सागर और सरिता

 

जानें किस बात पर है सागर इतराता

अहंकार की गर्मी से हर पल उफनाता

सरिता जो उसमें समाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती ।

 

 

चाहत में उसकी वो बहती रही

जीवन के सुख दुख को सहती रही

पर्वत की पुत्री जब आकर मिली

अस्तित्व को उसके थी गरिमा मिली

अनुभवों की गाथा जो सुनाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती।

 

 

नाद नदी का बना उसकी गर्जन

मन की उमंग लाई लहरों में थिरकन

प्यार में उसके वो तिल तिल जली

बन कर धुंआ बादल में ढली

जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती ।।

 

 

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5 responses to “सागर और सरिता

  1. बन कर धुंआ बादल में ढली

    जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

    This was the best

  2. प्यार में उसके वो तिल तिल जली

    बन कर धुंआ बादल में ढली

    जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

    सागर में इतनी गहराई न होती ।।

    रत्ना जी इतनी सुंदरता से आपने इन पंक्तियों में अपनी बात रखी है कि मुँह से वाह-वाह निकले बिना नहीं रह पाता ।

  3. बहुत दिनो बाद कुछ पका हैं.

    सरिता जो उसमें समाई न होती
    सागर में इतनी गहराई न होती ।

    सत्य वचन और

    प्यार में उसके वो तिल तिल जली
    बन कर धुंआ बादल में ढली
    जो विरह में बदरी डबडबाई न होती
    सागर में इतनी गहराई न होती ।।

    वाह वाह..

    कहना न होगा सागर ने भी ऐसे प्रेम से समा लिया था की विरह में बदरी डबडबाई.

  4. आपकी रसोई में पकी यह कविता खुशबूदार है और आपकी
    भावनाओं ने इसे अथाह गहराई दी है.
    -धन्यवाद.

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