क्या आप ईश्वर/खुदा को मानते है?–

कई दिनों से घर में नन्हीमुन्नी चुहियां आंखें मटकातीं, पूंछ सटकाती इधर से उधर इठलाती घूम रही थी। उन्हें देख हमारा दिलफेंकू पालतु दुमकटा (cordless) चूहा भी दिवाना हो कर आशिक की तरह हरकतें करने लगा था। दो तीन बार उनसे लिपट कर मेज़ से फर्श पर जा गिरा। वो तो अच्छा हुया ज़मीन पर कालीन बिछा था वरना उसका बोलो रामहो जाता। मामला पेचीदा तब और हो गया जब नालायक जाने किस के चक्कर में काफी दिन तक गायब हो गया और जब हमने उसे मेज़ की दराज़ में फाइलों के नीचे एक मरियल सी चुहिया के संग रंगें हाथों पकड़ लिया तो शहज़ादे सलीम की तरह बगावत पर उतर आया। अब हम भी कोई शहंशाह अकबर से कम थोड़े ही हैं। तुरन्त अक्लमंदी से काम लिया। फुदकती बलायों को मोरटीन की चाकलेट चटा कर बेहोश किया। उन्हें जमीन में दफनाने का हुक्म सुनाया और अपने लाडले चूहे के सीने से आँसू टपकाता नाकारा दिल निकाल कर उसे कायदे का नया दिल (सेल/बैटरी) अता फरमाया।

इस सारे मामले को सुलझाने की हड़बड़ी में परन्तु एक गड़बडी हो गई। हम अमित जी के पोल “क्या आप ईश्वर/खुदा को मानते है” में वोट न डाल पाए। भगवान का ख़फा होना वाजिब था। ईश्वर की कृपा से हम इतने मज़े मार रिए है और जब उसके अस्तित्व पर बात आई तो हम उसके हक में एक अदद वोट तक न डाल सके। शर्म की बात थी पर सोचा वो अन्तर्यामी है, हमारी मजबूरी समझ जाएंगें और सज़ा रफादफा कर देंगे। किन्तु हमारा ख्याल गलत था। कलियुग का ज़माना है,भगवान भी अदले का बदला में विश्वास रखते है। नवरात्र के शुभ दिन शुरू होते ही उन्होंने हमें ढेरों अशुभ संकेत देकर अपनी नराज़गी का ऐलान कर दिया।

सुबह जैसे ही अपने हाथों को चूम कर पांव जंमीन पर रखे, पतिदेव की छींक ने स्वागत किया। हमने घूमकर सोते हुए चेहरे को घूरा और फिर सोचा अचेतन अवस्था में है, नहीं जानते ये क्या कर रहे है।

मुंहहाथ धोकर अखबार लेने मेन गेट पर पंहुचे तो अखबार की बजाए इस्तरी लौटाने आए, शर्माइन के काने चपरासी को सामने पाया। सत्यानास! शनिवार का दिन और घर में लोहा लेकर चला आया।

बाहर बरामदे के एक कोने में इस्तरी पटकी और दरवाज़ा खटाक बंद कर लिया। पहले तो सोचा आज सुबह की सैर की छुट्टी करते है पर फिर मन को तरो ताज़ा करने के ख्याल से टहलने निकल ही लिए। राम राम करते कालोनी का गेट पार किया था कि मरी काली बिल्ली रस्ता काट गई। अब तो हमारे पसीने छूट गए और रही सही हिम्मत का टोकरा उठाए हम पलट कर, पतली गली पकड़ेपकड़े भगवान जी के हेडक्वाटर यानि बड़े मन्दिर जा पहुँचे। मन्दिर की घन्टियां ज़ोर ज़ोर से कह रहीं थी

दु:ख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय

जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होए।।

भगवान के दरबार में हाज़री लगाने आए लोगों की काफी भीड़ थी। लाइन में हम भी लग लिए। मालिक नराज़ थे सो हमारा नम्बर बहुत देर बाद आया। सिर झुकाए हम भगवन् के सामने जा खड़े हुए और अपनी करनी की मन ही मन माफी मांगी। कहीं से आवाज़ आई– “भय बिन होय न प्रीतहमने चोंक कर इधरउधर देखा और सिर झुका कर हकलाते हुए बोले भगवन्, आपने हम नारियों को बनाया ही ऐसा है,बड़ी जल्दी भयभीत हो जाती है। आप ने धमकाया तो आपके द्वारे चले आए और परिचर्चा पर वोट डालने पहुँचे तो अमित जी के पांव पटकते, आग उगलते, लालगुलाल नन्हें डायनासोरस /ड्रेगन से डर कर उल्टे पैर लौट आए। वरना हम तो आपके पक्ष में पचास वोट डाल आते। पर साँच पर भी कभी आँच आती है। आपकी गद्दी तो अटल रही। कुल वोट पड़े सत्रह, : पक्ष में ,सात विपक्ष में और चार कभीकभी में। यानि चार महानुभाव आपको मानते तो है ही। छ: और चार हुए दस, अर्थात आपकी महिमा सर्वोपरि रही, आपका बोलबाला रहा। अभी महिला ब्लागर कुछ कम है, नहीं तो विपक्ष वालों की ज़मानत तक ज़ब्त हो जाती। भाई लोग चाहे हम नारियों को वहमी, अंधविश्वासी, धर्मभीरू आदि उपाधियों से विभूषित करें , हमारी आप पर अटूट आस्था है। और फिर हमने आज तक अपने लिए कहाँ कुछ मांगा है। हमेशा पति ,पुत्र, भाई, पिता बस इन्ही जन की सुखसमृद्धि और लम्बी आयु के लिए प्रार्थना की है। यह तो आपकी कृपा है कि समृद्ध भाई लोग होते है और समृद्धि हम पर दिखती है,सुख के लिए मेहनत वे करते है सुख भोगते हम है, उन्हें पितृत्व मिलता है हमें गौरव, लब्बोलुआब यह कि जान उनकी ,जहान हमारा। तिस पर भी नहीं समझते तो जाने दीजिए, आखिर जब लक्ष्मी के दिवाने, सरस्वती के चाहने वाले और शक्ति के उपासक है तो एक दिन आप को भी मान ही लेंगें। पिता और पुत्र के बीच छत्तीस का आँकड़ा तो चलता ही है। आप चिंता मत करें पिता और पुत्र के सम्पर्कसूत्र हम सदैव थामे रखेंगे बस आप हमारे हिस्से की कमीशन का ध्यान रखते रहें। अब इज़ाज़त दें, प्रसाद को मिठाई मान कर खाने वाला आपका एक अंश मेरे घर पर भी सो रहा है। जाऊं और उसे जगा कर समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर करूँ।

सिर उठा कर जो कर देखा तो भगवान मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। हमने उनके गौरव गान का वायदा किया, प्रसाद लिया, चरणामृत पिया और मन ही मन प्रसन्न हो बेखौफ मुख्य सड़क के रास्ते से घर की ओर चल दिए।

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18 responses to “क्या आप ईश्वर/खुदा को मानते है?–

  1. कभी कभी वाले ४ वोट दोनो पक्षो मे बंटना चाहिये। इस हिसाब से खुदा/इश्वर को नही मानने वाले वोट हो गये ७+२=९।

    चुनाव परिणाम : खुदा को नही मानने वाले बहुमत से विजयी घोषीत किये जाते है।

  2. महिला ब्लागर कम है– — शायद आपका इस पर ध्यान नहीं गया। By the way आप अपनी तरह हमें भी धर्म-संकट में क्यो डाल रहे है।

  3. “आप चिंता मत करें पिता और पुत्र के सम्पर्क-सूत्र हम सदैव थामे रखेंगे बस आप हमारे हिस्से की कमीशन का ध्यान रखते रहें।”

    क्या लिखती है आप भी रत्ना जी! इतनी बढ़ी बात इतने सरल अंदाज में। बहुत खूब!

  4. “आप चिंता मत करें पिता और पुत्र के सम्पर्क-सूत्र हम सदैव थामे रखेंगे बस आप हमारे हिस्से की कमीशन का ध्यान रखते रहें।”

    क्या लिखती है आप भी रत्ना जी! इतनी बढ़ी बात इतने सरल अंदाज में। बहुत खूब!

  5. एक बात है रत्ना जीः अपने ये सब लिखा सीधा ही है जैसा आप मानती हैं मगर मुझ अजीब दिमाग वाले को एक ही समझ आती हैः अगर किसी दिन ईश्वर दुनिया मे उतर आए और लोग पूछें बता तेरा धर्म क्या है?……… और फिर ईश्वर क्या जवाब देगा?

  6. अपने बहुत सलीके से अपनी बात लिखी है और बहुत अच्छे अंदाज़ मे अपने दिल की भडास निकाली है 🙂

  7. “अब इज़ाज़त दें, प्रसाद को मिठाई मान कर खाने वाला आपका एक अंश मेरे घर पर भी सो रहा है। जाऊं और उसे जगा कर समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर करूँ।”

    –बढिया अंदाज है बात कहने का. मजा आया मगर बात की गहराई भी नपवा दी आपने.

  8. सवाल और परिचर्चा का तो पता नहीं लेकिन हमें आपका लेख बहुत अच्छा लगा-हमेशा की तरह.

  9. “अचेतन अवस्था में है, नहीं जानते ये क्या कर रहे है।“
    वाह…वाह…
    लेखनी की गहराई और उंचाई नापना हमारे बस का नहीं हमे तो आपका लिखा पढ़ कर मजा आता हैं इस लिए पढ़ने के लिए आपके द्वार पर आ खड-ए होते हैं.
    अपना चिंतन जारी रखे और चुहो से निपटने का कोई और तरीका अपनाएं.

  10. “पांव पटकते, आग उगलते, लाल-गुलाल नन्हें डायनासोरस /ड्रेगन”

    – लगता है आप सचमुच भयभीत है।

    “अचेतन अवस्था में है, नहीं जानते ये क्या कर रहे है।“

    – अंदाज पसंद आया।

  11. प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह

    लेख अच्‍छा है इससे प्रेरित होकर मैने यह लिख है।
    http://pramendra.blogspot.com/2006/09/blog-post_29.html

  12. हर बार की भाँति बहुत ही सुन्दर लेख, पढ़ते हुए कई बार बरबस हँसी आ गयी, लेखन की कितनी विधाएं जानती है आप? कविता, व्यंग लेख आदि।

  13. वाह ! मज़ा आ गया । क्या लिखा है

  14. बढ़िया लिखा है रत्ना जी !
    वैसे भगवान को मानने ना मानने का जवाब हाँ या ना देने वाला प्रश्न तो मुझे बेमानी लगता है ।
    असली प्रश्न तो ये है कि ऊपरवाले पर आस्था रख कर हमने अपने जीवन में क्या कुछ अच्छा किया है या करने जा रहे हैं । या अगर नहीं रखी तो क्या हम ऍसा करने की वजह से सत्कर्मों से विमुख हुए हैं ?

  15. वाह रत्ना जी,मजा आया लेख पढ कर.हाँ ठीक ही कहा आपने,हम अपने लिये कब क्या माँगते हैं.

  16. हाँ ईश्वर पर विश्वास करना न केवल धार्मिक कर्तव्य है बल्कि प्रकृति की आवाज़ है यदि हम हैं तो ईश्वर भी है, यदि संसार है तो ईश्वर भी है। हाँ यदि हम नहीं , संसार नहीं तो ईश्वर भी नहीं होगा। हमारा तथा संसार को होना इस बात का प्रमाण है कि ईश्वर भी है । क्या आपने किसी चीज़ को देखा है कि बिना बनाए बन गई हो?

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