हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं—

सावन का पहला सोमवार था । हम सुबह-सुबह शंकर जी के ध्यान में व्यस्त थे,

आखिर उन्हीं की कृपा से हमारी रसोई ने हज़ार का स्कोर पूरा कर, दो सैन्चुरियां

और एक हाफ़ सैन्चुरी बना ली थी ।आगे भी दिन दूनी रात चौगनी प्रगति की कामना

से भगवन् को उनकी पसंद का प्रसाद पहुंचाने और मक्खन लगाने में जुटे थे कि कोई

नासपीटा,बुरी नज़र वाला,अक्ल का दुश्मन जलकुकड़ा हमारी रसोई पर, बिना कोई

नोटिस दिए ,एक बड़ा सा ताला डाल गया । मन में तो आया कि करमजले को बेलन

से बेल कर तन्दूर में उतार दें पर बेलन व तन्दूर रसोई में सील-बंद और दुखदाई,मासूमों

की बलि चढ़ा, आतंक फैलाकर एक आतंकवादी की तरह फुर्र । इसलिए उस दिन की

सारी तपस्या पर ध्यान केन्द्रित कर श्राप दे डाला ” जा दुष्ट, तेरी अक्ल का ताला तेरे

भाग्य पर जा लगे ताकि तुझे दूसरो के कष्ट का अन्दाज़ा हो । पद का मद तुझे ले डूबे ।”

उसे श्राप देकर,ठण्डा पानी पीकर जब कुछ शान्त हुए तो सोचा” उसका जो होगा, सो होगा

पर तेरा क्या होगा रत्ना । तेरी तो रसोीई बंद, अब पिछवाड़े केे चोर-दरवाज़े से एन्टरी कर

भी ले पर बिजनैस तौ गिऔ । ऊपर से यह डर कि पता नहीं कब सूंघता हुया आ धमके और

घर से उद्योग चलाने के लिए चलान कर दे। बेहतर यही है कि जमीन खरीद एक रेस्ट्रोरेन्ट

खोल दें पर जेब (अक्ल) टटोली तो पाया कि इतनी रेज़गारी (जानकारी) नही है सो फ्री की

ज़मीन देख चुपचाप अपना ढाबा य़हाँ खोल लिया । पता है खोजता हुया यहाँ भी आ मरेगा

पर तब तक इतना कमा लेगें ताकि अपना होटल खोल सकें ।

तो आप आएं, दोस्तों को लाएं और नानवेज में मटनपुलाव, चिकन बिरयानी,रौग़नजोश,

शामी कबाब,फिश-फिंगर्रज वगैहरा व वेज में काश्मीरी दमआलू खोया मटर,शाही पनीर,

मलाई कोफ्ता आदि का लुत्फ उठाएं । अचार, चटनी,पापड़ और बढ़िया बनारसी पान फ्री में ।

विशेष—– पहले सौ कदरदानों को उपहार में एक आशीर्वाद

नोट——- अच्छा टिप देनें वालों केलिए भविष्य में लकी ड्रा से इनाम देने की योजना ।

आज देवें उधार कल करेंगें व्यपार

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4 responses to “हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं—

  1. दुकान चकाचक चलेगी . हमारी दुआ कि दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की हो , रसोई से ढाबा, ढाबे से पाँच सितारा होटल 🙂

  2. रत्ना जी आपको बहुत बहुत बधाई। आखिर आप घर (रसोई) से निकल कर सड़क (ढाबा सड़क पर ही तो होता है) पर आ ही गयी।ढाबे के काम मे ज्यादा माया दिख रही है तभी तो बड़े बड़े रईस(अम्बानी) भी इसमे कूद रहे है। ईश्वर करे आपका ढाबा चल निकले। और हाँ खाना एक ही जगह पकाइए, दो दो जगह से मेहनत भी ज्यादा पड़ेगी और कोई फायदा भी नही।

    ढाबे की नयी नयी स्कीमों का इन्तजार रहेगा।

  3. स्वागत है आपका । कहिये आपके आगमन की दावत में कब आयें ?

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