आधुनिक श्याम और कलियुगी गीता-2

गोरखपुरिया ने आधा खाया अंगूर का गुच्छा पास रखी स्वर्ण तश्तरी में रखा और बड़े दु:ख से दोनों हाथों का दण्ड बना, उस पर ठुड्डी जमा, एक ठन्डी आह भरता हुए कहने लगा— “ स्वामी, कलियुग में आपको अपना आदर्श तो सभी मानते है व आप जैसे आचरण की इच्छा भी रखते है किन्तु सबकी इच्छाएं पूरी कहाँ हो पाती है,कुछ विरले ही आपके सच्चे भक्त के रूप में सफलता की चरम सीमा पर पहुँचते है। मैने भी बड़ा प्रयत्न किया कि आपका पिताम्बर ओढ़ आपके पदचिन्हों पर चल निकलूं पर मेरी माँ आपकी मैया की तरह ममतामयी और विशालहृदयी नहीं थी। ज़रा मैंने आपके रूप का अनुसरण किया, किसी ने घर पर जा चुगली की और वो बस रूई सा धुन देती थी। Spare the ROD and Spoil the CHILD की मूर्खता भरी कहावत को मूल मन्त्र मान कर ऐसी करारी फटकार और सुधारी मार लगाती थी कि आज भी याद कर के रूह कांप जाती है। यह तो अच्छा हुय़ा कि अभी भी धरती पर अपने किए का फल भोग रही है वरना आपकी सेवा में मुझे फटकने तक न देती। उसी का करा धरा है कि मैं आपके सच्चे शिष्यों की भांति न तो सफलता की चरम सीमा पर पहुँच पाया और न ही अपने आने वाली कई पीढ़ियों का भविष्य सुनिश्चित कर पाया। मेरे बच्चों और बीवी के साथ अब जब वो दर दर की ठोकरें खाएगी तो उसे अपनी गल्ती का एहसास होगा। परन्तु अब पछताए होत क्या जब चिड़ियां चुग गई खेत।

प्रभु ने उस मनहूस मानव को ध्यान से देखा। कहीं वो धरती पर भोगी यातनायों के कारण, उनके चरित्र पर आरोप लगा कर, बदला तो नहीं ले रहा? व्यंग्य पर व्यंग्य कर, आत्मतृप्ति के सु:ख से, आनन्दित तो नहीं हो रहा है? किन्तु श्यामशंका निर्मूल थी। मानवमुखमण्डल पर भगवन्भक्ति का तेज चमक रहा था और प्रभु के प्रति प्रीत की रीत न निभा पाने का पश्चाताप, हृदय की पवित्रता का साक्षी बन, नयनों से गंगाजल के रूप में टपक रहा था। वो अपने गम में इस कदर खो गया था कि चारों ओर फैले वैभव के सामान,सुगन्धित पकवान,रसभरे फल, शीतल जल,सुरसंगीत, सुरा-मय स्वर्ण-सुराही सबको भूल अविरल धारा बहा रहा था। उसके मुँह से आवाज़ तक निकलनी बंद हो गई थी। उसकी मनोस्थिती को देख प्रभु ने घन्टी बजा अनुचर को बुलाया और उस भोले नर को चुटकी भर भांग चटा किसी श्यनकक्ष में आराम से सुला देने का आदेश दिया।

कुछ भांग का नशा और कुछ नरम बिस्तर का मज़ा गोरखपुरिया चैन से सो रहा था और तीन लोकों को कुल तीन पग में नापने वाले अवतारी भगवान बेचैन भए जाग रहे थे व अपने कक्ष को कदमों से नाप रहे थे। चरित्र का हनन उन्हें खल रहा था पर हृदय के एक कोने में आशा का नन्हा दीपक अभी जल रहा था। मन कह रहा था कि जीवन के प्रसंग तो किंवदन्तियों के ज़रिए पीढ़ी दर पीढ़ी चलते है अत: सुनीसुनाई बातों पर आधारित होने के काऱण वे दूषित हो जाते है। पर उनके उपदेश तो तो लिखित रूप में धरती पर मौजूद है। उनसे कलियुगियों को सही प्रेरणा अवश्य मिल रही होगी। परन्तु फिर ग्रन्थ की रायल्टी क्यों कम आ रही है। पुस्तक तो कलियुग के हिसाब से ही रची गई थी। बिक्री दिन दिन कम क्यो हो रही है। कहीं किसी ने उसे भी दूषित तो नहीं कर दिया। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर की खोज मे रात्रि बिता ,सुबह होते ही प्रभु ने समाधान हेतु, कुंजीरूपीकलियुगी को बुला भेजा और बिना किसी लाग लपेट के अपने ग्रन्थ के विषय पर प्रकाश डालने को कहा।

आसन ग्रहण कर गोरखपुरिया बोला— “ हे नाथ! मेरे दादा के समय में यह ग्रन्थ घरघर में नियमित रूप से पढ़ा जाता था, पिता जी के समय में शंका होने पर लोग इसे खोल कर देख लेते थे पर मेरे काल में तो इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि इसमें नीहित उपदेशों का निचोड़ लोगों को ज़बानी याद हो गया है।

आपने कहा था कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात कर्म करने में तेरा अधिकार हो फल में कभी नहीं। इसी कारण आज का मानव केवल कार्य करता है फल के विषय में सोचता ही नहीं,भी तो चोरी-चकारी, धोखा-धड़ी, मारकुटाई करते समय वो परेशान नहीं होता। सभी कार्य सम भाव से निपटाता है। वह जानता है कि शरीर नश्वर है पर आत्मा अमर है (न जायते म्रियते वा कदाचित नायं भूत्वा भविता वा ना भूय: )। यही नहीं नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। यानि इसे न तो शस्त्र काट सकते है,न आग जला सकती हैके सत्य को पूर्ण रूप से समझ, कत्लेआम कर, बम टपका, बारूद की आग में तपा कर आत्मा की शाश्वता सिद्ध ही नहीं करता अपितु अनेक आत्मायों को नए शरीर देने में आपका हाथ भी बंटाता है क्योकि आपने ही कहा है कि जैसे शरीर नए कपड़े बदलता है वैसे ही आत्मा नया शरीर बदलती है। अब आप ही बताएं आत्मा को नए शरीर दिलवाना पुण्य का काम है या नहीं। ऐसा नहीं है कि यदा-कदा मानव के मन में अपने कर्मों के प्रति संशय नहीं होता है परन्तु ऐसे कठिन समय में आपका यह कथन कि कर्ता केवल आप है शेष सब निमित्त-मात्र है, उसे नई प्रेरणा देता है।

भगवान बिना पलक झपकाए एकटक उस मूढ़-मति को ताक रहे थे। उनके चेहरे पर निराशा, पीड़ा और अचरज देख वो सकपका कर चुप हो गया था। अब और अधिक जानकारी पाने की इच्छा न होने के कारण नारायण ने उसे विदा किया और धरती पर फैले अज्ञान को मिटाने के लिए कल्कि के अवतार में जन्म लेने की योजना बनाने में जुट गए।

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4 responses to “आधुनिक श्याम और कलियुगी गीता-2

  1. ऐसा नहीं है कि यदा-कदा मानव के मन में अपने कर्मों के प्रति संशय नहीं होता है परन्तु ऐसे कठिन समय में आपका यह कथन कि कर्ता केवल आप है शेष सब निमित्त-मात्र है, उसे नई प्रेरणा देता है।
    सत्य वचन महाराज।

  2. आगे जल्दी प्रभु का अवतार करायें। तब तक लीला जारी रखे।अच्छा लग रहा है।

  3. अवतार तो अनूप भाई जी, नारायण स्वयं ही लेगें,हमारी क्या बिसात कि हम उनके मामले में टांग अड़ाएं। यह तो आपकी दूरबीन अचानक हाथ लग गई थी जो स्वर्ग का दृश्य देख पाए । हाँ भक्त मिलते रहे तो लेखन लीला चलती रहेगी।

    छाया जी, आपके मात्र छ: शब्द- ‘जय श्री कृष्ण’ और ‘सत्य वचन महाराज’ बहुत कुछ कह गए।

  4. कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है,मगर धरती की बैचेनी को बस बादल समझता है।
    तू मुझसे दूर कैसी है, मैं तुझसे दूर कैसा हूँ,ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है।
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