यात्रा-विवरण मैंने कभी नहीं लिखे। मुझे लगता था कि यात्रा अगर अनूप जी साइकिल यात्रा की तरह ज़रा वखरी टाइप की हो तभी लिखने में कुछ नवीनता है। वरना चट-पट बस, कार, रेल या जहाज़ में बैठे और गंतव्य पर पंहुच कर घिसे-पिटे पर्यटन-स्थल देखकर उस पर बयानबाज़ी करना तो सरासर अधजल गगरी छलकत जाए के समान बचकाना और बेमाना है। परन्तु उन्मुक्त जी, मनीष जी व अन्य चिट्ठाकारों के यात्रा-संस्मरण पढ़कर महसूस किया कि मेरी यह धारणा ही बचकानी और बेमानी है।
अन्तरजाल पर और पर्यटन-पुस्तकों में किसी स्थान के विषय में चाहे पूर्ण जानकारी मिल जाए पर उस स्थान का आँखों देखा हाल उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी पुस्तक को पढ़कर उसके विषय में बात करना या लिखना । इससे न केवल उस किताब/स्थान के बारे में अन्य लोगों के मन में दिलचस्पी पैदा होती है बल्कि जिन्होने उस किताब को पढ़ा होता है या वो स्थान देखा होता है उन्हें उस विषय से सम्बन्धित, दिमाग के पिछवाड़े वाले स्टोर में पड़ी, ढेरों बातें याद आ जाती है और विचारों की रेल सरपट दौड़ने लगती है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुया है। इसलिए अगली कुछ-एक पोस्ट में हम नारद पर पढ़ी यात्रायों के दौरान तरोताज़ा हुए किस्सों को आपके सामने रख रहे है। पहला किस्सा उन्मुक्त जी की गोआ यात्रा से सम्बन्धित है।
जब उन्मुक्त जी अपनी गोआ की यात्रा और अपने होटल (Cicade-de-Goa) का सरस वर्णन कर रहे थे तो यकायक मेरी आँखों के सामने उस होटल के शेफ का चेहरा घूम गया था। अब आप कहेंगे-लो जी यह भी क्या बात हुई उन्मुक्त जी तरण-ताल के किनारे लेटी सुन्दर कन्यायों से रूबरू करवा रहे थे और हमें खानसामा नज़र आ रहा था।। कितना डिफेक्टिव और लचर इमेजीनेशन है हमारा। पर आपने यह तो सुना ही होगा-जाको जैसी भावना–। उन्मुक्त जी उन्मुक्त है और हम ठहरे रसोईदार, हमारे तो लेख,किस्से, कविताएं भी सबको पकवान नज़र आते है और सच मानिए, हम उन्हें आपके लिए लिखते, मेरा मतलब है पकाते भी बड़ी शिद्दत से है। इसीलिए शायद बिकनी पहनी नार की जगह हमें लम्बी टोपी वाला ऱसोईदार दिखा।
हमारा रसोईदार यानि कि शेफ खाना बेहद बढ़िया और लज़ीज़ बनाता था और ‘चीनी कम‘ के अमिताभ के अनुसार-सच्चे मायने में उच्च-कोटि का कलाकार था। पाँच दिन हम उस होटल में रहे । रोज़ बुफे-सकीम के तहत नाश्ता, लंच और डिनर मिला पर एक दिन भी मैन्यू में पकवानों को दोहराया नहीं गया। इतना ही नहीं वो रोज़ लंच पर कैरेमल ( भुनी,कड़ी शक्कर जिसका स्वाद लेमन-ड्राप की तरह होता है) से इतने खूबसूरत दृश्य बनाता था कि ऐसा प्रतीत होता था जैसे वे भूरे,रंगीन कांच से बने हो। कभी नाचता जोड़ा, कभी खजूर के पेड़ो से भरा जलज़ीरा तो कभी सुन्दर गुढ़िया। उसकी कला मुझे इतनी भाई कि मन हुया उसे मिलकर उसकी प्रशंसा करूं।
खाली तारीफ करना अच्छा नहीं लगा। परन्तु पाँच सितारा होटल के शेफ को 100-500 देना उसकी तौहीन करना था और इससे ज्यादा गाढ़ी कमाई मुफ्त में बाँटना ज़रा कष्टकारी। इसलिए जिन्दगी में पहली बार हमने कैसिनो जाने का विचार बनाया। सोचा बस पाँच सौ लगाएगें अगर जीते तो सारा माल शेफ का और हारे तो समझेगे हमने पाँच सौ का नोट उस पर वार दिया। उस रात हम तीन हज़ार जीते। अगले दिन शेफ से मिले, उसकी तारीफ की और इमानदारी से एक-एक हज़ार के तीन नोट दिए। जब उसको कैसिनो वाली बात बताई तो उसके दिल के भाव उसके चेहरे और उसकी आँखों में साफ ज़ाहिर थे। चेहरा मुस्कुरा रहा था पर आँखों में नमी थी। चुपचाप एक हज़ार का एक नोट उसने अपनी ऊपर की जेब में रखा ,टोपी उतार कर हाथ में ली और बोला– “मैम, अगर आप बुरा न मानें तो मैं दो हज़ार अपनी टीम में बांटना चाहूंगा क्योंकि मेरे प्रयास में उनकी मेहनत भी शामिल है। पर आपका यह एक नोट हमेशा मेरे दिल के करीब वाली जेब में रहेगा क्योंकि इसमें आपकी दुआ और मेरी किस्मत छुपी है। आपने मेरे लिए इतना सोचा, मुझे समझ नहीं आ रहा मै आपको कैसे थैक्य़ू कहूँ।” मैंने हाथ मिलाने के लिए जो हाथ बड़ाया तो उसने अदब से झुक कर हाथ को चूमा और भरी आँखें लिए किचेन के भीतर चला गया।
मेरी यह पोस्ट नमन है उस कलाकार की कला एंव उसकी शालीनता के प्रति और धन्यवाद है उन्मुक्त जी को जिनके विवरण से इस किस्से को हवा मिली।









बहुत अच्छा लगा पढ़कर. यह शेफ तो न सिर्फ एक बेहतरीन शेफ बल्कि एक बेहतरीन इन्सान भी निकला. साथ ही अपनी टीम को पूरा क्रेडिट देना भी एक महानता है वरना अक्सर लोग पूरा क्रेडिट खुद ही रख लेते है.
हे भगवान आपने जुआ खेला !:)
चलिए शेफ के लिए खेला इसलिए चलेगा। बढ़िया शुरुआत रही ..आगे के संस्मरणों का इंतजार रहेगा।
क्या बात है। हम क्यों ने शेफ के टीम के सदस्य हुऐ
ऐसे जगह चाहे जो भी हो जितनी भी घिसी पिटी हो। प्रत्येक व्यक्ति उसी जगह अलग अलग तरह से देखता है। उसका अनुभव भी अलग होता है और हर अलग अनुभव आपको कुछ न कुछ सिखाता है। इसलिये मेरे विचार से लिखना चाहिये।
मैं भी कैसीनो गया था। न कोई खेल समझ पाये, न ही खेल पाये, निकाल अलग से दिये गये
बहुत खूब!!
आभार संस्मरण बांटने के लिए!!
काफ़ी दिन बाद आपकी पोस्ट पढ़ने को मिली। अच्छा लगा। तीन हजार टिप भौत हैं भाई। काश्न हम रसोइये होते ,केवल उस समय के लिये।
रत्ना जी
बहुत बढिया कविता लिखा है आपने –
शेफ साहब अब हमेशा याद रह जायेँगे — ऐसे किस्स्से लिखतँ रहेँ
स -स्नेह,–लावण्या
इस संस्मरण से यह शिक्षा मिली कि, जुंआ खेलने से;
ठीक कहा ना ? !
1. आर्थिक लाभ होता है;
2. मोटी टिप दे सकते हैं
3. शेफ़ को भावनात्मक रूप से खुशी दे सकते हैं
@समीर जी,अपनी इन्सानियत की वजह से ही वो मुझेयाद है।
@मनीष बूरी आदत जल्दी असर करती हैसो हम अब पक्के जुआड़ी हो गए है।
@उन्मुक्त ,संजीत और लावण्या जी,मनोबल बढ़ाने का धन्यवाद।
@अनूप जी,सच कहते है,इतना टिप तो हमें पहली बार खाना बनाने पर भीी नहीं मिला था पर क्या करें हम ज़रा सेन्टी हो गए थे।
@अनुराग उस जीत की लालच में लगातार हार रहे है।लगता है वो जीत उसकी अच्छी किस्मत या फिर हमारी नोबल भावना के कारण थी।
आपका संस्मरण पसंद आया। आगे भी ऐसे किस्से सुनाती रहें।
आप पुरुष होतीं तो ऐसा न होता।
आपका संस्मरण अच्छा लगा।
बडे ही अच्छे अंदाज से आपने लिखा है।
बहुत बढ़िया लगा पढ़ कर !
आप कहां हैं इन दिनों? कभी-कभार कुछ लिखते रहा कीजिए। आपकी रसोई के पकवान बहुत दिनों से खाने को नहीं मिले।
bahut khub likha aapne
बहुत दिन हुए लौट आइए……
यह ब्लॉग बंद हो गया है क्या?? या खुलने की संभावना है? गुजर रहा था तो सोचा-आवाज देता चलूँ.
Good..
namsakaar ji
Is dil ko dosto ki yad aati hai,
Jo is dil ko udaas kar jaati hai,
Koi puchta hai kitni yad aati hai,
Kuch keh nhi pate bas Aankh bar aati hai.