ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक-अन्तिम भाग

आँख खुलते ही पतिदेव ने कानों में शहद टपकाया- ” जवान उठ गया, very-good, जल्दी से तैयार होकर लाइन- हाज़िर हो ,आज किला फतह करने का आखरी दिन है। बार बार दोहराए ‘ हिम्मतें मर्दां मददें खुदा ‘ बस चलता रहे, घबराए नहीं। आज इस पार या उस पार। ”

बगल में तकिया दबा हमने साहब के चेहरे पर लिखी पहेली को पढ़ने की कोशिश की,आँखों और ज़ुबान के तालमेल को नापा, लगा तो कि आँखे कुछ औऱ कह रहीं है और लब कुछ और। किन्तु तीन दिन से मोनिटर पर अटकी हमारी थकी आँखें चेहरे की बारीक लकीरें पढ़ने में असमर्थ थी सो हमने साहब की बात को विटामिन की गोली मान गले से नीचे सटकाया और हिम्मत की पताका ले चल पड़े फतह की तलाश में।

ढाबे ( नई रसोई ) में घुसते ही तबियत खुश हो गई। कई दिनों से खूंटी पर लटका बदबूदार मोज़ा नारद जी के पत्र की खुशबू से महक रहा था। हमने पढ़ना शुरू किया । लिखा था— “ रत्ना जी आपको बहुत बहुत बधाई। आखिर आप घर (रसोई) से निकल कर सड़क (ढाबा सड़क पर ही तो होता है) पर आ ही गयी। —”

———– सत्य वचन महाराज। सड़क पर तो हम आ ही गए। धोबी के गधे समान न इधर के रहे न उधर के। रसोई पर ताला पढ़ गया और ढाबा चल नहीं पा रहा। हमारा मन रखने को उन्होंने रिलायन्स के ढाबों का उदाहरण दिया। अब मुनिवर्, जब दोनों भाई एक रसोई में न समाएगें तो ढाबे पर तो जाना ही पड़ेगा। उनके ढाबे से सटे पेट्रोल-पम्प,पम्प की बगल में बिजलीघर, इन्फोकोम्,ज़मीन-जायदाद हमें आपके आशीर्वाद से मिल जाए तो हम पान की दुकान तक खोल उसके उद्घाटन का निमन्त्रण-पत्र आप के डब्बे में खुशी खुशी डाल आएं। उनसे नज़र हटाई तो देखा संजय जी बधाई का एक रुपया थाली मे डाल खिसक चुके है और निधी और प्रत्यक्षा जी मंगल कामना का बन्दनवार लगा रही है। मन ही मन हमने सबको धन्यवाद दिया और जुट गए अपने ढाबे का रूप सवांरने।

सबसे पहले हमने नाम का बोर्ड बदलने का विचार किया। ऊँचा इलाका ऊँचे लोग। ढाबा शब्द जरा सटैन्डर्ड घटा रहा था सो सोचा फिर से नाम ” रत्ना की रसोई ” कर देते है यह नाम हमारे सितारों को काफी सूट भी किया था। वैसे भी जो महक घर की रसोई में है वो ढाबे के खाने में कहाँ। घर का खाना रोज़ चलता है ढाबे पर तो कोई कभी कदार ही जाता है। अगर किसी ने पूछा कि भई दोनों जगहों का नाम एक क्यों तो कह देगें, यह हमारा ब्रेन्ड- नेम है अगर मैक्डोनल , पिज्जा-हट, डोमिनो आदि दुनिया भर में अपना एक नाम रख सकते है तो हम क्यों नहीं। इसलिए तुरन्त Options की माल पर खुले General Optionstore में जा नया बोर्ड पेन्ट कराया और मेन गेट पर टांग जायज़ा लिया। चिरपरिचित सा एहसास हुया। बाहरी मामला फिट कर हम आन्तरिक सज्जा की ओर मुड़े। सुना था कि घर का रूप निखर आता है नए रंग रोगन से। सो सज्जा सुधार केलिए हमने Presentation नाम के डेकोरेटर का दरवाज़ा खटखटाया। Themes के कांऊटर पर हमें ढेरों सज्जाएं दिखाई गई और हमने कागज़-कलम वाली एक सादी सी सज्जा पसंद कर ली। हामी का चेक जमा कर और काम पूरा होने की खबर पा जब हम डरते डरते वापिस Site पर पहुँचे तो हमें अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुया। जैसे परी माँ ने सड़े सूखे कद्दू को एक सुन्दर घोड़ा गाड़ी में बदल दिया था, कृष्ण ने टूटे फूटे सुदामा के झोपड़े को महल में तबदील कर दिया था ठीक उसी प्रकार Themes के जादूगर ने हमारे घर का काया कल्प कर दिया था। बेमौसमी अँधड़ से उजड़े बिखरे वाक्य मानो कुशल हाथों की करामात बने सजे- संवरे इठला रहे थे और खोई हुई साइड-बार मय माल मत्ते के मेन हाल में स्थापित हुई अतिथीगण को आक्रषित कर रही थी। यह फेर बदल कैसे हुया हम नहीं जानते,जान कर होगा भी क्या, आम तो मिल गए , अब पेड़ गिनने से क्या लाभ। ज़रूर कागज़-कलम की ताकत कमाल दिखा गई थी।

रिहायशी इलाका ठीक कर हमने Blogroll और User की परछत्तियों की ओर रुख किया । वहाँ का समान किस काम आता है, हमारे पल्ले नहीं पड़ा। कुछ छुएं और ताश का महल भरभरा के गिर जाए इस डर से सांस रोक कर चुपचाप बाहर निकल आए । पेज और कैटेगरी को तो गोद ले लिया पर उनके parent कौन है य़ह जान न पाए। खैर छोड़ो फिर कभी खोज बीन करेंगे, अभी तो अपना सामान जो ब्लागस्पाट पर पड़ा है उसकी फिकर करते है यह सोच Import आफिस में अर्जी दी। चट मन्जूर हो गई और पट हमारा सारा सामान नए घर में सही सलामत पहुँच गया। भई वाह आज का दिन तो बड़ा सौभाग्यशाली रहा।

मायावी घर को ताला लगा हम विजय सैलिब्रेट करने के लिए चाय का कप लिए पक्के बरामदे में आ बैठे और बरसते पानी का आनन्द लेने लगे। दिमाग कह रहा था—-

काट लेना हर कठिन मंज़िल का कुछ मुश्किल नहीं
इक ज़रा इन्सान में चलने की हिम्मत चाहिए।।

और मन कह रहा था रोज़ सुबह पतिदेव की मीठी वाणी सुन कर दिन की शुरूवात करनी चाहिए। आखिर उनकी आवाज़ की महिमा के कारण ही हम वर्डप्रेस का किला जीत पाए। दिमाग ने तुरन्त हाँ में हाँ मिलाई और कहा–आवाज को रिकार्ड कर सी.डी और कैसट निकाल दो, ब्लाग की तरह बिज़नेस भी चल निकलेगा!!!!

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7 responses to “ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक-अन्तिम भाग

  1. बढ़िया लिखा। हम तो यही कहेंगे जैसे आपके दिन बहुरे ,वैसे सबके बहुरें।

  2. अंत भला सो सब भला।

  3. ये क्या हो गया? हमने अपनी टिप्पणी पोस्ट करने के बाद उसे देखना चाहा, लेकिन तब तक तो थीम ही बदल गई। हाँ, इस थीम का रसोई से कुछ संबंध तो दिखता है। ढाबा अब आकर्षक हो गया है। हम जैसे ग्राहक रत्ना की रसोई में स्नेह से बनाए गए सुस्वादु व्यंजन की तलाश में आते रहेंगे।

  4. इस बार पोस्ट तो हो गई टिप्पणी, लेकिन तब तक थीम फिर से बदल गई। लगता है इधर हम टिप्पणी भेजने के प्रयोग में लगे हैं और रत्ना दी ढाबे को तरह-तरह से सजा कर निखारने के प्रयोग में लगी हैं। हम भी इस दौर से हाल ही में गुजरे हैं। ये सारे थीम आजमाए। अब एक सीधे-सादे थीम पर जाकर स्थायी हुए हैं।

  5. सृजन शिल्पी जी,
    आपको कौन से थीम में रसोई अच्छी लगी ,अब हम यह कैसे जानें। हम तो एक थीम/एक मिन्ट की रफ्तार से अपनी गाड़ी दौड़ा रहे थे।

  6. ब्लॉग स्पॉट को इतना भी क्यों बदनाम करो – आपको ठिकाना बदलना था सो बढ़िया, अब सरकार ने बैन वापस ले तो लिया है! और मैं कोई ब्लॉगस्पॉट का प्रतिनिधि नही, पर यूँ ही…

  7. जब व्यँजन इतने स्वादिष्ट हो तो क्या फर्क है रसोई की बनावट से? वह आपकी पसंद की रहे।

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