एक शाम मुनव्वर राना के नाम

पहले ब्लाग बनाना, फिर फोटू चिपकाना और फिर चलचित्र चलना- मेरे जैसे अल्प-ज्ञानी ब्लागर के लिए यह सफलता की तीन सोपान है। दूसरी को फांद कर हम तीसरी सोपान पर कैसे आ पँहुचे,कहानी लम्बी है,आराम से सुनाएंगे। अभी तो आप हिस्सों में बंटी हमारी कोशिशों पर गौर फरमाएं और राना साहिब के साथ कुछ मिनिट बिताएं।

आधी अधूरी मुलाकात के लिए माफी।

दीपावली की बधाई , ईद मुबारिक।

बची मिठाईयां निपटानी है,मीठी सिवइयां पकानी है।

सो शेष–

फुरसत पाने पर।

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7 responses to “एक शाम मुनव्वर राना के नाम

  1. रत्नाजी, ये फोटो लगाना सीखा आपने, चलचित्र लगाना सीखा आपने उसके लिये बहुत-बहुत बधाई. लेकिन आप लिखना काहे भूल गयीं! अरे फोटू लगाने, चलचित्र लगाने का मतलब यह नहीं कि लिखें न! अनुरोध है कि विस्तार से मुनव्वर राना के बारे में लिखें.

  2. भई, मुन्नवर जी की जितनी भी रचनायें आपके पास उपलब्ध हों, कृप्या पढ़वायें. वो मेरे पसंदीदा शायर हैं और उनको सुनना सभी के लिये बेहतरीन ऎहसास होग…याद आती है…..वरना बुजर्गों की निशानी कौन रखता है…..प्लीज, पूरा जायका दें, लिखें.
    इंतजार रहेगा.

  3. पिछली टिप्पणी में सिर्फ़ एक लाईन का जिक्र था..आगे देखें:

    नए कमरों में अब चीजें पुरानी कौन रखता है
    परिन्दों के लिए शहरों में पानी कौन रखता है
    हमीं गिरती हुई दीवार को थामे रहें वरना
    सलीके से बुजुर्गो की निशानी कौन रखता है।

    –मुनब्बर राना

  4. शुक्रिया रत्ना जी, थोडी देर से सही मगर आपने वादे के मुताबिक मुनव्वर राना पर लिखा ज़रूर – और आपने ये वीडियो कमाल का लगाया है, मैं ने एक बार अपने ब्लॉग पर वीडियो लगाने कोशिश की मगर नाकाम रहा।

  5. plz aap ke bahut aasanmand honge jab aap rana ji ki saaariyan padwayenge.

  6. vaah saahab… main bhi munawwar raana kaa deevaanaa hoon…

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