रत्ना की रसोई

कुम्भ मेला-तथ्य और भ्रान्तियां

January 4, 2007 · 7 Comments

बुद्धिजीवियों की यह खासियत है कि वे स्वंय को बहुत बुद्धिमान समझते है। जीवन की हर वास्तविकता को तर्क की कसौटी पर कसते है। हर गुत्थी बुद्धि के सहारे खोलते है, उसे विद्यमान ज्ञान की तुला पर तोलते है और जो तथ्य उनके परिभाषित माप दंडों के सीमित दायरे में नहीं आते, वे उनके प्रति तटस्थता या अविश्वास दिखाते है।

चार-: किताबें पढ़ कर और एक-दो डिग्रीयां बगल धर, मैं भी बुद्धिवाद के इस भाव से प्रभावित थी। यही कारण रहा कि सालों संगम तट के निकट रहने पर भी मैंने कभी अपने पापों को गंगा में धोने का यत्न नहीं किया, सोचा वैसे ही गंगा इतनी मैली है, काहे को उसका बोझ बढ़ाया जाए। माघ मेलों व कुम्भ मेलों में बाज़ार से निकली हूँ मगर खरीदार नहीं हूँ की तर्ज़ में कुछ देर को उपस्थिती लगाने तो अवश्य गई पर हर बार स्वांग रचाते साधु, शोर मचाते भौंपू, रिरीयाते भिखारी, बरगलाते पंडें और धक्कियाते पुलिस के डंडे देखकर, विरक्त हो लौट आई। मेरी बुद्धि यह समझने में असमर्थ थी कि कौन सी गुड़ की भेली वहां मौजूद है जिसकी चाहत में लोग चींटियों के समान एक दूसरे के पीछे कतार बांधे बड़ी तन्यमता से मीलों पैदल चले जा रहे है। किस सुख की आशा में वे जनवरी की कड़कती ठंडक में बर्फीले पानी में डुबकी लगा रहे है और एक माह तक कल्प वास का घोर कष्ट उठा रहे है।

दूर दराज़ से आई भक्तों की उस उफनती भीड़ के अन्ध-विश्वास पर मुझे तरस से अधिक गुस्सा आता क्योंकि उनके कारण महिनों पहले शहर में बिजली की कटौती बढ़ जाती और सड़के पुन: निर्माण के लिए खुद जाती। मेले के दौरान यात्रियों से पटी सड़के, रुका यातायात, मंहगी सब्ज़ियां, मेहमानों से भरा घर, डुबकी लगाने के चक्कर में गायब हुए नौकरमेरी उलझन को और बढ़ा देते। गंगा-नहान से लौटे लोगों से मैंने कई बार यह जानने की कोशिश की कि आखिर क्यों वे साल दर साल इस मेले की ओर खिंचे चले आते है। दिव्य तेज़ से दमकती आँखों को झपका सभी ने एक ही उत्तर दिया था– “ मेला-क्षेत्र में दो दिन रह कर देख लें आप स्वंय ही समझ जाएंगी।

पूंछ कटा भेड़िया सबकी पूंछ कटवाना चाहता हैइस ख्याल को खारिज करने में कई साल बीत गए। धीरे धीरे भीड़-जनित-कोफ्त एवं घबराहट पर जिझासा और उत्सुकता अधिक हावी हो गई और 2001 के कुम्भ में, तीन दिन के लिए, मेला-क्षेत्र में लगे एक कैम्प में रह कर, मैंने भी मुफ्त में बंटते अमृत को चखने का निश्चय किया। अमृत की आस और उसकी तलाश कैसी रही, यह बताने से पहले मैं कुम्भ मेले के विषय में आपको कुछ बताना चाहूँगी।

कुम्भ मेले का आयोजन इलाहाबाद(प्रयाग) में गंगा-यमुना और अदृश्य सरस्वती के संगम-स्थल पर, उज्जैन में क्षिपरा-तीरे, नासिक में गोदावरी के तट पर और हरिद्वार में गंगा-किनारे किया जाता है। चारों स्थानों पर यह मेला तीन साल के अन्तराल पर बारी-बारी लगता है. अर्थात एक स्थान विशेष पर इसका आयोजन बारह वर्ष में एक बार होता है। प्राचीन समय में साधु समाज को आपसी विचार-विमर्श के लिए यह अन्तराल बेहद लम्बा लगता था, अत: 1837 में पहली बार हरिद्वार में छ: साल बाद होने वाले अर्द्ध-कुम्भ की शुरूवात की गई। प्रयाग में इसका आयोजन पहली बार 1940 हुया। 

प्रयाग में प्रत्येक वर्ष माघ में एक मेला और लगता है जो माघ-मेले के नाम से जाना जाता है व जिसे खींच-तान कर मिनी-कुम्भ कहा जा सकता है ।

कुम्भ-मेला किस स्थान पर, किस माह में, किस तिथी से आरम्भ होगा, इसका निर्णय सूर्य, चन्द्रमा और गुरू का विभिन्न राशियों में आवागमन के आधार पर किया जाता है। इन्हीं तीन ग्रहों की स्थिती विशेष के कारण इलाहाबाद में यह मेला माघ (Jan-Feb), हरिद्वार में फागुन और चैत्र (Feb-March-April), उज्जैन में बैसाख (May) और नासिक में श्रावण अर्थात जुलाई में लगता है।

केवल इन्हीं नगरों में कुम्भ का आयोजन क्यों होता है, इस तथ्य के पीछे एक पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि एक बार देवों और दानवों ने मिल कर अमृत प्राप्ति के लिए क्षीर सागर का मंथन किया। अनेकों अमुल्य व अतुल्य पदार्थों की प्राप्ति के पश्चात जब अमृत-कुम्भ प्रगट हुया तो उस पर अधिकार जमाने के लिए देवों और दानवों में बारह वर्ष तक युद्ध चला। कुम्भ की छीन झपट के दौरान अमृत की कुछ बूंदे इन चार स्थलों पर गिरी। इसी अमृत की चाह में असंख्य लोग इन स्थलों की ओर खींचे चले आते है।

एक अन्य कथा यह भी है कि शंखासुर नामक एक राक्षस ने सागर की तलहटी से मिट्टी में रहने वाले जीवों ( दीमक) की सेना को वेदों को नष्ट करने भेजा। ज्ञान एंव शक्तिशाली मंत्रों के भंडार वेदों के नष्ट होते ही देवों की शक्ति क्षीण हो गई और असुरों से हार कर वे कैलास पर्वत पर जा छुपे। देवों के हारने से चारों ओर अराजकता छा गई । नैतिकता का नाश हो गया,अनाचार फैल गया और धरती पर हाहाकार होने लगी। इस स्थिती से व्यथित हो ऋृषियों और मुनियों ने भगवान् विष्णु से उद्धार करने की गुहार लगाई। विष्णु जी ने मुनि-जगत् को कहा–” आप सब मिलकर अपनी शक्तियों को केन्द्रित करें और ध्यान पूर्वक एक-चित्त हो कर वेदों का पुन: निर्माण करें। जब आपका कार्य समाप्त हो जाए तो प्रयाग जाकर संगम-तट पर मेरा इंतज़ार करें। मैं समस्त देवों को लेकर आप से वहीं मिलूंगा।

मुनिगण विष्णू जी के आदेश के पालन में जुट गए। इस दौरान विष्णु जी ने एक बड़ी मछली का रूप धारण कर शंखासुर को मार डाला और देवों की मदद से असुरों की सेना को हरा दिया। तदोपरांत वे ब्रह्मा, शिव और सभी देवों को लेकर प्रयाग पहुँचे। यहां पर पुन:निर्मित हुए वेदों के ज्ञान को सम्पूर्ण जगत् के हित में प्रयोग करने केलिए उन्होंने अश्वमेघ यज्ञकिया जो बारह वर्ष तक चलता रहा। यज्ञ समाप्ति पर मुनियों ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की कि वे भविष्य में हर बारहवें वर्ष एक माह के लिए प्रयाग में सभी देवों सहित अवतरित हो। विष्णु जी ने प्रार्थना स्वीकार की और प्रयाग को तीरथ-राज की उपाधि दी तथा कहा कि संगम तट पर ध्यान-अर्चना में बिताया गया एक दिन अन्य स्थानों पर कमाए गए दस सालों के पुण्य के समान होगा।

इन कथायों की सच्चाई प्रामाणित करना कठिन है परन्तु इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि अन्य तीन नगरों में आयोजित होने वाले कुम्भ की अपेक्षा जमा देने वाली सर्दी के बावजूद इलाहाबाद के कुम्भ में श्रृद्धालुयों का जमावाड़ा अधिक होता है। इसका एक कारण यह भी हो सकता है कि सगंम तट पर भीड़ जुटने के लिए विस्तृत खाली स्थान आसानी से उपलब्ध है। यहाँ के कुम्भ के विराट स्वरूप का अंदाज़ा तो इस बात से लगाया जा सकता है कि 20 वर्ग किलोमीटर से भी अधिक के इलाके में बसी तम्बूयों की इस नगरी के प्रशासन के लिए अलग से प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी नियुक्त किए जाते है। आवागमन के लिए रेत पर इस्पात की चादरें डाल कर लगभग1850 किलोमीटर लम्बी सड़कें बनाई जाती है। हस्पताल, फायर-ब्रिगेड, दूर दराज से आई दुकानों, बांस और कनात से बने मकानों, फोल्क-थेयटर, सरकस इत्यादि सभी सुविधायों से युक्त इस कुम्भ नगरी में जनसख्यां समान्य दिनों में दस लाख और शाही-स्नान के दिन एक करोड़ तक पहुंच जाती है। नीचे दिखाई गई तस्वीरे इस नगर की भव्यता का अंश मात्र चित्रित कर रही है। पहली फोटो में गंगा पर बने पीपों (पोन्टून)के पुलों पर और दूसरी में संगम तट पर लोगों की भीड़ दिख रही है

तीसरी तस्वीर में गंगा पर रात का दृश्य और चौथी में आप तम्बूयों की नगरी देख सकते है।

 

अपनी भव्यता से समस्त संसार को प्रभावित करने के दो माह बाद इस नगरी का नामोनिशान तक नहीं बचता है। सारा इलाका ऐसे उजाड़ हो जाता है कि जैसे कभी वहाँ कोई नगरी बसी ही न हो। करोड़ों रूपए एक माह के आयोजन पर पानी की भांति बहाने का क्या औचित्य है, कहीं गंदगी से अटी गंगा में नहाने से बिमार तो न हो जाएंगे? कभी डुबकी से भी पाप धुलते है? इस धार्मिक आडम्बर की ज़रूरत क्या है? कुम्भ मेले का जिक्र आते ही बुद्धिजीवियों के मन को यह प्रश्न अवश्य मथते हैl इन प्रश्नों का ऊत्तर जानने के लिए आइए आपको कुम्भ मेला क्षेत्र में एक दिन के सफर पर ले चलें। इस सफ़र से आपके सभी संशय दूर हो पाएंगें या नहीं यह तो मै नहीं जानती परन्तु कुम्भ मेले के विषय में फैली कई भ्रान्तियां अवश्य मिट जाएंगी।

—-क्रमश:

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नव वर्ष मंगलमय हो

December 31, 2006 · 10 Comments

सन् 2006 विदा ले रहा है और सन् 2007 बाहें पसारे हमें अपने आगोश में लेने को बेकरार है। फोन की घन्टियां लगातार बज रही है, दोस्तों, रिश्तेदारों से महफिलें सज रही है, मस्ती का दौर है, हर ओर शोर है, इसलिए आज कोई लम्बी बात नहीं,बस नए साल के लिए ढेर सी शुभकामनाएं और एक संदेश जो कुछ देर पहले मुझे मिला

                                  इससे पहले कि

 

                    2006 का अन्तिम सूरज अस्त हो

 

                        इस साल का कलैन्डर नष्ट हो

 

                     आप खुशी के माहौल में मस्त हो

 

                          फोन का नेटवर्क व्यस्त हो

 

                     दुआ है आपका आने वाला साल

 

                                 ज़बरदस्त हो

 

 

 

                      HAPPY NEW YEAR

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हम होगें कामयाब

December 25, 2006 · 11 Comments

नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से हमेशा एक कदम आगे रहती है। उदाहरण के तौर पर सत्युग के दिव्य-दृष्टि वाले संजय और कलियुग के दूर-दृष्टि वाले संजय जी को देखिए। धृतराष्ट्र के संजय तो हाथ पर हाथ धरे केवल कौरवों और पांडवों की सेना का समाचार ही सुनाते थे परन्तु तरकश के संजय कभी नारद की सेना की गतिविधियां बांचते है तो कभी मातृ-भाषा के उद्धार के लिए शब्दों के अस्त्र-शस्त्र लेकर, चिट्ठा-क्षेत्र में अपनी कार्य-कुशलता के झंडे गाड़ते नज़र आते हैं। कभी अन्य योद्धायों को तरकश थमा युद्ध-करकी प्ररेणा देते है और कभी हमारे जैसे साधारण सैनिकों के प्रयासों पर टिप्पणी कर हमारी हिम्मत बंधाते है। इतना ही नहीं, एक सच्चे नायक की तरह जब उन्होंने देखा कि हिन्दी-सेना की लेखन शक्ति पर शीत की लहर का असर कुछ बढ़ रहा है तो झट अपने सेनापति के बेबाक मंतव्य के ज़रिए चुनाव की सर-गर्मी फैला सैनानियों में नई ऊर्जा का संचार किया।

अब इससे पहले कि हम पर एक जज को बरगलानेे का और चुनाव- आयोग को पोस्ट के बक्से में भर कर प्रशंसा के नोट पहुंचाने का आरोप लगे, हम अपनी स्थिती सपष्ट कर देते है और इस प्रशंसा के पीछे की मंशा एवं इस आभार का आधार बनी परिस्थितियों से आपको अवगत करा देते है।

वो हुया यूँ

कुछ अर्सा पहले हमने एक शायर बेनाम का विडीयो अपने चिट्ठे पर चिपकाया था और आप लोंगों से उसके विषय में जानकारी देने की गुज़ारिश की थी। काफी रोज़ बाद समीर भाई ने हमारे शायर बेनाम का नाम डाक्टर कुमार विश्वासबताया और सागर जी के अनुसार —-

फरवरी (बसंत-पंचमी ) को पिलखुवा (गाज़ियाबाद) में जन्में डॉ कुमार विश्वास का नाम हिन्दी कविता-प्रेमियों के लिए परिचय का मोहताज नहीं है। कवि-सम्मेलन के मंचों पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी वाक्-पटुता, विद्वता, और समय-अवसर पर अपनी विराट स्मरण-शक्ति का प्रयोग है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कवि-सम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है। आई.आई.टी , आई.आई.एम या कॉरपरेट-जगत के अधिक सचेत श्रोता हों, या कोटा-मेले के बेतरतीब फैले दो लाख के जन समूह का विस्तार हो , प्रत्येक मंच को अपने संचालन में डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं। तो प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं। हास्यरसावतार लालू यादव, अभिनेता राजबब्बर , खिलाड़ी राहुल द्रविड़, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी , नीतिश कुमार, टेली न्यूज के चेहरे आशुतोष, कुमार संजोय सिंह ,प्रभात शुंगलू, उद्योग समूह के नवीन जिंदल व श्रीजयप्रकाश गौड़ से लेकर भोपाल स्टेशन के कुलियों और मंदसौर मध्यप्रदेश की अनाज मंडी के पल्लेदारों तक फैला उनका प्रशंसक परिवार ही डॉ कुमार विश्वास की सचेत प्रज्ञा का परिचायक है।

समीर भाई और सागर जी की सशक्त व सजग सामान्य समझ-बूझ से सम्मोहित हो, उनकी संयुक्त सहायता के लिए, उन दोनों के समक्ष हम साभार सिर झुकाने ही वाले थे कि औरकुट क्षेत्र (ORKUT) से उचित जी टपक पड़े। उन्होंने सागर जी का बयान दोहराया और हमें औरकुट पर बने विश्वास जी के फैन क्लब का निमन्त्रण पकड़ाया। हम भी सब भूलकर खुशी-खुशी औरकुट जा पहुंचे। भीड़ भाड़ वाली वहां की भूलभूलैयां में भटकते भटकते हम जाने कैसे घूमते घूमाते वहाँ पर मंडली जमाए अपने दोनों सपूतों से जा टकराए। औरकुट पर हमें पाकर दोनों को मानो साँप सूंघ गया। तुरन्त फोन मिला कर ताकीद दी कि औरकुट टीन-एजर या यंग कराउड की भ्रमण-स्थली है। माता जी, आप उधर का रुख न करें तो बेहतर है।

हमें अपनी बढ़ती उमर का एहसास था पर इतनी बेदर्दी से हम यंग कराउड के घेरे से धकिया कर बाहर कर दिए जाएंगे, यह कभी सोचा न था। दिल पर ऐसी चोट लगी कि क्या बताएं। मन हुया कि कमन्डल लेकर हिमालय की ओर कूच कर जाएं। खैर किसी तरह खुद को समझाया कि दुनिया की रीत ही ऐसी है-सन्तान के लिए जहान और माँ-बाप के लिए एक कोना बियाबान।

कई रोज़ तक हम आईने के सामने खड़े होकर सिर में सफेद बाल ढ़ूंढते रहे, आखों का चेकअप करवा आए,जिम में ट्रेड-मिल पर बिना हांफे जोगिंग करी और सठियाने-बुढ़ाने का जब कोई भी सिम्टम नज़र नहीं आया तो बुढ़ापे के अवसाद को दूर धकेल, ‘अभी तो मैं जवान हूँगुनगुनाते हुए, इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बच्चे अपने राज़ खुलने से घबराते है, थोड़ी स्पेस चाहते है। जाने दो, उन्हें उनका चिरकुट औरकुट मुबारिक और हमें हमारी रसोई।

पर हाय री किस्मत। लौटे तो पाया कि हमारी रसोई में उचित जी की कृपा से ओरकुट वासियों का मेला लगा था और सब के सब शायर बेनाम पर बलिहारी जा रहे थे। चिट्ठे का टी आर पी तो टैक्सी के मीटर की भांति भाग रहा था। परन्तु यू-टयूब के होटल से मंगवाए पकवान के प्रशंसक हज़ार और हमारी पकाई डिश के लिए मुश्किल से सात-सत्तर-सौ की कतार।

हमें ऐसा लगा कि आंकड़े दबी आवाज़ में कह रहे थे कि अपनी फुल्ली फालतु बकवास को बंद करो, सृजन चाह पर लानत भेजो, कल्पना शक्ति को आराम दो और इधर उधर से सामान ला डिब्बा-सर्विस शुरू कर दो। इसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। हो सके तो लम्बी छुट्टी लेकर टैलेंट की तलाश में संजाल के भ्रमण पर निकल जाओ। अन्यथा कुछ अच्छा साहित्य पढ़ कर अपना टैलेंट चमकाओ।अगर किसी विधी यह सम्भव न हो तो रसोई पर ताला डालो। दूसरा ब्लाग बनाओ , नई पहचान सजाओ, उस पर किसी सोलहवें सावन वाली की सुन्दर तस्वीर चिपकाओ और औरकुट से वर्डप्रेस तक जहाँ चाहो आँख मटकाओ। पंख पसारो और उड़ान लगायो।

अंतर्मन की इस निराशा जनित सुनामी में बहते बहते, हमारे भीतर पलते रचनाकार की धड़कन मंदी पड़ गई। मूंछों पर ताव देते, अपने को तीस मार खाँ समझते हमारे कानफिडेंस का एक दम कचरा हो गया और सर्दी के मौसम में ठंड से कंपकंपाते हमारे लिखने के जोश पर घड़ो पानी पड़ गया। हम लम्बी छुट्टी का आवेदन-पत्र नारद जी को भेजने और आप लोगों से टाटा-बाय करने ही वाले थे कि तरकश का चुनावी तीर सामने आ गिरा।

डूबते को मानो तिनके का सहारा मिल गया। क्या करें क्या न करें का कोहरा छट गया और कलम की भक्ति का इनाम मिलने की आशा जगी। यही नहीं, आशा की किरणों के इस उजले प्रकाश में, हमें अपने दोनों हाथों में लड्डू दिखाई पड़े। यानि चित भी मेरी और पट भी मेरी। जीत गए तो वाह-वाह। हो सकता है कि इनाम के तौर पर कोई औरकुट पर हमारे लिए एक फैन-क्लब बना कर ससम्मान हमें वहाँ विराज दें। नहीं जीते तो भी बल्ले-बल्ले। अपनी जुझारू शक्ति से, फुरसतिया जी के पद-चिन्हों का अनुसरण कर, दो-तीन साल में जज की कुर्सी ज़रूर हथिया लेगें। हम भी फुरसत में है, हमें कौन जल्दी है। लब्बो-लुआब यह कि हम होंगे कामयाब एक दिन।

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ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी

December 8, 2006 · 12 Comments

छ: दिसम्बर की चौदहवीं बरसी पर शुऐब भाई के विचार जान बहुत अच्छा लगा और इस विषय पर लिखी अपनी एक कविता मुझे याद आ गई। हृदय के यह उदगार उस समय पन्नों पर बिखर गए थे जब विवादित स्थल पर खुदाई का आदेश दिया गया था। आइए,आप भी सुनिए, ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी –

परम् पिता के थे

दो पुत्र होनहार

करते थे जो उसे

जी जाँ से ज़्यादा प्यार

दोनों हर इक शैय में

थे उसका रूप तकते

वो इनके दिल में रहता

ये उसके दिल में बसते

ऊँचा जो ज़रा हो गया

बच्चों का जीवन स्तर

बन गए पिता के लिए

दो आलीशान घर

एक ने अपने घर में

उसकी मूर्ति बिठाई

आयतों से दूजे ने

दिवारें थी सजाईं

इस दिशा में टनटनाता

घन्टी रूपी साज़

उस दिशा में गूंजती

आज़ान की आवाज़

मन्दिर और मस्जिद हुया

उन दो घरों का नाम

हृदय से सरके पिता का

अब यही था धाम

 

 

सदियों तक समय का रथ

अपनी राह चलता रहा

पालनहार का परिवार

फूलता फलता रहा

फैले हुए परिवार में

कुछ बढ़ने लगे फ़ासले

सन्तानों और औलादों के

दूर हो गए काफ़िले

दूरी से गलतफहमी

नफ़रत की आंधी लाई

टकरा गए गुबार में

इक दूसरे से भाई

मन्दिर भी गया टूट

मस्जिद भी गई ढाई

पिता की खोज में वहाँ

फिर होने लगी खुदाई

काश धरा की कोख इन्हें

इसका सबूत दे पाए

एक पिता के पुत्र है

इक माता के है ये जाए।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

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संगम तट का मेला

December 2, 2006 · 10 Comments

तीन जनवरी से इलाहाबाद के संगम तट पर ढेड़ माह तक चलने वाले अर्ध-कुम्भ मेले का आयोजन होने वाला है। विदेशों में बड़े पैमाने पर इसका प्रचार किया जा रहा है। इस विषय पर अधिक जानकारी अगली पोस्ट में, अभी तो आपको लुभाने के लिए कुम्भ-2001 का पद्य मय विवरण—-

माघ मास प्रयाग बुलावे

संगम तट नगरी बस जावे

संगी साथी के दल-बल में

भक्तन् का दरिया लहरावे

रेले पर रेला चला आवे

पोलिस खड़ी कतार बंधावे

सुरसरि के बर्फीले जल में

हर इक डुबकी आन लगावे

जन्म सधावें, अर्ध चढ़ावें

पितृ-पूजा पाठ करावें

गंगा यमुना की कल कल में

भगीरथ धर्म का कर्म निभावें

धोती अंगोछा रेती सुखावें

उघड़ा तन वो खड़ी छुपावें

पर्व-स्नान की उथल पुथल में

पंडे मल्लाह माल कमावें

भोपू भजन प्रवचन सुनावे

भक्ति की गगरी छलकावे

सत्सगं के इस कोलाहल में

हर- हर गंगेघोष गुंजावे

सन्तन की पलटन जुट जावे

चिमटा ढोलक शंख बजावे

भगवा कपड़ा बांध कमर में

तान के तम्बू अलख जगावे

रोली चन्दन भस्म लगावें

जूट जटा से सिरहिं सजावें

माला पोथी ले कर तल में

कलिजुग को सत्जुगी बनावें

मंगते दान की आस लगावें

दीन हीन सी दशा बनावें

काठ कठोती धरहिं बगल में

राजा हर्ष की बाट जुहावें

चना चबेना खड़ा चबावे

हांडी में कोई भात पकावे

पाप पुण्य की फेर बदल में

अंतरी भीतर भूख सतावे

गंध पकवान की खींच बुलावे

देख जलेबी जीभ टपकावे

पूड़ी सब्ज़ी ले पत्तल में

मस्त मगन वो पेट पुजावें

लकड़ी पतरी को सुलगावें

घास पूस पर लोट लगावें

लिपट के कटे फटे कंबल में

घोर शीत को ठेंग दिखावें

उत्तर से दक्खिन मिल जावे

पच्छिम पूरबी रंग अपनावे

संगम के इस तीरथ स्थल में

चहुं दिशा संगम दिख जावे।।

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