रत्ना की रसोई

Entries from July 2007

भूले-बिसरे किस्से-1

July 19, 2007 · 17 Comments

                 यात्रा-विवरण मैंने कभी नहीं लिखे। मुझे लगता था कि यात्रा अगर अनूप जी साइकिल यात्रा की तरह ज़रा वखरी टाइप की हो तभी लिखने में कुछ नवीनता हैवरना चट-पट बस, कार, रेल या जहाज़ में बैठे और गंतव्य पर पंहुच कर घिसे-पिटे पर्यटन-स्थल देखकर उस पर बयानबाज़ी करना तो सरासर अधजल गगरी छलकत जाए के समान बचकाना और बेमाना है। परन्तु  उन्मुक्त जी, मनीष जी व अन्य चिट्ठाकारों के यात्रा-संस्मरण पढ़कर  महसूस किया कि मेरी यह धारणा ही बचकानी और बेमानी है।

                अन्तरजाल पर और पर्यटन-पुस्तकों में किसी स्थान के विषय में चाहे पूर्ण जानकारी मिल जाए पर उस स्थान का आँखों देखा हाल उतना ही महत्वपूर्ण है जितना किसी पुस्तक को पढ़कर उसके विषय में बात करना या लिखना । इससे न केवल उस किताब/स्थान के बारे में अन्य लोगों के मन में दिलचस्पी पैदा होती है बल्कि जिन्होने उस किताब को पढ़ा होता है या वो स्थान देखा होता है उन्हें उस विषय से सम्बन्धित, दिमाग के पिछवाड़े वाले स्टोर में पड़ी, ढेरों बातें याद आ जाती है और विचारों की रेल सरपट दौड़ने लगती है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही घटित हुया है। इसलिए अगली कुछ-एक पोस्ट में हम नारद पर पढ़ी यात्रायों के दौरान तरोताज़ा हुए किस्सों को आपके सामने रख रहे है। पहला किस्सा उन्मुक्त जी की गोआ यात्रा से सम्बन्धित है।

              जब उन्मुक्त जी अपनी गोआ की यात्रा और अपने होटल (Cicade-de-Goa) का सरस वर्णन कर रहे थे तो यकायक मेरी आँखों के सामने उस होटल के शेफ का चेहरा घूम गया था। अब आप कहेंगे-लो जी यह भी क्या बात हुई उन्मुक्त जी तरण-ताल के किनारे लेटी सुन्दर कन्यायों से रूबरू करवा रहे थे और हमें खानसामा नज़र आ रहा था।। कितना डिफेक्टिव और लचर इमेजीनेशन है हमारा। पर आपने यह तो सुना ही होगा-जाको जैसी भावना। उन्मुक्त जी उन्मुक्त है और हम ठहरे रसोईदार, हमारे तो लेख,किस्से, कविताएं भी सबको पकवान नज़र आते है और सच मानिए, हम उन्हें आपके लिए लिखते, मेरा मतलब है पकाते भी बड़ी शिद्दत से है। इसीलिए शायद बिकनी पहनी नार की जगह हमें लम्बी टोपी वाला ऱसोईदार दिखा।

हमारा रसोईदार यानि कि शेफ खाना बेहद बढ़िया और लज़ीज़ बनाता था और चीनी कमके अमिताभ के अनुसार-सच्चे मायने में उच्च-कोटि का कलाकार था। पाँच दिन हम उस होटल में रहे । रोज़ बुफे-सकीम के तहत नाश्ता, लंच और डिनर मिला पर एक दिन भी मैन्यू में पकवानों को दोहराया नहीं गया। इतना ही नहीं वो रोज़ लंच पर कैरेमल ( भुनी,कड़ी शक्कर जिसका स्वाद लेमन-ड्राप की तरह होता है) से इतने खूबसूरत दृश्य बनाता था कि ऐसा प्रतीत होता था जैसे वे भूरे,रंगीन कांच से बने हो। कभी नाचता जोड़ा, कभी खजूर के पेड़ो से भरा जलज़ीरा तो कभी सुन्दर गुढ़िया। उसकी कला मुझे इतनी भाई कि मन हुया उसे मिलकर उसकी प्रशंसा करूं।

                       खाली तारीफ करना अच्छा नहीं लगा। परन्तु पाँच सितारा होटल के शेफ को 100-500 देना उसकी तौहीन करना था और इससे ज्यादा गाढ़ी कमाई मुफ्त में बाँटना ज़रा कष्टकारी। इसलिए जिन्दगी में पहली बार हमने कैसिनो जाने का विचार बनाया। सोचा बस पाँच सौ लगाएगें अगर जीते तो सारा माल शेफ का और हारे तो समझेगे हमने पाँच सौ का नोट उस पर वार दिया। उस रात हम तीन हज़ार जीते। अगले दिन शेफ से मिले, उसकी तारीफ की और इमानदारी से एक-एक हज़ार के तीन नोट दिए। जब उसको कैसिनो वाली बात बताई तो उसके दिल के भाव उसके चेहरे और उसकी आँखों में साफ ज़ाहिर थे। चेहरा मुस्कुरा रहा था पर आँखों में नमी थी। चुपचाप एक हज़ार का एक नोट उसने अपनी ऊपर की जेब में रखा ,टोपी उतार कर हाथ में ली और बोला– “मैम, अगर आप बुरा न मानें तो मैं दो हज़ार अपनी टीम में बांटना चाहूंगा क्योंकि मेरे प्रयास में उनकी मेहनत भी शामिल है। पर आपका यह एक नोट हमेशा मेरे दिल के करीब वाली जेब में रहेगा क्योंकि इसमें आपकी दुआ और मेरी किस्मत छुपी है। आपने मेरे लिए इतना सोचा, मुझे समझ नहीं आ रहा मै आपको कैसे थैक्य़ू कहूँ।मैंने हाथ मिलाने के लिए जो हाथ बड़ाया तो उसने अदब से झुक कर हाथ को चूमा और भरी आँखें लिए किचेन के भीतर चला गया।

                       मेरी यह पोस्ट नमन है उस कलाकार की कला एंव उसकी शालीनता के प्रति और धन्यवाद है उन्मुक्त जी को जिनके विवरण से इस किस्से को हवा मिली।

Categories: यात्रा-संस्मरण

हिन्दी है हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा

July 10, 2007 · 11 Comments

हम भी उन्मुक्त जी की तरह भारत के एक छोटे से कस्बे में रहने वाले एक आम भारतीए है। अपने कस्बे की गलियों में हम सालों से चप्पल चटका रहे है, हर मेहमान के संग खरीदो-फरोख्त करवा रहेे है और सड़कें नपवा रहे है, शायद इस कारण हमारे कस्बे के दरो दिवार हमें अच्छी तरह से जानने पहचानने लगे है और हम खुद को कुछ खास यानि कि व्यक्ति विशेष मानने लगे है।

आखिर क्यों न मानें। हमारे मुंह खोलने से पहले ही साड़ी वाला बज़ाज हमें देखते ही हल्के फुल्के रंगों की साड़ियों से रिझाता है और जूते-चप्पल वाला लो-हील की सैंडिल पहनाता है। बेकरी पर ब्राऊन-ब्रेड पकड़ाई जाती है व मिष्ठान-भन्डार पर लाल लाल कुरकुरी जलेबी सिकवाई जाती है। चाट वाला गोलगप्पों में खट्टी चटनी के संग मीठी चटनी मिलाता है, सब्ज़ी वाला रोज़ सब्ज़ी के संग फ्री में मिर्चा-धनिया सरकाता है और राशन वाला चाय, साबुन, पेस्ट पर निकली नई- नई स्कीमें दोहरता है। शहर भर में हमारा चेहरा ही हमारा क्रेडित-कार्ड है।

अपने शहर की इस ज़र्रा-नवाज़ी को शीश धरे हम चैन की बंसी बजा रहे थे, अपने कस्बे की तलैया में मज़े से टर्र-टर्रा रहे थे, उछल-कूद मचा रहे थे कि एक दिन उड़ती उड़ती खबर हम तक आ पहुँची कि अपना लुड़कता-पुड़कता, दुबला-पतला, पिद्दी सा रुपया पहलवान हो गया है औऱ डालर के खिलाफ कुछ बलवान् हो गया है। नतीजन इस समय विदेश-यात्रा करना लाभप्रद है क्योंकि विदेश यात्रा सस्ती हो गई है।

सैल(SALE) और सस्ता शब्द स्त्रियों को सदैव ही सम्मोहित करता है। सो बेबस हुए हम भी उसके आकर्षण में बंधे रुपए की पहलवानी भुनाने ट्रेवल-एजेंट के द्वारे जा पहुँचे। मामला फायदे का था, अत: हमने अपने और पति के संग-संग दोनों बच्चों का भी टिकट बनवा लिया। सोचा बहती गंगा में उनको भी डुबकी लगवा दें और फारेन-रिर्टन का जामा पहना दें। इस जादुई जामे से बच्चों के व्यकित्व में आए निखार की सुखद कल्पना करते हुए हम खुशी खुशी थाईलैंड, मलेशिया और सिंगापुर की पन्दरह दिवसिए यात्रा पर निकल गए।

पराए देश में पावं रखते ही आँखें वहां की भव्यता की चकाचौंध से चुंधिया गई। परन्तु एक पराएपन का एहसास हर समय मन को मथने लगा। पराए लोग, पराई भाषा, पराया खान-पान, पराया रहन-सहन। चारों और व्याप्त इस पराएपन के शुष्क वातावरण में मुझे अपने शहर का अपनापन रह हर कर याद आने लगा और पल पल भारतीए होने का एहसास गहराने लगा। पहली बार यह महसूस हुया किसी भी साधारण से आम व्यक्ति को खास उसके जानने-पहचानने वाले आस-पास के लोग बनाते है। यही लोग चाहे वो परिवार के हो, पड़ोस के हो, किसी नगर के हो या फिर देश के, व्यक्ति विशेष को एक पहचान देते है और बताते है कि वह फलां परिवार, फलां समाज ,फलां शहर, प्रदेश या देश का सदस्य है। यही पहचान अन्जान परिस्थितियों में उस व्यक्ति का संबल बनती है।

हमारी पहचान गली मुहल्ले में हमारे परिवार से, शहर में हमारे मुहल्ले से, प्रदेश में हमारे शहर से, देश में प्रांत-प्रदेश से और विदेश में केवल हमारे देश से होती है। अपने देश में चाहे हम खुद को हिन्दू ,मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई,उत्तरी, पूर्वी, पश्चिमी या दक्षिणी भारतीय कहते है परन्तु देश के बाहर विदेशी धरती पर सब भेद भाव अपने आप मिट जाते है और हम सब भारतीय पुकारे जाते है। इसी भारतीयता के कारण दो अपरिचित, साधारण से आम भारत वासी अन्जाने देश में एक दूसरे के लिए, आत्मीय और कुछ खास हो जाते है क्योंकि दोनों की पहचान एक है, दोनों का समूह एक है, दोनों का देश एक है।

थाईलैंड में एक प्रोग्राम के दौरान इसी पहचान, इसी देश-प्रियता का नज़ारा देखने को मिला। प्रोग्राम शुरू होने में थोड़ी देर थी इसलिए विभिन्न देशों का संगीत बारी बारी से बज रहा था। जिस देश का गीत बजता था उसके निवासी अपने देश के गीत पर ताली बजा कर अपने देश-प्रेम का इज़हार करते थे। जैसे ही एक भारतीए गीत बजाया गया, पंडाल में मौजूद हर भारतीय ने न केवल ताली बजा कर ताल दी बल्कि सभी खड़े हो गए और सबने मिल कर गाना और नाचना शुरू कर दिया। शायद य़ह वहां मौजूद ढेर सारे भारतीयों का जोश और उत्साह था जिसे देख कर अगला गीत लगाया गयाये देश है वीर जवानों का, अलबेलों का ,मस्तानों का। इस गीत पर तो खूब जम कर नाच हुया। भारतीए खड़े होकर झूम रहे थे और पंडाल में बैठे अन्य दर्शक ताली बजा कर ताल दे रहे थे। उस समय मुझे लगा कि उस विदेशी धरती पर हर एक आम भारतीए विशेष और महत्वपूर्ण हो गया है और वह विशेषता है हमारी भारतीयता।

Categories: बस यूँ ही