रत्ना की रसोई का वार्षिक स्थापना दिवस समारोह सम्पन्न हो चुका था। रत्ना जी पार्टी निपटा कर, स्वागतम् का बोर्ड साइड में सरका कर और एक-आध ज़रूरी काम पर हाज़री लगा कर आराम फरमा रहीी थी। फुरसत के इन पलों का सदोपयोग करने हेतु, रत्ना कम्पनी के मुख्य कर्ता-धर्ता- मिस्टर दिल और मिस्टर दिमाग सफलता नाप रहे थे और ढीगें हांक रहे थे। सामने महिनों पहले पाई प्रशंसा की बोतल खुली थी और शुभकामनायों के प्यालों में, आत्म-स्तुति की मय दनादन तबियत से उड़ाई जा रही थी।
मिस्टर दिल का हज़मा ज़रा कुछ ज़्यादा ही नरम था सो बड़ी जल्दी हाई हो गए। चार पाँच प्यालों (शुभकामना संदेश पढ़ने) के बाद मस्ती में बोले–” यार दिमाग, अपुन लोगों की जोड़ी तो फिट है और मैडम रत्ना की रसोई आजकल हमारी बदौलत काफी हिट है। एकाउन्ट कांउन्टर पर कोई बता रहा था कि अब तक हम लोग कि पुरानी रसोई में 3245 और नई में 10385 यानि अबतक कुल13630 कद्र-दानों की पंगत को जिमा चुके है। अच्छी सर्विस केलिए 526 सर्टीफिकेट (comments) मिले है, वो भी 75 पकवानों की एवज़ में। अपनी तो चांदी हो गई। अब तो बाहर से भी आर्डर मिलने लगे है। पर सच्चाई तो यह है कि ये सब मेरे कारण हुया है। ना मै अपनी कविता से यहाँ पर रंग जमाता और न कोई हमें इतना सराहाता।। मुझे आज भी याद है, मेरी चार लाइन की कविता पर राजस्थान के मशहूर लेखक श्री संजय विद्रोही जी ने कहा था—
“ aapki RASOI dekhne ka sobhagya mila…vakai bade lazeez vyanjanon se saji hai. Ek Behtarin cook( LEKHIKA) hone ki badhaiyan sweekarein.
Prastut “KAVITA” dil ko chhoo gai aur mai vivash ho gaya aapko “well done! ” likhne ko. Really you have done the marvellos lines about poetry and its origine….from heart.
aapko aage ke liye bahut shubhkamnayein.
-sanjay Vidrohi”
इतना ही नहीं, मेरी दूसरी कृति को पढ़ कर लेखकों के दिग्गज, अच्छे साहित्य के पारखी अनूप शुक्ला जी बरबस कह उठे थे —
‘ वाह रत्ना जी,बड़ा बढ़िया गीत लिखा है आपने तो! बधाई!’
और नारद जगत की जानी मानी हस्ती अनुनाद सिंह के मुख से यह शब्द झर पड़े थे—
“आपकी भाषा का प्रवाह तो चूहे के कर्सर से भी तेज है | आपकी भावनाओं में समुद्र सी गहराई है | सच कहा है, “बहुरत्ना वसुन्धरा” ( यह धरती अनेकों रत्नों से भरी पडी है )”
इस सारी प्रशंसा की हकदार रत्ना जी केवल मेरे वजह से हुई थी। ये था मेरा योगदान और तुम, तुम्हे सिर्फ ब्लाग-संचालन का काम दिया गया था और तुमने उसमें भी गुड़ गोबर कर दिया था। पहली पोस्ट को पोस्ट तक न कर पाए थे। दूसरी पोस्ट भी जाने कहाँ गुमा आए थे। घंटों तक इंतज़ार के बाद भी वो नारद तक नहीं पहुंची थी। मै रात भर करवटें बदलता रहा। तुम्हारी किस्मत अच्छी थी कि दूजे दिन दोनों पोस्ट मुझे सही सलामत नारद के पोस्ट बाक्स में दिख गई वरना मैं तुम्हारी ओर जाती जीवन-पोषण की सप्लाई-लाइन ही बंद कर देता। किसी काम के न रहते। वैसे सच कहूँ तुम में अभी भी कोई खास सुधार नहीं हुया है। पता नहीं मैडम तुम्हें क्यों इतना लिफ्ट देती हैं। मेरा बस चले तो मै तुम्हारी छुट्टी कर दूँ, पर तरस खा कर खून का घूंट पी लेता हूँ“
दिमाग स्वामी रामदेव का भक्त था, प्राणायाम् के कारण भीतर से सशक्त था सो उसने शांति से मिस्टर दिल की हालात को तोला और मुद्दे से उसका ध्यान हटाते, मुस्कुराते व गुनगुनाते हुए बोला—
छोड़ो कल की बातें,कल की बात पुरानी
नए साल में आओ लिखें मिलकर नई कहानी
आगे ” हम हिन्देस्तानी” कहने से उसने आप को रोक लिया क्योंकि बात बात में बिगड़ना-भड़कना, लड़ना-झगड़ना तो हिन्दोस्तानियों का परम्-धर्म और मन-भावन कर्म है। ऐसे नाज़ुक मौके पर दिमाग दिल को गल्ती से भी इस धरम-करम की याद दिलवाना नहीं चाहता था। परन्तु दिल तो दिल है, आलतु-फालतु सामान को भी सहेज कर रखता है तो इसे ऐसे कैसे भूल जाता। कर्म में न सही पर धर्म के मामलों में सभी हिन्दोस्तानियों का दिल हमेशा ही मरने मारने के लिए तैयार रहता है। फिर रत्ना जी का दिल अपना धर्म निभाने में क्योंकर पीछे हटता। दिमाग की मुस्कान उसे व्यंग्य की कमान लगी, अपने अपमान के प्रतीक समान लगी और वो एकदम आग-बबूला हो उठा। हत्थे से उखड़ गया, बेहद बिगड़ गया और गुस्से से फुंकारता हुया बोला– अपने बकवास गद्य पर कुछ तारीफें कमाने लगे हो, मैडम से थोड़ी तरजीह पाने लगे हो, ओ छोटी औकात वाले! तुम बहुत इतराने लगे हो, लगता है तुम्हें सबक सिखाना ही पड़ेगा। ऐसी पटखनी दूंगा कि याद करोगे। तुम्हारी तरफ जाती हुई एक भी नाड़ी में मैंने विस्फोट करवा दिया तो बच्चू टें बोल जाओगे। मृत-प्राय हो कर किसी काम के नही रहोगे।
दिमाग की नसें अब चटखने लगी थी, खतरे की कुन्डी खटकने लगी थी। दिल की बेसुरी बांसुरी सुन वो बोर हो रहा था और धीरे धीरे अपना आपा खो रहा था। परन्तु फिर भी उसने संयम की फिसलती डोर को पकड़ते व दिल को डपटते हुए कहा–
“हर बात पर कहते हो कि तू क्या है
तुम्हीं कहो ये अन्दाज़े गुफ्तुगू क्या है।
तुम हमेशा औरों को औकात ही आंकते हो क्या कभी अपने भीतर भी झांकते हो। दूसरों की कलई तो खोलते हो पर क्या अपनी नब्ज भी टटोलते हो। इतरा मैं नहीं रहा हूँ, इतरा कर चकरा तो तुम रहे हो। सच्चाई यह है कि लोगों को हिन्दी में लिखने का प्रोत्साहन देने केलिए पुराने ब्लागर समझ-बूझ कर नए लोगों के ब्लाग पर आते है और तारीफ़ की टिप्पणी दे कर उनका मनोबल बढ़ाते है। सबूत के तौर पर जीतेन्द्र चौधरी द्वारा रचित ‘नारद इतिहात‘ के भाग दो के पैरा नम्बर दो की लाइन नम्बर पांच पर गौर करो– “एक समस्या और भी थी, कि नए लोगों को कैसे प्रोत्साहित किया जाए, इसके लिए अनूप भाई और मैने कमान सम्भाली, नए चिट्ठों पर टिप्पणी करना और उन्हे ज्यादा से ज्यादा ब्लॉग लिखने के लिए प्रोत्साहित करना। उधर अनुनाद भाई भी पूरे जोशोखरोश से जुड़े रहे।”
हिन्दी के प्रति, सीनीयर ब्लागरज़ के इस फर्ज़ को, अब कोई अपनी करनी का कर्ज़ समझे तो यह उसकी कमअक्ली है। बड़े-बूढ़े बच्चों की तोतली और ऊल-जलूल बकवास में जब दिलचस्पी दिखाते है. उन्हें लालीपोप थमाते है, पीठ थपथपाते है तो यह उनका बड़प्पन है और बड़प्पन का मान रखना ही समझदारी है। चने के झाड़ पर चढ़ कर औछी हरकत करना बदतमीजी है ना कि बचपना। पर यह बात तुम्हे और तुम्हारे कबीले वालों को समझ में नहीं आएगी। मेरे साथ इतने साल रह कर भी तुमने कुछ नहीं सीखा। समय समय पर बहकते ही रहते हो। भावनायों को काबू में रखना तुम्हें आता ही नहीं है। मुझे नुकसान पहूंचा कर क्या तुम बच जाओगे। मेरे बिना तुम भी बेकार और लाचार हो जाओगे। बेहतरी इसी में है हम सब हिल-मिल कर काम करें। क्योकि एकता में शक्ति है और शक्ति में विजय।“
दिल इस डपट को गटक कर जले कटे कटाक्षों और गाली गलौज का कै करने ही वाला था कि रत्ना जी उठ कर बैठ गई । दिल और दिनाग की इस भिड़ंत के कारण वे काफी देर से बेचैनी महसूस कर रही थी। उन्होंने दिमाग को कस कर दबाया उसे जड़ी बूटी वाला नारियल के तेल का मिक्चर पिलाया और दिल को दो चार बार हाथ से ठोंक कर पूर्ण शान्ति स्थापित करने हेतू काम्पोज़ की एक गोली द़ाग, आराम से करवट ले सो गई।









13 responses so far ↓
ghughutibasuti // June 1, 2007 at 5:10 pm
अच्छा मजेदार लिखा है । एक साल पूरा होने की बधाई ।
घुघूती बासूती
RC Mishra // June 1, 2007 at 6:38 pm
वार्षिकोत्सव की बधाई!
लेख भी पसन्द आया, मेरे पढ़ने के लिहाज़ से थोडा़ लम्बा हो गया
प्रियंकर // June 1, 2007 at 6:39 pm
चिट्ठे की वर्षगांठ पर बधाई!
समीर लाल // June 1, 2007 at 6:44 pm
वाह!! एक साल पूरे हो भी गये…बहुत बहुत बधाई. आशा है पोस्टों की सेन्चुरी भी जल्दी पूरी होगी और उसकी अलग से दावत रखी जायेगी. शुभकामनायें.
रवि // June 1, 2007 at 7:13 pm
पहली सालगिरह की बधाई. पहली तो पहली ही होती है - हमेशा विशिष्ट और हमेशा यादगार!
संजय बेंगाणी // June 1, 2007 at 7:32 pm
भई हम भी बधाई देन चाहते है, इस आशा में की भविष्य में भोजन मिलता रहेगा, बीना अंतराल के.
बहुत बहुत बधाई.
Sanjeet Tripathi // June 1, 2007 at 8:02 pm
शुभकामनाओं के साथ बधाई
अनूप शुक्ल // June 1, 2007 at 9:03 pm
बहुत खूब! अब तो आप भी सीनियर ब्लागर हो गयीं। बधाई!
अभिनव // June 2, 2007 at 4:47 am
आपको बहुत बधाई,
आशा है आगे भी आपकी रसोई पर बने श्रेष्ठ पकवान हमें पढ़ने को मिलते रहेंगे।
श्रीश शर्मा // June 2, 2007 at 6:15 am
हे हे बधाई! अब तो आप भी सीनियर ब्लॉगर हो गई। अब आपका भी फर्ज है कि नए ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर प्रोत्साहित करें।
मजेदार लिखा है, एक सांस में पढ़ गया।
ranjana // June 2, 2007 at 8:47 am
शुभकामनाओं के साथ बधाई:)बहुत खूब!मजेदार लिखा है
Rajesh Roshan // June 2, 2007 at 10:08 am
पहली वर्षगांठ की बधाई ।
paresh lal // June 2, 2007 at 11:30 pm
हमारी तरफ़ से भी बहुत बहुत मुबारक हो.. आपका लिखने का अंदाज़ बहुत ही अलग है | पढ़ कर तो मज़ा आया ही साथ में कुछ अलग लिखने का भी प्रोत्साहन मिला..और भी बढ़िया बात तो यह है की हमारे एक मित्र ने हमें quillpad.in के बार में बताया है जिसकी मदद से हम हिंदी में भी आसानी से लिख पाते हैं |
परेश
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