रूप-रंग

 

सुन्दर साफ़ सफेद रंग

देख नज़र ललचाई

गोरी चमड़ी की चाहत ने

आफत है बरपाई

गोरेपन पर लट्टू होकर

सबहिं रंगढंग भूले

उजली रंगत पाने को जल

राख बने है कोयले

कौवे को बगुला करने की

हर ओर मची है होड़

सभी सांवले लुक छिप दौड़े

: हफ्तो की दौड़

साबुन क्रीम कोई रगड़ता

कोई बेसन दूध नहाए

गोरा चलता अकड़ कर

काला बरबस शरमाए

रंगत की बदरी में छुप गई

गुणों की निखरी धूप

इन्सानों की परख बना है

आज उनका रंगरूप

काले कान्हा काहे कुछ को

दी अपनी सी काया

दूध धुली रूह पर फैलाई

क्यों काली सी छाया

तपती धूप जो सह न पाए

वो क्या साथ निभाएगा

रूपरंग है चार रोज़ का

सब दिन गुण काम आएगा।।

 

 

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4 responses to “रूप-रंग

  1. “तपती धूप जो सह न पाए

    वो क्या साथ निभाएगा”
    यह बात बहुत जगह लागू होती है।
    बहुत खूब।

  2. रत्ना ये तो बहुत ही सुंदर रचना है, क्या करें फिर भी हमको गोरी का भजन भजना है। 😉

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