रत्ना की रसोई

तुम्हें पुकारे पिघला काजल

June 3, 2007 · 13 Comments

घुघूती-बासूती जी की कविता राह तुम्हारी तकती हूँऔर कवि कुलवंत जी का प्रणय-गीतपढ़ कर हमें अपनी काफी पहले लिखी एक कविता याद आ गई। अब हमारे दिनों दिन लम्बे होते लेखों को आप तकल्लुफ में झेल रहे है तो हमने सोचा क्यो न आप लोगों को थोड़ी राहत दे दें। यूं भी भरी गरमी में बरसात की कल्पना से पल भर तो ठंडक मिलती ही है। अरज़ किया है

 

नभ में बिखरे श्यामल बादल

तुम्हें पुकारे पिघला काजल

बंद खिड़की कर बंद दरवाज़ा

चुपके से तू भीतर आजा

 

 

आँखों को हौले से मींच

बाहों के घेरे में भींच

कोमल गालों को सहला दे

चिर सोए एहसास जगा दे

 

 

बढ़ जाए इस दिल की धड़कन

हो फिर से होंठों में कंपन

मधुर मिलन की मीठी बातें

पल में गुज़रें लम्बी रातें

 

 

गिरना उठना भूलें पलकें

रोम रोम से मद अणु छलके

तन थक कर हो जाए बोझिल

मन सुन्दर सपनों में गाफ़िल

 

प्रीत रीत का सूरज चमके

तन मन रूह सोने सी दमके

गम की सन्धया जाए बीत

लौट आए जो बिछुड़ा मीत।।

 

 

 

Categories: कविता

13 responses so far ↓

  • paramjitbali // June 3, 2007 at 11:06 pm | Reply

    आप ने बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना लिखी है।बधाई।

    गिरना उठना भूलें पलकें

    रोम रोम से मद अणु छलके

    तन थक कर हो जाए बोझिल

    मन सुन्दर सपनों में गाफ़िल

  • समीर लाल // June 4, 2007 at 1:48 am | Reply

    प्रीत रीत का सूरज चमके

    तन मन रूह सोने सी दमके

    गम की सन्धया जाए बीत

    लौट आए जो बिछुड़ा मीत।।

    –पूरी रचना ही बहुत खूबसूरत है, बधाई!! :)

  • RC Mishra // June 4, 2007 at 3:46 am | Reply

    मेरी पसन्द की पंक्तियाँ!

    *******************
    आँखों को हौले से मींच
    बाहों के घेरे में भींच
    कोमल गालों को सहला दे
    चिर सोए एहसास जगा दे
    **********************
    ऐसे आप अर्ज करते रहिये, इरशाद!

    और शुक्रिया भी।

  • reetesh gupta // June 4, 2007 at 4:07 am | Reply

    अच्छी लगी आपकी कविता…..बधाई

  • Manish // June 4, 2007 at 9:33 am | Reply

    गिरना उठना भूलें पलकें

    रोम रोम से मद अणु छलके

    तन थक कर हो जाए बोझिल

    मन सुन्दर सपनों में गाफ़िल

    बहुत अच्छी लगी ये पंक्तियाँ ! बहुत दिनों बाद आपने कोई कविता पेश की। गद्य के बीच बीच में पुरानी ही सही पर कविताएँ पोस्ट किया करें ।

  • प्रियंकर // June 4, 2007 at 1:11 pm | Reply

    ‘प्रीत रीत का सूरज चमके’ और ‘गम की
    संध्या जाए बीत’

    आमीन!

    अच्छा और सच्चा गीत .

  • ghughutibasuti // June 4, 2007 at 6:22 pm | Reply

    रत्ना जी बहुत ही मधुर सा एहसास देती कविता लिखी है आपने ।
    घुघूती बासूती

  • अनूप शुक्ल // June 4, 2007 at 9:27 pm | Reply

    बहुत खूब!

  • Kavi Kulwant // June 6, 2007 at 4:20 pm | Reply

    रत्ना जी! बहुत खूब! वास्तव में बहुत अच्छे भाव प्रस्तुत किये हैं आपने ! कविता से पूर्व मेरे नाम एवं प्रणय गीत का जिक्र कर आपने जो मान दिया है, आभारी हूँ। कृपया अन्यत्र न लें – आपकी कविता में कई स्थलों पर तुक को मिलाने के अप्रकृतिक प्रयास हैं।लेकिन भावपूर्ण कविता है और दृष्टांकन प्रस्तुत करने में अति सक्षम … कवि कुलवंत। आपकी टिप्पणी के लिए बहुत धन्यवाद। आपकी रसोई का रसास्वादन करने बहुधा आया करूँगा। मेरी कविताओं पर आपकि समीक्षा की हमेशा पेतीक्षा रहेगी …… कवि कुलवंत

  • Kavi Kulwant // June 6, 2007 at 4:39 pm | Reply

    आपकि रसोई क जायका लिया। कुमार विश्वास एवं मुनव्वर राणा नामक ब्यंजन चखे। बहुत स्वादिष्ट एवं मीठे लगे। गले से तो यों तर उतरे कि किसी प्रकार के नमक, मसाले, चटनी, अचार की कोई कमी ही महसुस न हुई। आपके ठोस (गद्य) पकवान तो तरल (पद्य) पकवानों से भी बेहतर लगे। इसी तरह पकाति रहिए एवं पाठकों को परोसती रहिए। मेरी शुभकामनाएं। आपको अपना काव्य संग्रह “निकुंज” भेजना चाहता हूँ। कृपया मार्गदर्शन करें। कवि कुलवंत सिंह

  • कवि कुलवंत // June 12, 2007 at 4:01 pm | Reply

    आपके नाम के साथ जुडा़ सोनी पंजाबी है यां राजस्थानी?
    कवि कुलवंत

  • Manish // December 21, 2007 at 1:17 am | Reply

    Aapki samarth kavita ke liye koti koti dhanyawad! Aapse kavya charcha ki utkat abhilasha hai,kripaya anugrahit karen tatha uttar avashya dein

  • Asha joglekar // August 13, 2008 at 9:45 pm | Reply

    ratnaji bahut achchi kavita. Pahali bar aapke blog par aaee aur antim 3 posts padh dalin. par kavita men kuch jyada dilchaspi hai isiliye.yahan tippani de rahi hoon.

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