पग-पग कुआं, पग-पग खाई

नारी हूँ, इसलिए नारीजीवन की विषमताओं को जानती हूँ और उसके मन की भावनाओं को पहचानती हूँ। शायद इसी कारण नारी से सम्बन्धित मेरी रचनाएं काफी सराही गई। परन्तु जब भी मैनें नारी के विषय में लिखा, मेरे विवेक ने यह उलाहना दिया कि नारीत्व के मोह से बंधे मेरे हाथों ने तुला का पलड़ा जानबूझ कर स्त्रीसहानुभूति की ओर कुछ अधिक ही झुका दिया है। यह सत्य है कि आज भी नारी पर अत्याचार हो रहे हैं और कहींकहीं स्त्री की स्थिति समाज मे शोचनीय है, पर क्या इन परिस्थितियों के लिए केवल पुरुष ही जिम्मेवार है, स्त्रियों का कोई दोष नहीं? क्या पुरूषों के प्रति अन्याय बढ़ नहीं रहे हैं? नारी के हितों के रक्षक कानून क्या बेकसूर पुरषों का भक्षण नहीं कर रहे है? आज के बदलते परिवेश में क्या नारी सचमुच अबला रह गई है? हर बार अपनी जाति के प्रति वफादारी निभाते हुए मैनें इस आवाज़ को सरक्षंण कमज़ोर का अधिकार हैके कथन और भविष्य में भूल सुधारके वचन तले दाब दिया, किन्तु बिहारी बाबू की व्यंग्यव्यथा की चीत्कार ने मुझे ऐसा झिंझोड़ा कि अचानक मेरे स्मृतिपटल पर कुछ दयनीय चेहरे उभर कर आ गए जिनसे मेरा परिचय एक लोकअदालत में भाग लेने के दौरान हुया था।

अदालतों में लम्बित मुकद्दमों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए एक विकल्प के रूप में लोकअदालतों की शुरूवात की गई थी। लगभग हर माह किसी भी रविवार को ज़िला कचहरी में इसका आयोजन होता है जहां दोनों पक्ष के लोगों को समझा बुझा कर उनकी सहमति से विवादों का निस्तारण किया जाता है। नारी पर हो रहे अत्याचार का मूल्यांकन हम प्राय: दहेजउत्पीड़न और बलात्कार के बढ़ते हुए आंकड़ों के आधार पर करते है। पर इन आंकड़ों के विकरित तथ्य को जान मैं हैरान रह गई क्योंकि हमारी टीम के सामने अधिकतर मामले नारी नहीं अपितु पुरूषउत्पीड़न के थे। सच और झूठ को परखना तो काफी कठिन है पर पुरुषप्रतिवादियों के चेहरे पर पुती बेचारगी भोगे हुए कष्ट का हवाला दे रही थी। सबकी कहानियां जुदा थीं पर दर्द एक सा था।

एक तीस वर्षीय इन्जिनियर युवक पुलिस में दरोगा पत्नी से तलाक चाहता था। पत्नी तलाक के खिलाफ थी और उसका आरोप था कि पति अधिक दहेज की लालच में दूसरा विवाह करने हेतु तलाक मांग रहा है। जांच करने पर पता चला कि पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही थी, उससे उसका एक बच्चा भी था और पति की पारिवारिक सम्पत्ति के हिस्से की लालच में वह उसे कई बार मारने का यत्न भी कर चुकी थी। युवक की आँखों में डर, बदन पर चोट और जले के निशान को देख टीम के एक बुज़ुर्ग सदस्य को ताव आ गया और वे बोलेकैसे मरद हो तुम! एक औरत को नहीं संभाल सकते।आँसूओं से भीगा चेहरा उठा वो बोला था—” सर, मैं औरत को तो संभाल सकता हूँ पर इस मरदनुमा औरत का क्या करूँ। न तो साथ रहना चाहती है न छोड़ना। अगर यह अपनी नौकरी छोड़ मेरे साथ कलकत्ता चले तो मै अभी तलाक की अरज़ी वापिस ले लूं और बच्चे को भी अपना लूं पर इसकी ज़िद है कि साथ रहना है तो इसके शहर में बदली करवानी पड़ेगी। मुझे मालूम है यहां आते ही यह और इसका पुलिस वाला दोस्त मुझे मार डालेंगे। मैं तो इतना दुखी हो चुका हूँ कि खुद ही फांसी पर झूल जाना चाहता हूँ पर इससे इसका काम और आसान हो जाएगा और यह मेरे माँबाप का जीना हराम कर देगी। छुट्टी लेकर पेशी दर पेशी दौड़ते हुए मैं थक चुका हूँ, जो यह मांगेगी मैं देने को तैयार हूँ बस इस जोंक से मेरा पीछा छुड़वा दीजिए।“

लोक अदालत की प्रभावहीनता और कानून के बंधे हाथ मुझे उस समय तड़पा गए थे जब दरोगा पत्नी ने ढिठाई से दबी ज़ुबान में कहा था— “कैसे छुड़वा देंगे। यह लोग कुछ नहीं कर सकते। कानून मेरे साथ है और फिर मैं तो कानून की रक्षक भी हूं। ऐसे सबूत जुटाउंगी कि तुम्हारी सात पीढियां न छुट पाएंगी।कानून की शिथिलता और कोमलांगी कही जाने वाली अबला की कठोर क्रूरता से मेरा यह पहला परिचय था।

दूसरा मामला तीन बच्चों के पिता का था। इन अबोध बच्चों की माँ उन्हें भगवान भरोसे छोड़ अपने प्रेमी के संग रंगरलियां मनाने कहीं निकल गई थी। पत्नी की बेवफाई, नौकरी और बच्चो के पालनपोषण के बीच पिछले दो सालों से पिसते उस सीधेसाधे इन्सान को देख लड़की के मातापिता अपनी बेटी की करतूतों से इतने क्षुब्ध हो गए थे कि उन्होंने स्वंय जमाई को तलाक ले कर दूसरा विवाह करने की सलाह दी थी। लड़की का अता पता न होने के कारण, लड़की के माँबाप और भाई उसकी ओर से रज़ामंदी देने के लिए खुद हमारे सामने खड़े थे परन्तु हम समझते बूझते हुए भी कुछ कर पाने में असमर्थ थे क्योकि हमें लड़की की सहमति चाहिए थी।

अगले दो मामलों में लोक अदालत की उपयोगिता, उसके आयोजन पर होने वाला खर्च और हमारी कई घन्टों की मेहनत कुछ वसूल हुई जब दो जोड़ों को समझा बुझा कर हमने साथ रहने को मना लिया और उन्होंने तलाक की अरज़ी वापिस ले ली। पर यहाँ भी सुलह की पहल पति पक्ष की ओर से आई थी। अन्य दो नवविवाहितों का सहमति से तलाक भी तभी सम्भव हो पाया था जब वरपक्ष कन्या पक्ष की जायज़नाजायज़ मांगों के समक्ष टूट कर झुक गया था। वातावरण का बोझिलपन मेरे अन्त: करण को उस समय मथ गया था जब एक सत्तर वर्ष का ग्रामीण वृद्ध बुक्का फाड़ कर रोने लगा क्योकि उसके आठ बच्चों की माँ सरपंच चुने जाने के बाद उससे तलाक चाहती थी। समझाने पर वह पांचवी पास, पचपनसाठ के लगभग आयु वाली, दबंग महिला ठेठ देहाती भाषा में हमें समझा गई कि वह इस खासंते, हांफते और कांखते बुड्डे का लेखा जोखा नहीं रख सकती। अब वह बच्चों के पास जाए या मरे खपे। उसे इससे कोई वास्ता नहीं है। बस वह उसके पास न आए। उसके पास उसकी तीमारदारी करने का टैम नहीं है।

मेरे साथी उस देहाती दम्पत्ति से हंसी ठट्ठा कर मामला रफ़ा दफ़ा रहे थे और मैं आधुनिक सीता और सती सावित्री के इस नवीनीकरण और पति को परमेश्वर मानने वाली पतिव्रताओं के पंथ परिवर्तन का विश्लेषण कर रही थी। असीम क्रोध से उफनती, मुख से नफरत की ज्वाला उगलती, हाथों मे कानून के विभिन्न अस्त्रशस्त्र (Acts) थामे, चारों ओर विनाश की लीला रचती, ये नारियां शायद स्वंय को दुर्गा का अवतार समझ रही थीं। देवी माँ तो भगवान् शिव को चरणों में देख शान्त हो गई थी परन्तु ये चण्डीस्वरूपा किस प्रकार शान्त होगीं, मैं समझ न पा रही थी। पुरूष-सहयोगी हंस कर कह रहे थे—पग-पग कुआं, पग पग खाई, ए मालिक क्यों नारी बनाई। सांस भी लें तो हिले खुदाई, ऐ मालिक क्या चीज़ बनाई।

घर लौटी तो मन का गुबार पन्नों पर कुछ इस प्रकार बिखर गया था—

नई सदी में नवनिर्मित हुई
नारी की पहचान
संस्कारों के बंधन पर क्यों
लगते उसको अपमान

सहनशीलता लाज और ममता
त्याग, प्रेम गुण दिए बिसार
उसकी सोच की धुरी बनी क्यों
मैं और मेरे की तकरार

पिछली पीढ़ी की पीड़ा का
क्यों मांगे पुरषों से मोल
क्षमा बड़न् का शस्त्र है
भूल गई यह सीख अनमोल

आदम के हर गुणअवगुण पर
उसने अधिकार जताया है
सब कुछ पा लेने की चाह में
अपना अस्तित्व गंवाया है

नारी के बिन नर है अधूरा
बिन नर नारी अपूर्ण
दोनों के सहयोग से बनती
ये सृष्टि सम्पूर्ण ।

Advertisements

7 responses to “पग-पग कुआं, पग-पग खाई

  1. रत्नाजी आज आपने करेले की सब्जी परोस दी जो कड़वी तो हैं पर है गुणकारी.
    नारी हो कर नर के दर्द को पहचाना और यह व्यंजन पकाया इसके लिए आपको साधूवाद देता हूँ.

  2. रत्ना जी सही कहा आपने.इस तरह की नारियों की भी इस जमाने मे कोई कमी नही है जो नारि होने का गैर फायदा उठा रही हैं.आपने तो जिन नारियों की बात की है, वे कुछ कम पढी लिखी किस्म की हैं शायद.लेकिन खूब पढी-लिखी अतिमहत्वाकांक्षी लड्कियाँ भी इस तरह करती हैं.

  3. नारियों द्वारा प्रताडित मर्दों की कहानी हर जगह देखने मिल जाती है. अक्सर कानून का नाजायज फायदा उठाते देखा गया है. एक नारी हो कर इस विषय पर इतनी सजगता से लिखने के लिये बधाई.

  4. रत्ना जी,

    आपका लेख पढ़ना शुरु किया तो पूरा पढ़के ही ध्यान टूटा । आपने यह लिखकर नारी जाती पर बड़ा उपकार किया है ।
    बधाई !!!

    रीतेश गुप्ता

  5. रत्नादी
    आपकी रसोई के पकवानो का जवाब नहीं। जैसा कि संजय भाई कह चुके हैं इस बार आपने कड़वी पर गुणकारी करेले की सब्जी परोसी है, जो हमें बहुत भाई।

  6. सही है रत्नाजी, वो ज़माना गया जब नारीयां सुर्फ खिडकियों से झांका करती थीं। अब ये कहावत दहराने की ज़रूरत ही नही कि “नारी नर के बराबर है” अब तो ये साबित है और ऐसा ही चल रहा है। आपका लेख पढ कर बहुत खुशी हुई।

एक उत्तर दें

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / बदले )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / बदले )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / बदले )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / बदले )

Connecting to %s