रत्ना की रसोई

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तुम्हें पुकारे पिघला काजल

June 3, 2007 · 12 Comments

घुघूती-बासूती जी की कविता राह तुम्हारी तकती हूँऔर कवि कुलवंत जी का प्रणय-गीतपढ़ कर हमें अपनी काफी पहले लिखी एक कविता याद आ गई। अब हमारे दिनों दिन लम्बे होते लेखों को आप तकल्लुफ में झेल रहे है तो हमने सोचा क्यो न आप लोगों को थोड़ी राहत दे दें। यूं भी भरी गरमी में बरसात की कल्पना से पल भर तो ठंडक मिलती ही है। अरज़ किया है

 

नभ में बिखरे श्यामल बादल

तुम्हें पुकारे पिघला काजल

बंद खिड़की कर बंद दरवाज़ा

चुपके से तू भीतर आजा

 

 

आँखों को हौले से मींच

बाहों के घेरे में भींच

कोमल गालों को सहला दे

चिर सोए एहसास जगा दे

 

 

बढ़ जाए इस दिल की धड़कन

हो फिर से होंठों में कंपन

मधुर मिलन की मीठी बातें

पल में गुज़रें लम्बी रातें

 

 

गिरना उठना भूलें पलकें

रोम रोम से मद अणु छलके

तन थक कर हो जाए बोझिल

मन सुन्दर सपनों में गाफ़िल

 

प्रीत रीत का सूरज चमके

तन मन रूह सोने सी दमके

गम की सन्धया जाए बीत

लौट आए जो बिछुड़ा मीत।।

 

 

 

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ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी

December 8, 2006 · 12 Comments

छ: दिसम्बर की चौदहवीं बरसी पर शुऐब भाई के विचार जान बहुत अच्छा लगा और इस विषय पर लिखी अपनी एक कविता मुझे याद आ गई। हृदय के यह उदगार उस समय पन्नों पर बिखर गए थे जब विवादित स्थल पर खुदाई का आदेश दिया गया था। आइए,आप भी सुनिए, ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी –

परम् पिता के थे

दो पुत्र होनहार

करते थे जो उसे

जी जाँ से ज़्यादा प्यार

दोनों हर इक शैय में

थे उसका रूप तकते

वो इनके दिल में रहता

ये उसके दिल में बसते

ऊँचा जो ज़रा हो गया

बच्चों का जीवन स्तर

बन गए पिता के लिए

दो आलीशान घर

एक ने अपने घर में

उसकी मूर्ति बिठाई

आयतों से दूजे ने

दिवारें थी सजाईं

इस दिशा में टनटनाता

घन्टी रूपी साज़

उस दिशा में गूंजती

आज़ान की आवाज़

मन्दिर और मस्जिद हुया

उन दो घरों का नाम

हृदय से सरके पिता का

अब यही था धाम

 

 

सदियों तक समय का रथ

अपनी राह चलता रहा

पालनहार का परिवार

फूलता फलता रहा

फैले हुए परिवार में

कुछ बढ़ने लगे फ़ासले

सन्तानों और औलादों के

दूर हो गए काफ़िले

दूरी से गलतफहमी

नफ़रत की आंधी लाई

टकरा गए गुबार में

इक दूसरे से भाई

मन्दिर भी गया टूट

मस्जिद भी गई ढाई

पिता की खोज में वहाँ

फिर होने लगी खुदाई

काश धरा की कोख इन्हें

इसका सबूत दे पाए

एक पिता के पुत्र है

इक माता के है ये जाए।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Categories: कविता

संगम तट का मेला

December 2, 2006 · 10 Comments

तीन जनवरी से इलाहाबाद के संगम तट पर ढेड़ माह तक चलने वाले अर्ध-कुम्भ मेले का आयोजन होने वाला है। विदेशों में बड़े पैमाने पर इसका प्रचार किया जा रहा है। इस विषय पर अधिक जानकारी अगली पोस्ट में, अभी तो आपको लुभाने के लिए कुम्भ-2001 का पद्य मय विवरण—-

माघ मास प्रयाग बुलावे

संगम तट नगरी बस जावे

संगी साथी के दल-बल में

भक्तन् का दरिया लहरावे

रेले पर रेला चला आवे

पोलिस खड़ी कतार बंधावे

सुरसरि के बर्फीले जल में

हर इक डुबकी आन लगावे

जन्म सधावें, अर्ध चढ़ावें

पितृ-पूजा पाठ करावें

गंगा यमुना की कल कल में

भगीरथ धर्म का कर्म निभावें

धोती अंगोछा रेती सुखावें

उघड़ा तन वो खड़ी छुपावें

पर्व-स्नान की उथल पुथल में

पंडे मल्लाह माल कमावें

भोपू भजन प्रवचन सुनावे

भक्ति की गगरी छलकावे

सत्सगं के इस कोलाहल में

हर- हर गंगेघोष गुंजावे

सन्तन की पलटन जुट जावे

चिमटा ढोलक शंख बजावे

भगवा कपड़ा बांध कमर में

तान के तम्बू अलख जगावे

रोली चन्दन भस्म लगावें

जूट जटा से सिरहिं सजावें

माला पोथी ले कर तल में

कलिजुग को सत्जुगी बनावें

मंगते दान की आस लगावें

दीन हीन सी दशा बनावें

काठ कठोती धरहिं बगल में

राजा हर्ष की बाट जुहावें

चना चबेना खड़ा चबावे

हांडी में कोई भात पकावे

पाप पुण्य की फेर बदल में

अंतरी भीतर भूख सतावे

गंध पकवान की खींच बुलावे

देख जलेबी जीभ टपकावे

पूड़ी सब्ज़ी ले पत्तल में

मस्त मगन वो पेट पुजावें

लकड़ी पतरी को सुलगावें

घास पूस पर लोट लगावें

लिपट के कटे फटे कंबल में

घोर शीत को ठेंग दिखावें

उत्तर से दक्खिन मिल जावे

पच्छिम पूरबी रंग अपनावे

संगम के इस तीरथ स्थल में

चहुं दिशा संगम दिख जावे।।

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जीवन के दो रंग

November 3, 2006 · 6 Comments

निराशा

संसकारों की बेड़ियां

रिश्तों की दिवारें

तन के कारावास पर

पहरा देती सांसे

रूह ने कौन जुर्म किया है

क्यों है कैद बेचारी

अरमानों की भट्टी चढ़ने में

क्या उसकी लाचारी

आँखों की खिड़की से दिखती

कभी उसकी परछांई

आज़ादी के लिए तरसती

थकी हारी उकताई

अपमान के आंसू पीती

खाती नफरत के कोड़े

सही गल्त की आंधी उसकी

काया को झकझोरे

ज़ुल्मों के पाटों में पिसती

तिल तिल बिखर न जाए

ऐ मालिक अब मुक्ति दे दो

कहीं रूह मर न जाए।

 

आशा

काश मै एसी तकदीर पाऊं

जीवन के पल छिन को यूं न गवाऊं

जीऊं तो जीने के मायने बदल दूं

सांसो के सुर और तराने बदल दूं

जान हो मेरी अमानत जहां की

काम नशा और इच्छा हो साकी

माटी के तन से यूँ महके अपनापन

गीली मिट्टी से ज्यों उड़ता सोंधापन

जाने अन्जाने तूलिका जो उठाऊं

बेरंग तस्वीरों को फिर से सजाऊं

अधरों पर उनके हंसी सी खिले

भावों को बोलती भावुकता मिले

रंगों की पाए वो इतनी विविधता

सांझ का सूरज ज्यों दिखे पिघलता

खामोश जुबां पर कलम मेरी बोले

अनुभव की गठरी को धीरे से खोले

कविता गूंजे जैसे कोयल की कूक

किस्से कहानी ज्यों सर्दी की धूप

लेखों से अर्थों का सागर बहे

भाषा जो सीधी जा दिल में रहे

समय है कम अरमान बहुतेरे

कैसे सच होंगे सब सपने ये मेरे

तदबीर से ऐसी तकदीर पाऊं

कर्मों से जन्मों का कर्ज़ा चुकाऊं।

Categories: कविता

हालत नौनिहालों की

October 10, 2006 · 8 Comments

परिचर्चा पर एक सदस्या ने हमें फिल्मी कव्वाली की धुन पर, बच्चों के जीवन से सम्बन्धित एक गीत लिखने को कहा था। नीचे लिखा गीत उसी फरमाइश का परिणाम है।

आज इस सादी डिश से काम चला लें । वादा है, अगली बार हम ऊँची और मशहूर दुकानों पर उम्दा ढंग से बने, बढिया व्यंजन लेकर उपस्थित होगें।

वो क्या है कि दो रोज़ पहले ही कुछ मशहूर शायरों और कवियों से मुलाकात हुई है। ज़ाहिर है मुलाकात हुई है तो बात भी हुई होगीं।

अब बात हो और दूर तलक न जाए यह तो सम्भव नहीं है।

 

गीत

 

( गीत और धुनये देश है वीर जवानों का,

अलबेलों का मस्तानों का–)

सुनो हालत हम मतवालों की

इस देश के नौनिहालों की

हम दिल का हाल, होए-होए

हम दिल का हाल सुनाते है

तुम्हें दर्द अपना दिखलाते है

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हो————————-

हम ज़रा सा बस तुतलाए थे

माँ ने ढेरों सबक रटाए थे

यहाँ मुँह खोलना, होए- होए

यहाँ बोलना तक जंजाल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुया

———————

हो———————–

अभी चलना सीख न पाए थे

पापा स्कूल ले आए थे

यहाँ कदम बढ़ाना, होए-होए

यहाँ चलना तक भूचाल हुआ

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

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हो———————–

जब भोऱ के सपने आते है

माँ-बाप झिंझोड़ जगाते है

यहाँ सपन-सलौना,होए-होए

यहाँ सपनों का आकाल हुआ

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

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हो———————–

जब क्लास में भूख सताती है

तो टीचर पाठ पढ़ाती है

यहाँ खाना-पीना, होए-होए

यहाँ खाना तक मुहाल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

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हो———————–

संध्या को खेल न पाते है

हम होमवर्क निपटाते है

यहाँ खेलना-कूदना, होए-होए

यहाँ खेलना एक ख्याल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

———————

हो———————–

जब से दुनिया में आए है

हम खुल कर न मुस्काए है

यहाँ हंसना-हंसाना,होए- होए

यहाँ हंसना तक बे -ताल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुया

यहाँ बोलना तक जंजाल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुया

यहाँ चलना तक भूचाल हुआ

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ सपनों का आकाल हुआ

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ खाना तक मुहाल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ खेलना एक ख्याल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ हंसना तक बेताल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुया

Categories: कविता