घुघूती-बासूती जी की कविता ‘राह तुम्हारी तकती हूँ‘ और कवि कुलवंत जी का ‘प्रणय-गीत‘ पढ़ कर हमें अपनी काफी पहले लिखी एक कविता याद आ गई। अब हमारे दिनों दिन लम्बे होते लेखों को आप तकल्लुफ में झेल रहे है तो हमने सोचा क्यो न आप लोगों को थोड़ी राहत दे दें। यूं भी भरी गरमी में बरसात की कल्पना से पल भर तो ठंडक मिलती ही है। अरज़ किया है–
नभ में बिखरे श्यामल बादल
तुम्हें पुकारे पिघला काजल
बंद खिड़की कर बंद दरवाज़ा
चुपके से तू भीतर आजा
आँखों को हौले से मींच
बाहों के घेरे में भींच
कोमल गालों को सहला दे
चिर सोए एहसास जगा दे
बढ़ जाए इस दिल की धड़कन
हो फिर से होंठों में कंपन
मधुर मिलन की मीठी बातें
पल में गुज़रें लम्बी रातें
गिरना उठना भूलें पलकें
रोम रोम से मद अणु छलके
तन थक कर हो जाए बोझिल
मन सुन्दर सपनों में गाफ़िल
प्रीत रीत का सूरज चमके
तन मन रूह सोने सी दमके
गम की सन्धया जाए बीत
लौट आए जो बिछुड़ा मीत।।








