कबाड़ का जुगाड़

एक शाम काव्यगोष्ट्ठीा के नाम पोस्ट करते समय हमने वादा किया था कि अगले दिन आपकी मुलाकात जिनाब मुनव्वर राना साहब से ज़रूर करवा देगें पर कामकाज की बाढ़ ने हमारी तमाम कोशिशों पर काली काई जमा दी और हम त्योहारों के मेले में तिथियों के हिंडोले पर तीव्र गति से झूलतेझालते जब रात-दिन के चक्करों से बाहर आए तो भीतर तक हिल चुके थे। बचपन में केवल मेरा प्रिय उत्सवपर कथनी लिख जहां हम बीस में से पन्दरह नम्बरों पर ही फूल कर कुप्पा हो जाते थे वहीं आज बीसियों धंधों में से अठरह पर करनी की विजय पताका फहराने के बाद भी, बचे काज न निपटा पाने के कारण, आत्मग्लानि से झुलस कर अगूर से किशमिश हो रहे थे।

करनी और कथनी में, बचपन और बड़प्पन में शायद यही फ़रक है।

छुट्टियों में घर लौटे बच्चों का लाडदुलार, मेलमुलाकातियों का आदरसत्कार, तीन पत्ती का खेल,मोमबत्तीदियातेल, दावतों की रेलमपेल, दुकानहाट की ठेलमठेल, दरोदिवार की सफाईरंगाई, नेपथलीन से गंधाते कपड़ों की धूपदिखाई, बची मिठाईयों का वितरण और अनुचरों के शिकायती विवरण के दौरान दुर्गापूजा कब दिवाली से गले मिल ,ईद का हाथ थाम सरक ली हमें पता ही नहीं चला। एक दिन जो कुछ देर को फुरसत पाई तो हमें अपना वादा याद आया, सच कहें तो रेटिंग के गिरने का भी भय था, सो सोचा लिखने का समय जाने कब मिले, विडीयो तैयार पड़ा है, उसी को पोस्ट पर चिपका कर Promise breaker is a shoe-maker की लानत से निजात पा लेते है। परन्तु समीर भाई और अनूप भाई ने धर लिया। वैसे उनका धरना हमें बहुत पंसद आया। कलम के धुरन्धर हमारे लेखन के लिए बेचैन है, इस खुशफहमी ने पंख पसारे ही थे कि मुई

अन्तरआत्मा ने पर कतर दिए औऱ समझाया कि यह बेचैनी मुनव्वर राना जी के लिए है, तुम्हारे लेखन के लिए नहीं। शर्मा कर हम अपना वादा दोहराने वाले थे पर यह कह कह कर हम दिल को बहला रहे हैं वो अब चल चुके है, वो अब आ रहे है‘” दिमाग में कौंध गया।

हमने टिप्पणी पर चुप्पी का ताला मारा और उंगलियों को इस सप्ताह के अंत तक राना प्रोजक्ट पूरा करने के एवज़ में मेनीक्योर का बोनस देने का वायदा कर ओवर टाइम पर लगा दिया। प्रसन्नचित्त वे भी हमें अपनी अतिरिक्त कार्यकुशलता के यह सर्टीफिकेट मय सबूत के पकड़ा गई है —-

कबाड़ के जुगाड़ में इन्हें विशेष महारत हासिल है। अभी हाल में ही इन्हों ने सफाई के दौरान फ्यूज हुई बेकार ट्यूबलाइटस को खूबसूरत लान लाइटस में बदल दिया, टूटी वी.आई. पी लाइट की मोटर निकाल कृष्ण भगवान की मूर्ति के पीछे घूमने वाला चक्र बना दिया, कूलर की टकीं में पानी भर पम्प लगा फुआरा चला दिया, पुरानी भारी भरकम डिश को उलट लान की छतरी बना दी वगैहरावगैहरा।

हमारी सेवक उंगलियों की कलाकारी ने जब लोकली कई लोग को इम्प्रेस कर दिया तो हमने सोचा क्यों न इस इमप्रेशन का ग्लोबलाईज़ेशन कर दिया जाए और इस कबाड़ के जुगाड़ पर एक एडफिल्म बना डाली। उसी का लिंक आपकी सेवा में पेश कर रहे है। जीतू भाई के जुगाड़ों से इतने जन का भला हुया है. शायद हमारा जुगाड़ भी किसी को भा जाए। विस्तार से

विडियो देखिए या फोटू देख फूट लीजिए, आपकी इच्छा। बखौल कहने वालों के हमने तो पकाया है, परोसेगें ज़रूर।

( आठ फ्यूज़ ट्यूब लाइट को एक रेत भरे समतल गमले मे, एक दूसरे से सटा कर सतम्भ के आकार में खड़ा कर दिया गया है। बीच की खोखली जगह में, रंगबिरंगें बल्बों वाली चाईनीज़ झालर को दोहरी तिहरी कर लटका दिया है और उसका कनैक्शन एक तार के सहारे बिजली के स्विच से कर दिया गया है। कांच की हंडिया से ढका यह आंशिक पारदर्शीय सतम्भ लाइट जलाने पर सतरंगी छटा बिखेरता है।)

अब आप कहेगें कि इसमे कौन सी खासइत और महारत की बात है। सभी घरों में लगभग सभी नारियां किसी न किसी चीज़ का रूप छीलगढ़ कर संवारती नज़र आती है और हम कहेगें एकदम सत्य है। तभी तो कहा जाता हैएक सफल पुरूष के पीछे एक नारी का हाथ होता है।

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11 responses to “कबाड़ का जुगाड़

  1. राणाजी के नाम से कथा हुई प्रारंभ
    फिर दिखलाई दे गया फ़्यूज बल्ब का खंभ
    फ़्यूज बल्ब का खंभ, बना हर कोई कबाड़ी
    क्या सौगात दे गये जीतू भाई जुगाड़ी
    सोचा था रसोई दे, दीवाली का खाना
    पर न मुनव्वर मिले आज भी हमको राणा

  2. राकेशजी की बातों में है दिख रही सच्चाई
    हर किसी को बना दिये कबाड़ी जीतु भाई
    मुनव्वरजी के दर्शन को हम भी रहे आतुर
    पर फ़्यूज बल्ब में लगता हो गये वो भी फूर्र

  3. शुक्र है हमारे पीछे अपना ही हाथ है 😉
    बहुत खूब रत्ना जी, आप तो लिखने मे भी कमाल रखती हैं – बधाई

  4. शुहेब भाई,
    पत्नी के इलावा माँ और बहन भीी एक नारी का ही रूप है। क्या एक माँ अपने बेटे को नहीं संवारती?

    राकेश भाई और जोशी जी,
    यह जुगाड़ हमारा है,जीतू भाीई का नहीं।
    कथा वादा पूरा न कर पाने की मजबूरी की है।
    मुनव्वर साहब की शायरी को हमारी कलम किस विधी समेटे, इसी दुविधा में पड़े थे पर आप लोगों की उत्सुकता देखते हुए. इस सप्ताहंत तक मुलाकात करवाने की कोशिश करेगें । यही बात हमने अपनी पोस्ट पर भी कही है,शायद आप लोगों का ध्यान इस पर नहीं गया।

  5. ratnaajee wakai bekaar cheejo kaa aapne accha istemaal kiya.
    lekh accha laga

  6. वैसे एक बात बताऊँ, कि आप अपने मनसूबों में कामयाब रहीं. अब रसोई में तो जो भी पकाया हो, यहाँ तो वाकई खुब पकाया. हम तो ट्यूब लाईट के पीछे भी राना जी को ढूंढते रहे मगर वो न जाने कहां छिप गये. 🙂

  7. रत्ना दी वाकई सुन्दर लग रही है लाईट, क्यों ना इस तरह पुरानी चीजों से कुछ नया बनाने का तरीका भी अगली पोस्ट बतावें, जैसे कभी कभार आप दाल वगैरह बनाने की विधी बताया करती हैं।

  8. “अन्तर-आत्मा ने पर कतर दिए औऱ समझाया कि यह बेचैनी मुनव्वर राना जी के लिए है, तुम्हारे लेखन के लिए नहीं। शर्मा कर हम अपना वादा दोहराने वाले थे पर ” यह कह कह कर हम दिल को बहला रहे हैं वो अब चल चुके है, वो अब आ रहे है‘” दिमाग में कौंध गया।”

    –अरे भई, हमें तो आपके लेखन का इंतजार रहता है, बस टापिक चुनने में आपकी साहयता कर रहे थे. 🙂

  9. बाकी तो सब ठीक है लेकिन यह बात सरासर गलत है कि हम मुनव्वर राना के लिये बेचैन हैं. मुनव्वर राना जी के बारे में तो बहुतों ने लिखा होगा. हम तो आपका लिखा हुआ पढ़ने के लिये उत्सुक है. इंतजार है उसका. जुगाड़ पसन्द आये.
    इसलेख का अंदाज भी -बहुत खूब !

  10. रत्ना जी क्षमा चाहता हूं दरअसल आपके लेख से मैं ने नारी का मतलब सिर्फ पत्नी समझ बैठा।
    मां की म्मता और बेहनों का प्यार याद दिलाने के लिए धन्यवाद –
    मैं अपनी पहली टिप्पणी के अलफाज़ वापस लेता हूं।

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