आधुनिक श्याम और कलियुगी गीता

स्वतन्त्रता दिवस एवं जन्माष्टमी की आप सब को बधाई।

(स्वतन्त्रता दिवस पर स्वतन्त्रता का अनुसरण और जन्माष्ठमी पर कान्हा के रंग से रंगीन वातावरण दोनों ने हमारी लेखनी को बेकाबू कर दिया है। कृपया कल्पना की उड़ान को अन्यथा न लें। )

सावन के आते ही भगवान कृष्ण अधीर हो उठते है। जब भी झमाझम बूंदें बरसतीं, झूलों की पींगें मचलती, कन्धे से चुनरी सरकती, उन्हें वृन्दावन के मधुर दिन याद आ जाते। मथुरा क्या गए जीवन से जैसे रस ही चला गया। परन्तु मथुरा जाना तो आर्थिक उन्नति के लिए अतिआवश्यक था। न जाते तो राजामहाराजायों से जान पहचान कैसे होती। राजकुमारीयों से विवाह, यदुवंश की सुदृढ़ताा,द्वारिका नगरी की स्थापनाा ये सब मथुरा आगमन के कारण ही आरम्भ हुया। वहां पर ही उन्होंने राजनैतिक दांवपेंचों में महारत हासिल की। तभी तो महाभारत के युद्ध में पांडवोकौरवों को लड़ा कर स्वयं न लड़ने का प्रण ले अपनी सुरक्षा का इन्तज़ाम ही नहीं किया बल्कि अपनी सार्वलौकिक व सार्वकालिक ग्रन्थ श्रीमद्भगवद्गीताकी रचना भी कर डाली। उसी की रायल्टी से भादों मे पड़ने वाले उनके जन्मदिन का उत्सव धूमधाम से निपट जाता था। परन्तु इस बार जन्माष्टमी आकर निकलने को हुई और गीता प्रेस वालों का कुछ पता नहीं। यह तो अति अचरज का विषय है। हालांकि साल दर साल चढ़ावा कम हो रहा था पर वे लोग एकदम गोल तो कभी न हुए थे। लगता है धरती पर इस ग्रन्थ की बिक्री बंद हो गई है या फिर कुछ धांधली हो रही है। घोर कलियुग है, भरोसा करें तो किस पर। लगता है धरती पर स्वयं जाकर देखना पड़ेगा। लेकिन राजनीति कहती है कि आक्रमण से पहले किसी भेदिए से वास्तविक स्थिती की पूर्ण जानकारी ले लेनी चाहिए। इसलिए यह सोच भगवन् ने हाल में यमलोक पहुंचे गीता प्रेस गोरखपुर के एक कर्मचारी को बुलवा भेजा।

यम नारायण को मक्खन लगाने हेतु स्वयं एक मरियल से वयक्ति को लेकर उपस्थित हो गए और भगवन् के कान में यह फूंक और मार गए कि अगर आप से न माने तो यमदूतों को बुलवा लीजिएगा,अभी अभी धरती से ज़बान खुलवाने के नए नायाब तरीके सीख कर आए है। प्रभु ने मन ही मन यम के बड़ते हुए होंसलें को मापा, हरि-लीला से अपरिचित बुद्धि को जांचा औऱ फिर मुस्करा कर उन्हें धन्यवाद दे विदा किया।

गोरखपुरिया मुँह खोलआँखें फाड़ वैभव आँक रहा था और मारे डर के काँप रहा था। भगवन् ने नयनों में प्रेम टपका कर, चेहरे पर ममता छलका कर और अधरों पर हंसी चिपका कर उस पर सुदामा वाला फारमूला आज़माया। गोरखपुरिया गोरखपुर में रह कर भी प्रभु के गोरखधंधे को न समझ पाया। भावविह्यल होकर बोला– “ हे नाथ, मुझे तो यमदूतों ने सत्तू तक पैक करने का समय नहीं दिया। अब आपकी सेवा में क्या पेश करूँ।देवकीनन्दन का पहला वार ऐन निशाने पर बैठा था सो मंतव्य को शहद की चाशनी में लपेट कर बोले–“ तुम मेरे पुस्तक प्रकाशन प्रसाद से आए हो वहाँ की कुशलमंगल का समाचार ही मेरे लिए सबसे अधिक आनन्द का विषय है।

गोरखू प्रभु की लीला की चमक के वशीभूत हो कीट सा नाचने लगा। उसने फल के पात्र से अंगूर का गुच्छा निकाला, एक अंगूर गेंद सा उछाला, उसे मुँह की कंडिया में डाला और फिर हिचकिचाहट और अचानक मिली बादशाहत के आनन्द मिश्रित भाव से सिर को झुका कर एवं दोनों हाथों को मिला कर नमन करते हुए बोला— “ भगवन् ! आपकी महिमा अपरमपार है। द्वापर युग में ही आपने कलियुग की नब्ज़ पहचान ली थी। तभी तो आपके उपदेश और जीवन प्रसंग इस युग के लोगों के आचरण का आधार बन गए है। जनजन आपके व्यक्तित्व से प्रभावित हो मेरा तो श्याम रंग दूसरो न कोयको भजता हुया इस भवसागर को पार करना चाहता है। बाल्यावस्था मे बाल गोपाल बन साथियों के छींके समान बस्ते से टिफिन का पात्र निकाल मक्खन जैसे स्वादिष्ट पकवान चुरा कर खाता है। थोड़ा और बड़ा होने पर सड़क पर खम्बों रूपी गोपियों के शिखर पर धरे, विद्युत भरे मटको (बल्बों) को फोड़ निशाना साधने का अभ्यास करता है और य़ुवा होते ही अपने इलाके की बालायों के संग बिल्कुल आपकी भांति हासपरिहास और सम्भव हो तो रास रचाने के लिए हर दम प्रयासरत रहता है।

अपने जीवन का ऐसा जीवन्तप्रसारण सुन प्रभु व्यथित हो गए। पूतना को मारना,कालिया को नाथना,कंस द्वारा भेजे राक्षसों का वध,ग्वालबाल को जीवित करना,नन्ही ऊंगली पर गोवर्धन धरना, ग्रामवासियों की इन्द्रदेव से रक्षा जैसे अनेक अत्यंत वीरता भरे कार्यों को सबने उपेक्षित कर दिया। निर्मल आनन्द के लिए किए उनके साधरण कर्म कलियुग पर ऐसा प्रभाव डालेंगें, यह तो उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था। अच्छा हुया सभी अनुचरों को बाहर भेज दिया वरना बड़ी किरकिरी होती। यह सोचते हुए वे उठे, सब दरवाज़ेखिड़कियों के बाहर झांका और किसी को न पाकर इत्मिनान को छुपाते और हैरानीी दिखाते हुए बोलेे –“ क्या धरती पर प्रत्येक जन का यही आचरण है? क्या तुम भी इन्हीी सब कार्यों में लीन रहतेे थे??? वत्स,सत्य कहना,कुछ भी छिपाना मत। ”

क्रमश:——-

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6 responses to “आधुनिक श्याम और कलियुगी गीता

  1. ये मेहनत से जी चुराने का ही सारा लफड़ा है। सारे मेहनत के काम छोड़कर केवल रासलीला तक सीमित कर लिया कृष्ण के भक्तों ने अपने को!

  2. बहुत बढियां और मजेदार वृतांत..एवं आज के आचरण का खुला चित्रण.
    जन्माष्टमी की आपको भी बहुत बहुत बधाई।

  3. jai bharat………………….

    kyu appna time in batto me nasta kar rahe ki wo kya kar raha hai yasa kyu kar raha hai………app to sirf appna karma karo kaun kya karta hai app se kya matlab,jeevan ko appp appne ek nai disha de appne under ke ahankaar ko chhod kar shri krishna ke charano ka vandan kare app sab ka kalyaan hoga……………..aaj ke sadhu shanto se bach kare rahe sab chour hai pakhandi,dhurt,natkiya hai……….

  4. Jai Shri Krishan! Kya khoob asliyat batai hai iss kaliyugi jeevon ki jo ham apne iss amulya jeevan ko jo, 8399999 janmon ke bad mila to tha Prabhu bhajan ke liye, magar hum ne gawan diya duniya ke…
    Tahi kabu bhall kahen no koyi, gunja grihn paras mani khoyi.
    Quite interesting. Keep it up. God bless you.

    =Om Aneja=

  5. Very good story, May be THY have never thought of the otherside of the teaching in the scritures, very vibrantly depicted by the auther in the story. worth appreciable. hats off.

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