बापू की प्रतिमा बनवाएं आदर्शों की बलि चढ़ाएं दिल से विदेशी देसी परिवेष राजनीति ने बदला भेस रक्षक ही भक्षक बन जाएं नित नए हथकन्डे अपनाएं बदलें नीति दल और भेष ऐसे नेता रह गए शेष गली गली दंगे भड़काएं प्रजातन्त्र का बिगुल बजाएं ना कोई धर्म ना जाति विशेष ऐसे नेता रह गए शेष कुर्सी खातिर खून बहाएं देश का अंग-अंग बांट के खाएं काले कर्म हैं उजले वेश ऐसे नेता रह गए शेष घोर घोटाले घटित कराएं तििस पर स्वयं को सही बताएं रोज़ कचहरी होते पेश ऐसे नेता रह गए शेष उमर हमारी बड़ती जाए तारीख़ अगली पड़ती जाए निपटे हम, ना निपटे केस गर्दिश में गाँधी का देश कितनी हम तफ्तीश कराएं दूजा गाँधी ढूंढ ना पाएं गायब गाँधी,लाठी शेष गुमशुदा है गाँधी का देश राजनीति अब बनी है ज़िल्लत सही नेता की है बड़ी किल्लत नेतागीरि बस रह गई शेष गर्त गिरा गाँधी का देश ।। टैगः anugunj, अनुगूँज
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अनुगूंज२०- नेतागिरी, राजनीति और नेता
June 30, 2006 · 2 Comments
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अनुगूँज १९-संसकृतियां दो, आदमी एक
May 17, 2006 · 8 Comments
संसकृतियां दो ,आदमी एक-जैसे ही पढ़ा तो शोले के गब्बर सिहं का चर्चित जुमला, “आदमी तीन और गोलियां छ:,बोहूत बेइन्साफी है” दिमाग में कौंध गया । दिमाग को झटक कर जब अभिनव जी के विचार पढ़े तो हम भी गब्बरमय हो गए और बोल उठे –”संसकृतियां दो और आदमी एक-बहुत नाइन्साफी है ।” पर साहब,ध्यान से देखिए, यह ज़िन्दगी भी तो एक नाइन्साफी है । अच्छे खासे एडम बाबा ईव बा के साथ मस्ती काट रहे थे पर जाने क्या सूझी सेब तोड़ खा लिया औऱ फोकट में आने वाली नस्लों को धरती पर तमाम नाइन्साफिय़ों के बीच पिसने को ठेल दिया ।अब जब हम सब इस जिन्दगी को झेल रहे है तो दो संसकृतियों की क्या बिसात है, हँसकर ,रोकर, कुछ लेकर,कुछ देकर निपटारा कर ही देंगे । बस जरा यह पता चल जाए कि संसकृति है किस चिड़िया का नाम । शब्दकोश उठा कर देखा तो पाया संसकृति “आचरणगत परम्परा” को कहते है,यानि वह आचरण जो परम्परा से मिला है या वो सोच जो जीवन मुल्य बन परम्परा के रूप में हमारे पास आई है। दूसरे शब्दों में संसकृति पीड़ीयों से चली आ रही सोच या आचरण का वह पुलिन्दा है जिसका भारी भरकम बोझ हमारे कन्धों पर पैदा होते ही रख दिया जाता है तथा जिसे ढो कर हमें अगली पीड़ी तक ले जाना है। किसी भी सभ्यता कौम या जाति का आचरण उसके पनपने के स्थान की भुगोलिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों पर बेहद निर्भर करता है। एक इन्सान परिस्थितियों के अनुसार ही ढलता है और उसका वही आचरण धीरे धीरे परम्परा बन संसकृति का रूप धर लेता है । अर्थात वर्तमान आचरण भविष्य़ में संसकृति कहलाएगा और क्योंकि प्रत्येक स्थान के वासियों का आचरण भिन्न है अत: यह धरती दो नहीं अपितु अनेक संसकृतियों की हांडी है । मैं तो यहाँ तक मानती हूँ कि एक परिवार,जो संसकृति के विराट स्वरूप की सबसे छोटीईकाई है, की अपनी एक विशेष संसकृति है जो भिन्न होते हुए भी मूल रूप से मुख्य संसकृति से जुड़ी हुई है । हर संसकृति अपने भीतर अच्छाईयों और बुराीईयों को समेटे सम्पूर्ण है,जरूरत केवल उसकी अच्छाीईयों को अपना कर, बुराईयों को नज़र-अन्दाज कर उसके मूल रूप को समझने और जानने भर की है । यहाँ पर बात क्योंकि केवल दो संसकृतियों की है और अभिनव जी का इशारा पूर्वी और पश्चिमी संसकृति की ओर है तो हम अब इसी विषय पर आते है । एक ओर तो वे प्रवासी भारतीए या एशियाई है जो पश्चिमी संसकृति के बीच रहकर अपनी धरोधर को सुरक्षित रखने का यत्न कर रहे है और दूसरी तरफ़ वे अप्रवासी जो अपनी संसकृति के दुर्ग में रह कर भी संसारीकरण के कारण उनके घरों में घुसी चली आ रही पश्चिमी आँधी से परेशान है । जहाँ तक प्रवासी जन का सवाल है तो मैं अभिनव जी के इस कथन से सहमत नहीं हूँ कि वे अपनी संसकृति से जुड़े है, बल्कि मेरे विचार से क्योकि वे अपनी संसकृति की मुख्य धारा से कटे हुए है, इसीलिए अपने साथ ले गये संसकारों को संजो कर रखना चाहते है,अपने देश से दूर रहकर उनके लिए अपनी संसकृति का महत्व बड़ गया है तभी वे उसका बीज अपनी सन्तानों में रोपित कर विदेशी धरती पर अपनी संसकृति का पौधा लगा रहे है,पर क्योंकि धरती और वातावरण भिन्न है अत: वास्तव में वे एक नई ससंकृति को जन्म दे रहेे है जििसका सम्बन्ध केवल मानवता से है और जिसका मूलभूत सिंद्दान्त केवल व्यक्तिगत आचरण है अर्थात एक व्यक्ति का संसकारी होना अधिक महत्व रखता है फिर चाहे वह किसी भी संसकृति का क्यों न हो । यही नहीं प्रवासी भारतीए पश्चिमी सभ्यता के लिए पूर्वी संसकृति के प्रतीक चिन्ह बन पश्चिमी जगत को अपनी ओर आकर्षित कर रहे है। हिन्दी भाषा की ओर रूची,हमारे रीति-रिवाजों अनुसार विवाह की चाह, हमारे प्रचीन ग्रन्थों पर शोध, धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सेदारी,वेषभूषा और खानपान के प्रति उत्सुकता ये सब उस नई संसकृति की नीवं को पुख्ता कर रहे है । विदेश भ्रमण से वापिस लौटते समय मेरी मुलाकात एक ऐसे अमरीकी परिवार से हुई जो भारत में पिछले कई वर्षों से केवल इसलिए रह रहा है, क्योंकि वह अपने बच्चों में भारतीए संसकार देखना चाहता है। नज़र घुमा कर देखें तो ऐसी कई नारियां पाएंगेै जो पश्चिम में पलने बड़ने के बाद भी भारतीए नागरिकों से विवाह कर पूर्णतया हमारी संसकृति में रंग गई है। कल ही का समाचार है कि एक विदेशी महिला ने जगन्नाथ मन्दिर -पुरी के रख-रखाव के लिए १.७८ करोड़ का दान दिया है ।अर्थात पश्चिम ही नहीं पूरब भी पश्चिम पर छा रहा है । अब बारी आती है अप्रवासीयों की दुविधा की । इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो जब भारत में अंग्रेज़ी पढ़ाने का चलन हुया था तो कितना हो-हल्ला मचाा था पर आज इसी भाषा को अपनाने की उदारता के चलते हम संसार में अपनी पैठ बना पाए है । शिक्षा का प्रसार,सामान अधिकार,अधिकार के प्रति सजगता,नारी उत्थान ये सब पश्चिम की ही देन है । यह सही है कि बेशर्मीी की हद तक खुलापन हमारी नींदें उड़ा रहा है पर नई पीड़ी इस खुलेपन के बीच पल बढ़ रही है,अत: यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। बिल्कुल वैसे ही जैसे प्रेम-विवाह ,लड़के-लड़कियों का खुले-आम बेहिचक मिलना, हमारे लिए आम है,जबकि बीती पीड़ी के लिए यह सब नागवार था । हर पीड़ी को सही और गलत में फरक करने की अक्ल विरासत में मिलती है वो खुद ही अपनी राह खोज लेती है। हमें तो केवल उसे सही -गलत का नाप तोल सिखाना है। संक्षेप में पूरब और पश्चिम अपनी सीमाएं तज एक दूसरे की ओर निकल पड़े है,एक आगे बड़ रहा है दूजा चरम सीमा पर पहुँच लौट रहा है,– ” कुछ हम बदल रहे है, कुछ वो बदल रहे है, खुशी तो है इस बात की, किसी मुकाम पर मिल रहे है ।” पर जब तक दोनों उस मुकाम तक नहीं पहुँचते तब तक हम क्या करें,हम तो दोनों धारायों में गोते खाते तिनके का सहारा ढूँढ रहे है। पर ध्यान से देखिए दोनों संसकृतियों के मूल सिद्धान्तों से बना जहाज़ हमारे सामने खड़ा है, अब उस परसवार होना है तो अपने संसकारों के पुलिन्दे का अनावश्यक बोझ तो कम करना ही पड़ेगा । घबराइए मत, जिस प्रकार हम अपनी पुराने संसकारों की नौका में ज़रूरत भर के बदलाव कर यहाँ तक लाए है, नई पीड़ी भी संभल कर अक्लमंदी से इस जहाज़ को एक ऐसी बन्दरगाह पर ला खड़ा करेगी,जहाँ होगी— एक संसकृति,एक आदमी । दूध का दूध, पानी का पानी । कोई बेइन्साफी नही । पर होगीं नई परेशानियां ,कठिन चुनौतियां ,वे भी हमारी तरह ही बड़बड़ाएगें । क्योंकि उन्हें भी तो आखिर उस खाए सेब की कीमत चुकानी है । . टैगः anugunj, अनुगूँज
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