देखा मैंने उसे इलाहाबाद-लखनऊ पथ पर-भाग दो

देखा उसे लखनऊइलाहाबाद के पथ पर पोस्ट में मैने जब सड़कों पर ज्ञान बेचने वाले बच्चे के बारे में लिखा था तो सोचा न था कि इसका दूसरा भाग भी लिखूंगी पर आप लोगों की प्रतिक्रियाएं पढ़ कर आगे का किस्सा सुना रही हूँ

फाटक खुला और रैम्बलस्ट्रिप पर ऊँठ की सवारी का मज़ा देती हुई कार रेलवेक्रासिंग पार कर गई। बालक तो नज़रों से ओझल हो गया था पर उसका ख्याल एक बड़ा सा प्रश्नचिन्ह बन दिलोदिमाग को परेशान कर रहा था। अचानक वो प्रश्नचिन्ह सवाल बन ज़ुबान से फिसल गया—-कितना टैलैन्टिड बच्चा है। क्या हम इसकी कुछ मदद नहीं कर सकते ?”

साहब ने एक उड़ती सी निगाह मुझ पर डाली और फिर खिड़की से दिखती प्राकृतिक छटा में अधिक दिलचस्पी दिखाते हुए कहा—” बिल्कुल कर सकते है। करनी भी चाहिए। आखिर फिल्मों से कुछ अच्छी सीख भी तो लेनी चाहिए। परसों देखी फिल्म बागबान में हेमा मालिनी और अमिताभ बच्चन ने जैसे अनाथ सलमान को पढ़ा लिखा कर बड़ा किया था वैसे हम क्यों नहीं कर सकते। हम कोई हेमा और अमिताभ से कम थोड़े है। बस तुम भी! लगता है बागबानका खुमार अभी तक उतरा नहीं है। By the way हेमा मालिनी के रोल में तुम लगोगी अच्छी पर इसके लिए तुम्हें काफी दुबली होना पड़ेगा!!!!!”

आँखों के अग्निअस्त्र जब उनकी मुस्कुराहट की ढाल से बेअसर हो कर लौट आए तो मैंने गरदन घुमा अपने से दूर भागते बेकसूर पेड़पौधों पर आग्नेयदृष्टि टिका उन्हें भस्म करना शुरू कर दिया। थोड़ी देर बाद जब कार में गूंजते संगीत की लहरों ने क्रोध की ज्वाला को मंदा किया और मैने पलट कर देखा तो पतिदेव निद्रादेवी की गोद में थे। उन्हें आराम से सोते देख मन ने कहा

क्या बराबर का मोहब्बत में असर होता है

दिल इधर रोता है ज़ालिम चैन से उधर सोता है।

दिल से दिल को राह होती है इसको प्रमाणित करते हुए साहब ने तुरन्त आँखें खोली दी। मैंने खिलापिला कर चोर दरवाजें से एन्ट्री लेनी चाही –” चलिए हम लोग इस बात पर विचार करते है कि उस बालक को मदद मिलनी चाहिए या नहीं। पहले आप बताएं कि आखिर उसकी मदद करने में हरज़ क्या है?” मुझे पूरा विश्वास था कि उनके पत्ते जान लेने के बाद बाज़ी मेरे हाथ रहेगी।

साहब सीधे होकर बैठे और बोले–” पहले हम व्यवहारिक पक्ष पर बात करते है। ज़्यादातर लोग,जिसमें तुम भी शामिल हो, उसकी मदद इसलिए करना चाहते है क्योंकि वो गरीब है और सड़कों पर ज्ञान बेच कर पैसा कमा रहा है। दूसरा बच्चा जो ककड़ी, खीरा,मूंगफली वगैहरा बेच कर पैसा कमाने के लिए भागदौड़ कर रहा है, हम उसे तो दुकान ठेला खुलवाने की नहीं सोचते। सच कहूँ तो मेरे हिसाब से दोनों बच्चों में कोई फरक नहीं है। एक ज्ञान बेच रहा है और दूसरा सामान। जैसे डलिया वाला बच्चा ग्राहक को आक्रषित करने के लिए तरह तरह का बदल बदल कर सामान रखता है वैसे ही ज्ञानचन्द(पहाड़े वाला बच्चा) लोगों को लुभाने के लिए नित नई चीजे सीखने का यत्न करेगा। वो कच्चा माल खरीदता है यह किताबें खरीदेगा तभी इसकी दुकान चलती रहेगी। अब भावनात्मक पक्ष पर गौर करते है।

जो बच्चा हमसे मुफ्त में इनाम लेना पसंद नहीं करता उस पर ज़िन्दगी भर का एहसान थोप हम क्यों उसके आत्मसम्मान को ठेस पहुँचाएं। हिम्मत की उसमें कमी नहीं है क्योंकि बिना किसी डर के मेरे पास सीधा चला आया था। दिमाग भी रखता है क्योंकि बाज़ार और खरीददार की नब्ज़ पहचान उसने कदम बढ़ाया था। कहा जाता है जिसे ईश्वर ने बुद्धि और हिम्मत दी है वो अपना भाग्य खुद लिखता है, उसे किसी की मदद की ज़रूरत नहीं होती। मदद इन्सान को निठल्ला और कमज़ोर बनाती है। चलो मान लो हम उसकी मदद करने का विचार करते है तो किस किस्म की मदद करेंगे। अनाथ है तो अपने घर लाकर पाल सकते है पर वो इस घर पर कभी अपना अधिकार न समझेगा और बेकार में कुंठाग्रस्त हो जाएगा। अगर परिवार वाला है तो उसकी पढ़ाई का बोझ उठा सकते है ताकि वो सड़कों पर अपना समय बरबाद न कर पढ़ाई लिखाई में ध्यान लगाए ताकि बड़ा होकर अपने पैरों पर खड़ा हो और इज़्जत की ज़िन्दगी बिता सके। आज भी वो अपने पैरों ही खड़ा है। रही बात इज़्ज़त की तो आदरमान व्यक्तित्व को दिया जाता है। क्या इस बच्चे को सम्मानित करने का तुम्हारा मन नहीं होता,यानि उसने स्वयम् ही तुम्हें अपनी इज़्ज़त करने को बाध्य कर दिया। अब उसको हम और क्या दे सकते है। असली मदद उसकी बात सुन कर उसकी शिक्षा को मान देना था सो मैंने दिया। हाँ, लौटते वक्त मैं कुछ किताबें उसे ज़रूर दूंगा ताकि उसकी दुकान चलती रहे और ज्ञान के लिए उसकी ललक बनी रहे। अपना पता भी दे दूंगा ताकि कभी कोई परेशानी हो तो वो मेरे पास बेहिचक आ पाए। इसके इलावा मैं कुछ और मदद स्वरूप देना ठीक नहीं समझता। पर तुम कहोगी तो जो चाहोगी वो करने की कोशिश करूंगा।

साहब की तर्क की तेज़ गेंदबाज़ी के सामने मेरी पारी जो उखड़ी तो आज तक न जम पाई। क्या आप लोग अपनी सलाह की स्पिनबोलिंग से मेरी हार को जीत में बदल सकते है???

रक्षा-बन्धन के पर्व पर मौका सही है,दस्तूर पुराना!!!

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2 responses to “देखा मैंने उसे इलाहाबाद-लखनऊ पथ पर-भाग दो

  1. साहब इसीलिये तो “साहब” हैं रत्ना जी, हमारी भी बोलती बंद है।

  2. रत्ना जी, साहब की बातों में वज़न तो है। यदि हम इसे दूसरे नज़रिये से कहें तो शायद और उचित लगे। जहाँ तक मदद का सवाल है, प्रत्यक्ष रूप में देने पर तो वह उसे निठ्ठला बनाने की ओर अग्रसर करेगी परंतु परोक्ष रूप से सहायता करने में उसका हित अधिक सम्भव है और ऐसा ही विचार साहब ने उसको पुस्तकों की सहायता के रूप में प्रस्तुत किया। इस प्रकार के अन्य भी माध्यम हो सकते हैं और वे भी उन्होंने सुझाये – जैसे कि पढ़ाई का आर्थिक भार वहन करना आदि। इन सबसे अधिक उस बालक की सहायता उसके मार्गदर्शन के रूप में भी हो सकती है| सामर्थ्यानुसार, उसका यथोचित मार्गदर्शन भी उसके लिये अमूल्य सिद्ध हो सकता है।

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