है सजा यह किस कसूर की

सन्तान प्राप्ति के बाद ही नारी सम्पूर्ण कहलाती है परन्तु स्वयं नारी को आत्मसन्तुष्टि तभी मिलती है जब वो एक पुत्री की माँ बनती है। ठीक वैसे ही जैसे पुरुष पुत्र को पा गौरवशाली महसूस करता है नारी बेटी में अपना पूरा अस्तित्व देखती है। सुभद्रा कुमारी चौहान की भांति उसे लगता है मानो उसका बचपन लौट आया है। मैं इस सुख से वंचित हूँ। बरसों से सखियों की बेटियों को देख ललचाती रही हूँ और आसपास की कन्यायों पर अपनी अजन्मी कन्या के हिस्से की ममता लुटाती रही हूँ। परन्तु फिर भी स्त्रीभ्रूणों की हत्या की खबर देख मेरे मुँह से निकल गया— “चलो यह बीस तो जीवन भर के कष्टों से बचीं।पति और दोनों बेटे मेरी ओर फटी आँखों से देखने लगे और एक सुर में बोल उठे— “ How can you say this? It is inhuman.” हाँ, ठीक ही है जब स्त्री होने पर भी स्त्री जाति के भाग्यबदा कोई कष्ट मुझे कभी झेलना नहीं पड़ा तो फिर शिकायत कैसी। मायके में भाई से अधिक दुलार, ससुराल में ढेर सा प्यार,पति और सन्तान से उचित सम्मान,अपने दायरे में आदरणीए स्थान यानि हर तरह से एक भरा पूरा खुशहाल जीवन जी रही हूँ, तिस पर ऐसे अमानवीए विचार। छी! छी! ग्लानि होती है खुद पर। आखिर मन में छुपी कौन सी पीड़ा का ताप ऐसे शब्दों की भाप बना प्रियजनों को झुलसा गया। अकेले में आँखें बंद कर जब मैने आत्ममंथन किया तो अचानक मेरी स्मृति पर कई चेहरे उभर आए। हमारे धोबी की सुमुखी कन्या जिसका हर मोड़ पर मैने मार्गदर्शन किया,जिसे नौकरी मिली तो मैने प्रसाद चढ़ाया और जो पहला वेतन मिलने पर मेरे लिए चांदी का सिंदूरदान लाई थी आज स्वयं चुटकी भर सिन्दूर को तरस रही है। अपने समान पढ़ेलिखे वर की लालसा में उसकी उमर बड़ रही है, मुहल्ले के लफंगे जीना हराम किए है और आज उसके लिए सबसे बड़ा मुद्दा उसकी अपनी सुरक्षा है। कठिनाइयों से लड़ते इतना थक गई है कि अब उसे अपने से २० बरस बड़े, दो बच्चों के पिता में ही अपने सपनों का राजकुमार नज़र आ रहा है। घर के पिछवाड़े रहते चपरासी की तीनों बेटियां उसके घर लौटते ही किताबें ले मेरे आंगन मे दुबक जाती है क्योंकि रोज़ वो अपने पिता को माँ को कोसते और बेटे के लिए ज़बरदस्ती करते देख नहीं पाती। माली की इंटर पास बेटी को उसका चौथी फेल पति, पढ़ीलिखी होने का इनाम, बीढ़ी से दाग कर देता है। आंसू बहाती वो अपनी चचेरी अनपढ़ बहन जो बरतन झाड़ूपोछां कर पैसा कमाती है और जो रोज़ पति से पिटती है,की किस्मत से रश्क करती है। माँजी, हम तो इधर के रहे न उधर केउसका यह जुमला मुझे अपराध भाव से ग्रस्त कर जाता है। क्या उन्हें पढ़ कर अपने पांव पर खड़े होने के लिए प्रेरित करना मेरी गल्ती थी?

जब हमारा समाज ही समझने को तैयार नहीं तो इनकी समझबूझ का क्या फायदा। यह हालात केवल किसी एक वर्ग विशेष के नहीं है बल्कि जिधर देखो नारी का किसी न किसी रूप में शोषण होता दिखाई दे जाता है। हमारे मुंशी जी चाहे दो बेटियों का दहेज़ जुटाने केलिए चप्पलें घिस रहे है पर बेटे के विवाह में मिली मोटर साइकिल बड़े गर्व से दिखाते है। यह देख लड़कियां आत्महत्या न करें तो क्या करें। सम्पन्न मित्र की लेडीडाक्टर तलाकशुदा बेटी अपनी तीन बेटियों के साथ पिता के पास केवल इस लिए रह रही है क्योंकि उसने तीसरी बेटी के समय गर्भपात करवाने से मना कर दिया था। मेरी आँखों में आंसू अजन्मी कन्यायों के लिए नहीं बल्कि उनकी बेबस मातायों के लिए है जो जाने कितनी बार इस शारीरिक और मानसिक यातना से गुज़रती है। शायद सिर्फ इसलिए क्योंकि वे जानती है कि जिन्हें जन्म से पहले कोई मान नही मिल रहा उन्हे जन्म दे, इस नरक में जलते देखने का कष्ट तो न भोगना पड़े। उन अजन्मी कन्यायों को तो केवल एक बार मौत मिलती है,यहाँ रोज़ जाने कितनी लड़कियां दिन में हजारों मौत मरती है। हे ईश्वर! किस कसूर की सज़ा है यह

ईव ने एडम को था जन्नत से निकलवाया

कलंक उस कसूर का मिट आज तलक न पाया

हर जन्म हर युग में सज़ा स्त्री ने इसकी पाई

वफा करके भी हिस्से में उसके आई बेवफाई

पत्नी धर्म सीता ने अन्तिम सांस तक निभाया

परन्तु अकारण राम ने उसे वन में था पठाया

द्रोपदी के वीर पति थे उसके सिर का ताज

पर भरी सभा में उसकी लगी दांव पर लाज

कलियुग में लगाई जाती सरेराह उसकी बोली

कोई खींचता है आँचल कोई तार करे चोली

जिस जननी ने जन्म दे इस दुनिया को बसाया

अनेकों बार कोख में गया उसको ही मिटाया

बेटी का जन्म आज भी नज़रों को है झुकाता

है बाँधती वो घर को पर पराई कहा जाता

जीवन के हर क्षेत्र में सदा आगे है खड़ी

पर दहेज की वेदी पर अक्सर बलि है चढ़ी

फर्ज़ और प्रेम के पाटों में रहे पिसती

सौगात तो अनमोल है पर कौड़ियों में बिकती

हे नाथ! नारी जाति को अब तो क्षमा का दान दो

अन्य प्राणी जगत् की तरह जीने का हक समान दो

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8 responses to “है सजा यह किस कसूर की

  1. वाकई में ८०% महिलाओं के साथ यही होता है। लेकिन ऐसा ज्यादातर कम पढ़े लिखे लोगों मे है लेकिन इसका ये मतलब मत लगाईयेगा कि समाज के so called ऊँचे तबके में ये नही होता।

  2. बहुत गंभीर और संवेदनशील विषय पर मार्मिक लेख लिखा है रत्ना जी।
    जमीनी हकीकत बयान करता हुआ आलेख यह बताता है कि भारत को अभी किस दिशा में और कितना काम करना बाकी है।
    यह बदलाव इतना आसान नही, यह मानसिकताओं, समाज के समीकरणों का बदलाव है, पर देर सबेर इसे आना ही होगा। भारत की आधी आबादी जब तक खुश नही, “मेरा भारत महान” का हर नारा खोखला और बेमानी है।

  3. अति मार्मिक…बहुत गंभीर विषय वस्तु है, मगर लगता है गहरे विष्लेषण की आवश्यकता है.यह मात्र मेरी सोच है.

  4. बहुत ही मार्मिक लेख लिखा है रत्ना जी। हमारे समाज में अगली क्रान्ती बेटियां ही लायेंगी। देख लीजियेगा।

  5. दिल से लिखा एक बेहद मर्मस्पर्शी लेख जो स्त्रियों की दशा का सही चित्रण करता है !

  6. लेख पढ़कर मन उदास हो गया! जब तक हमारे देश के नौजवान इस बारे में नहीं सोचेंगे बहुत मुश्किल है सब बदल पाना। शिक्षा भी ऐसी माशाअल्लाह है कि कहा जाये!

  7. Well written! To write this article you have to observe the society with both heart and mind. Sad situation with no solution untill young men start taking steps.

  8. आपका विचारोत्तेजक लेख पढ़ कर मन दु:खी हुआ। पता नहीं कब हमारे देशवासियों को सद्बुद्धि आयेगी। यह भ्रान्ति है कि दहेज का दानव केवल कम पढ़े लिखे लोगों में है। मुझे व्यक्तिगत रूप से पता है कि एक केस जिसमें एक पी एच डी वधू को जो अच्छा खासा पैसा कमा रही थी, ससुराल वालों ने दहेज में कमी होने से मार डाला। आज-कल के तथाकथित प्रेम-विवाहों में भी दहेज माँगा और दिया जाता है, ऐसा मैंने मित्रों से सुना है।

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