? 😀 😉

  10. पिंगबैक: نئی باتیں / نئی سوچ » چودھویں برسی ( 6 دسمبر 2006 ) - First Urdu Blog from India ہندوستان سے پہلا اردو بلاگ

  11. kaise bhaul jau mai tuze tumko to banaya hai tha apana tu mere pyar ko kuo samaz na sakhi sapana

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