एक शाम काव्य-गोष्ठी के नाम

कवि और कवियत्री के हमसफ़र का सफ़र काफी दुश्वार होता है। कवि महाराज़ रोज़ अपनी महारानी के गुणों का गुणगान ऐसे चुनिंदा शब्दों में करते है कि बेचारी सुघढ़, सुमुखी, नायिका सरींखी पत्नी, सरस्वती के उपासक को लक्ष्मी के द्वारे ठेलती, गृहकायों के कोल्हू में पेलती, डांटतीफटकारती हन्टर वाली खलनायिका के रूप में प्रसिद्धि पाकर, परिचितों से आँखें चुराती और अपनी धूमिल छवि को चमकाती नज़र आती है। कवियत्री के पति का व्यक्तित्व-हनन तो नहीं होता पर उसे एक अन्य प्रकार का कष्ट भोगना पड़ता है।

कल्पना की उड़ान के दौरान निर्मित हुए, अपने अधपके विचारों के समान कच्चेपक्के पदार्थ, स्वामी के समक्ष परोस कर, हाथ में कविता का पात्र(डायरी) थाम कर, जब उसकी सरस्वतीस्वरूपा राग छेड़ती है तो पतिदेव की आत्मा तृप्त हो जाती है। अतुलनिय खाद्य को पद्यरस में लपेट कर हलक के नीचे गटकने की कोशिश में वह बरबस कह उठता है

बिना बदरी गगन में, हमें बिजली दिखी है

हाय! उन्होंने फिर आज कविता लिखी है

इसी काव्य जनित कष्ट में जीवन काटते हमारे साहब को कुछ रोज़ पहले एक काव्यगोष्ठी में बतौर मुख्यअतिथी आमन्त्रित किया गया। सार्वजनिक कार्यक्रमों से कन्नी काटने वाले, फीताकटाई व भाषणबाज़ी पर भाषण झाड़ने वाले हमारे नाथ ने जब आयोजकों को नियत दिन दर्शन देने का वरदान दिया तो हमारी मन्द बुद्धि उनकी लीला समझ न पाई। खैर, अन्धा क्या चाहेदो आँखें। इस अकारण और अप्रत्याशित मिले उपहार को शीश धरे, आयोजन का आनन्द लेने के प्रयोजन से, अपनी दोचार कवितायों से लैस हो, हम सही समय और सही आसन पर स्वामी नारायण की बगल में विराज गए।

साहित्यिकसभा के रूप में मनाए गए इस आयोजन के आरम्भ में दीपप्रजवल्न के बाद कविता, निबन्ध, कहानी,व्यंग्य एवं नारालेखन पर आयोजित अंतरविद्यालय प्रतियोगितायों में विजयी हुए विद्यार्थीयों को पुरूस्कार देकर प्रोत्साहित किया गया। तदापुरान्त मुशहरा/काव्यगोष्टी का आरम्भ हुया जिसमें मुनव्वर राना,बुद्धसेन शर्मा, विनोद श्रीवास्तव, सुधांशु उपाध्य, कमलेश द्विवेदी, यश मालवीय, श्यामा सिंह सबा‘, ताजवर सुल्ताना और रागिनी चतुर्वेदी जैसी हस्तियों ने हिस्सा लिया। कई घन्टें तक ये लोग रसधारा बहाते रहे और हम भावविभोर हो उस मधुरस में गोते लगाते रहे।

 

गोष्ठी का संचालन यश मालवीय जी ने ऐसे दिलकश अंदाज़ में किया कि मानो समां बंध सा गया। उनका हर किस्सा हास्य-रंग की फुहार से तन मन को सराबोर कर गया। उनके शुरूवाती किस्सेएक कवि ने रेल में सफर के दौरान बातचीत के इरादे से अपने सहयात्री से कहा— “मैं कवि हूँ।सहयात्री बोला–“ मैं बहरा हूँ ।”पर जो हंसी छिटकी तो अन्त तक बिखरती ही चली गई।

सर्वप्रथम बुद्धसेन शर्मा जी ने शमा जलाई और खुद की तबियत ख़राब होते हुए भी श्रोतायों की तबियत खुश कर दी। उनके अनुसार

 

मुझे ए रास्तों पल भर ठहरने की इजाज़त दो

कहीं चलते हुए भी पांव का कांटा निकलता है।

मांबाप को नसीहत देते हुए उन्होंने कहा

अभी सच बोलता है ये,

अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा

अगर डांटोगे तो बच्चा

बहाना सीख जाएगा।

 

बुद्धसेन जी का हर एक मोती अनमोल था। वो खजाना लुटा रहे थे और हम संचित करने में असमर्थ क्योंकि ऐन मौके पर हमारा पेन और मोबाइल दगा दे गया था। जब तक मामला फिट हुया माइक पर रागिनी जी गीत गा रही थी — “घटा याद आई,नदी याद आई, तुम्हारी खनकती हंसी याद आई।

एक नारी अपने प्रियतम को याद करे और दूसरी कुछ न कहे ,यह कैसे हो सकता है, ताजवर सुलताना ने सुर में सुर मिलाया–“जब से वो हमसफ़र मिल गया है, जीने का हर हुनर मिल गया है।

हुस्न का हुनर देख इश्क मचल उठा और विनोद श्रीवास्तव जी की ज़ुबान में बोला

 

 

मैं अगर रूठ भी जाऊं तो क्या

मैं अगर छूट भी जाऊं तो क्या

तुम को मिल जाएंगे कई दर्पण

मैं अगर टूट भी जाऊं तो क्या।

 

उनकी यह चार लाइनें मुझे बेहद पसंद आई

धर्म छोटे बड़े नहीं होते

जानते तो लड़े नहीं होते

चोट तो फूल से भी लगती है

सिर्फ पत्थर कड़े नहीं होते।

 

मेरे विचार में एक अच्छी कविता या उम्दा शेर का सही तोल तालियां नहीं होती पर फिर भी कमोबेश श्रोतायों की पसंदनापसंद को तो ये मापती ही है। सम्मेलन में सबसे अधिक तालियां राना साहिब के अतिरिक्त श्यामा सिहं सबा‘ ,कमलेश द्विवेदी,और सुधांशु उपाध्याय को मिली। सुधांशु जी की इस कविता पर जो तालियां बजनी शुरू हुई तो बहुत देर बाद थमी।

 

बड़ी बेटियां बेटी कम

अधिक सहेली हो जाती हैं

जब घर में केवल बेटे होते हैं

माएं और अकेली हो जाती हैं

अपना हिस्सा नहीं मांगती

खुद हिस्सा बन जाती हैं

माँ की आँखें वो छननी हैं

जहाँ बेटियाँ छन जाती हैं।

 

आयोजन स्थल महिला महाविद्यालय था, सुधांशु जी की पत्नी वहाँ शिक्षिका थी, अत: मैं समझ न पाई कि लगातार बजती तालियों की हकदार उनकी कविता है या——–

 

आस्ट्रेलिया से हाल में लौटी श्यामा सिंह सबाजी की जो रचना सबसे अधिक सराही गई ,वो थी

 

नरम लहजे में भी मुमकिन है कि नफरत मिल जाए

अब तो फूलों की भी पोशाक में बम मिलते है।

अपने चेहरे पर ये नया चेहरा लगाना छोड़ दे

ए ज़माने अब नए फितने जताना छोड़ दे।

आइने के सामने आ देख अपनी खामियां

गैर के किरदार पर उंगली उठाना छोड़ दे।

ऐसा न हो कि आप भी हो जाएं बेज़ुबान

अच्छा नहीं मज़ाक किसी बेज़ुबां के साथ

प्यार उलफ़त कसौटी से अलग ही रखना

साथ तोहफ़े के मुनासिब नहीं कीमत लिखना।

 

श्यामा जी की बुलंद आवाज़ ने एकएक शब्द मानों दिलों पर उकेर दिया। यश मालवीय की यह कविता भी काफी पसंद की गई। —-

आओ भाई राम सुभग

दरी बिछाओ राम सुभग

मंच लगाओ राम सुभग

माइक लाओ राम सुभग

भीड़ जुटाओ राम सुभग

 

मुनव्वर राना साहब मंच पर आने वाले थे,अपनी शेरोशायरी से रंग गहराने वाले थे कि अन्जाने में हमारी ज़ुबान से यह जुमला फिसल कर पतिदेव के कान में जा गिरा— “इतनी अच्छी रचनाएं सुनने के बाद हमें अपनी कवितागिरी पर शर्म आ रही है। सोचतें है कि कविताएं लिखना छोड़ दें। पतिदेव ने झुक कर फुसफुसा कर कहा–” यही बात समझाने तो हम तुम्हें इस कवि-सम्मेलन मेंं लाए थे। चलो देर आए दुरूस्त आए। गरदन घुमा साहब मुनव्वर राना को सुन रहे थे और हम गरदन लटकाए अपना सिर धुन रहे थे।

 

शेष फिर

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13 responses to “एक शाम काव्य-गोष्ठी के नाम

  1. मुनव्वर राना जी की शायरी और उनकी किताब ‘माँ’ पर अगली पोस्ट किताबी कोना और विकीपिडीया के ख्याल से लिखना चाहती हूँ, इसी कारण काव्य और शायरी की बहती रस धारा पर बांध बाँधना पड़ा। रुकावट के लिए माफी चाहती हूँ।

  2. बढिया विवरण रहा. अब मुन्नवर राना जी पर आपके आलेख की प्रतीक्षा है.

  3. वाह रत्ना जी आज तो आप ने जम कर लिखा है, अब मुनव्वर राना पर आपकी अगली पोस्ट का इनतेज़ार रहेगा।

  4. रत्ना जी शुक्रिया सम्मेलन के खास हिस्से यहाँ प्रस्तुत करने के लिये.
    /बड़ी बेटियां बेटी कम
    अधिक सहेली हो जाती हैं/
    ये पन्क्तियाँ खास पसंद आई.

  5. maza aata hai Bhopal me bhi yahan Bhagvat rawt ki kavitayen sunte huye yash malviy ki kavitayon ke sath unka andaze bayan aur bhi achch lagata hai . Kabhi aap bhopal aayea…..sahittic mahoul dil jit leta hai

    —————krishna shankar sonane

  6. रत्ना जी ,
    हिरनी की आंखें बहुत अच्छी होती हैं इसका यह मतलब नहीं कि बाकी लोग अपनी आंखें फ़ोड़ लें या देखना बंद कर दें .

  7. आइने के सामने आ देख अपनी खामियां
    गैर के किरदार पर उंगली उठाना छोड़ दे।

    वाह. कुछ ऐसी ही पंक्तियां थीं
    जब किसी से कोई गिला रखना.
    सामने अपने आइना रखना.

    धन्यवाद रत्ना जी

  8. अत्यंत रोचक वर्णन शैली है आपकी, रत्ना दी। प्रसन्नचित्त कर दिया आपने।

  9. बेकल उत्साही का एक शेर अर्ज़
    (टिप्पणित) है :
    आज फिर नासिर बलानोशों को समझाने गए।
    मैकदे से निकले तो मुश्किल से पहचाने गए ॥

  10. आपने लिखा:-
    “आयोजन का आनन्द लेने के प्रयोजन से, अपनी दो-चार कवितायों से लैस हो, हम सही समय और सही आसन पर स्वामी नारायण की बगल में विराज गए।”

    तो आपने भी कविता पाठ किया क्या?
    कौन सी कविता सुनाई?विनोद श्रीवास्तव बहुत अच्छे कवि हैं. संकोची स्वभाव और जोड़-तोड़ से कटे रहने के कारण उतना मंच पर जा नहीं पाते जितना और कवि जाते हैं.लेख बहुत अच्छा लगा.

  11. देर से पढा आप का यह लेख लेकिन बहुत आनन्द आया । मुनव्वर राना जी के बारे में पढनें का इन्तज़ार रहेगा ।

  12. डाँ कुमार विश्वास का जादुई सम्मोहन अब live
    मित्रो।आप लोगों के लिए उपहार । करें स्वीकार । डाँ कुमार विश्वास का जादुई सम्मोहन अब live लोड करें ।
    https://soniratna.wordpress.com/2006/10/30/benam/
    १० फरवरी (बसंत-पंचमी ) को पिलखुवा (गाज़ियाबाद) में जन्में डाँ कुमार विश्वास का नाम हिन्दी कविता-प्रेमियों के लिए परिचय का मोहताज नहीं है। कवि-सम्मेलन के मंचों पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी वाक्-पटुता, विद्वता, और समय-अवसर पर अपनी विराट स्मरण-शक्ति का प्रयोग है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कवि-सम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है। आई.आई.टी , आई.आई.एम या कॉरपरेट-जगत के अधिक सचेत श्रोता हों, या कोटा-मेले के बेतरतीब फैले दो लाख के जन समूह का विस्तार हो , प्रत्येक मंच को अपने संचालन में डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं। तो प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं।हास्यरसावतार लालू यादव, अभिनेता राजबब्बर , खिलाड़ी राहुल द्रविड़, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदा, नीतिश कुमार, टेली न्यूज के चेहरे आशुतोष, कुमार संजोय सिंह ,प्रभात शुंगलू, उद्योग समूह के नवीन जिंदल व श्रीजयप्रकाश गौड़ से लेकर भोपाल स्टेशन के कुलियों और मंदसौर मध्यप्रदेश की अनाज मंडी के पल्लेदारों तक फैला उनका प्रशंसक परिवार ही डॉ कुमार विश्वास की सचेत प्रज्ञा का परिचायक है। यह समूह डॉ कुमार विश्वास के देश दुनियां में फैले उन लाखों दीवानों का है जिन्हें उन्होंने बार-बार अपनी क्षमताओं से सम्मोहित किया है और जिनके दिलों की दास्तां को अपनी मीठी-आवाज , खास-अदायगी और खूबसूरत-लफ़्जों में बयान किया है।आइये , मोहब्बत , अहसास , शायरी और दोस्ती की इस बेहद खूबसूरत दुनियां में आपका स्वागत है।
    SO COME ON AN JOIN Dr.Kumar Vishvas Fan Club On Orkut

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