रत्ना की रसोई

Entries from May 2007

डाॅ विश्वास कुमार कृत कोई दिवाना कहता है–

May 21, 2007 · 11 Comments

            ‘कोई दिवाना कहता हैएक युवा कवि-कृत, युवकों के लिए रचित, यौवन की भावनायों, संवेदनायों, मर्यादायो और विपदायों को दर्शाता काव्य- संग्रह है। प्रत्येक पृष्ठ एक युवा दिल की धड़कन सा प्रतीत होता है। एक ऐसी धड़कन जो प्रियतम की झलक भर से कभी तो बेकाबू हो जाती है और कभी बिछोह की कल्पना मात्र से बेजान। हालांकि दो चार रचनाएं पिता, माँ, प्रकृति, शहीदों के प्रति पुष्प अर्पित करती है परन्तु डाक्टर कुमार विश्वास का यह गुलदस्ता एक प्रेयसी को उसके प्रेमी की लयबद्ध भेंट है। आरम्भ से अन्त तक प्रेम की जो धारा उमड़ी है, उसे मिलन की मदुयामिनी के रूप में कहीं तो कुछ पलों के लिए किनारा मिल गया है किन्तु मुख्य रूप से वो राह की बाधायों से टकराती, मंज़िल तक पहुंचने के इन्तज़ार में छटपटाती, बन्दिशों और मर्यादायों के भंवर में डूबती और विरह की ज्वाला से भीतर ही भीतर सूखती नज़र आई है।

           डाक्टर कुमार विश्वास अपने काव्य-संग्रह कोई दिवाना कहता है के आरम्भ में कहते है

 

पूरा जीवन बीत गया है,

बस तुमको गा भर लेने में

हर पल कुछ कुछ रीत गया है,

पल जीने में, पल मरने में,

इसमें कितना औरों का है,

अब इस गुत्थी को क्या खोलें,

गीत, भूमिका सब कुछ तुम हो,

अब इससे आगे क्या बोलें—–

 

               पहली कविता बांसुरी चली आओतड़पते दिल की पुकार है

 

 

तुम अगर नहीं आयी गीत गा न पाऊँगा

साँस साथ छोड़ेगी सुर सजा न पाऊँगा

तान भावना की है शब्द शब्द दर्पण है

बांसुरी चली आओ होंठो का निमन्त्रण है।

 

             मिलन के पलों का असर भी देखिए

 

जब भी मुँह ढक लेता हूँ

तेरी ज़ुल्फों की छाँव में

कितने गीत उतर आते है

मेरे मन के गाँव में।

 

            प्रेम में ईर्षा की कसक न होने से प्रेम अधूरा लगता है, इसी लिए शायद कवि को होली के अवसर पर गुलाल के भाग्य पर मलाल हो आया है।

 

आज होलिका के अवसर पर जागे भाग गुलालाल के

जिसने मृदु-चुम्बन ले डाले हर गोरी के गाल के

 

             प्रियतमा की मधुर यादों की भी अजब तासीर है

 

तुम आईं चुप खोल सांकलें

मन के मुंदे किवार से

राई से दिन बीत रहे है.

जो थे कभी पहार से।

 

                 बिछुड़ने पर दर्द का एहसास और निराशा का आलम भी कम ऩहीं

 

तुम बिना मैं स्वर्ग का भी सार लेकर क्या करूँ

शर्त का अनुशासनोंका प्यार लेकर क्या करूँ।

 

              प्रेम की दुनिया अपने आप में सम्पूर्ण है। हर रस से रची हुई, हर रंग से रंगी हुई अत: इस काव्य-संग्रह के विषय में संक्षेप में पाठक यही कहेगा

 

                       इस दुनिया के रंगी नज़ारे दो आँखों मे कैसे आए

                       कवि से पूछो इतने अनुभव एक कंठ से कैसे गाए।

 

 

 

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डाक्टर कुमार विश्वास

May 19, 2007 · 13 Comments

 

एक विडियो करीब सात महिने पहले हमने अपने चिट्ठे पर शायर बेनामके नाम से लगायाा था। यू-टियूब पर उसे देखकर हम इतने प्रभावित हुए थे कि आप सब को दिखाने के लिए उसे वहाँ से उड़ा लाए थे। शायर/ कवि का नाम मालूम नहीं था सो जानकारों से इस विषय में जानकारी देने को कहा था। कुछ दिन बाद सागर भाई ने बताया कि कवि का नाम डॉ कुमार विश्वास है जो अपनी वाक्-पटुता, विद्वता, और समय-अवसर पर अपनी विराट स्मरण-शक्ति के प्रयोग के कारण कवि-सम्मेलनों में काफी लोकप्रिय है।

आई.आई.टी और कॉरपरेट-जगत के सचेत श्रोता हों अथवा कोटा-मेले में बेतरतीब फैला लाखों का जन समूह , प्रत्येक मंच को अपने संचालन से डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका यही अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कवि-सम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है।

स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं और प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं।

इस जानकारी के मिलते ही हमारे हाथों से तोते उड़ गए। ऐसे प्रतिभाशाली जादूगर का माल उड़ाने के जुर्म में हम कोर्ट के नोटिस का इंतज़ार कर ही रहे थे कि एक दिन अपनी ई-मेल की पेटी में डाक्टर विश्वास की चिट्ठी देखी। वे हमारे शहर में आ रहे थे और हमसे मिलना चाहते थे। हम निहाल हो गए। सोचा मक्खन लगा कर मामला पटा लेंगें। कवि तो संवेदनशील होता है, झट मान जाएगा। पर हाय री किस्मत। मेहमान आकर जा चुके थे और हम उन्हें चखाने को ख्याली पुलाव पका रहे थे।

असल में शहर से बाहर होने के कारण हमने अपना मेल बाक्स लगभग बीस दिन बाद खोला था। यानि डाक्टर विश्वास पधारे 23 जनवरी को और हमने उनकी मेल दस फरवरी को देखी। जवाबी मेल लिखने की हिम्मत न जुटा पाए क्योंकि एक तो समान उड़ाया और ऊपर से उनके शहर में आने पर हम अन्डर-ग्राऊन्ड हो गए। क्या मुँह लेकर उनसे चिट्ठीयाते। रोज़ मेल चेक न करने की अपनी बेवकूफी और आलसीपन को हमने जम कर कोसा और कसम खाई कि अब मरे चाहे जीएं पर दिन में दो बार मेल अवश्य चेक करेंगें।

मेल-बाक्स के चक्कर लगाते और वहाँ पर मौजूद कचरे को हटाते बहुत दिन बीते। कई दिन बाद दिमाग की बत्ती जली कि क्यों न विश्वास सहिब के हिस्से का मक्कखन सीधे ऊपर हेड-क्वार्टर में भगवान के पास पहुँचा दें। अल्ला मेहरबान तो मुझ जैसा बंदा भी पहलवान। बस अगली सुबह से रोज़ मन्दिर में असली घी का दीया जलाना शुरू कर दिया, अच्छे चढ़ावे का वायदा किया और तुरत फुरत उसका अंजाम भी देख लिया। बेकार में लोग कहते है कि भगवान के घर में देर है। हमारे मेल-बाक्स में तो भगवन् ने डाक्टर कुमार विश्वास का मेल दो हफ्ते बाद ही टपका दिया था। इस मेल में उन्होंने हमें धन्यवाद दिया था, क्योंकि उनका विडीयों हमने अपने ब्लाग पर लगा कर उन्हें ढेर से प्रशंसकों से आसानी से मिलवा दिया था। यही नहीं, उन्होंने उनकी नई प्रकाशित किताब कोई दिवाना कहता हैमय औटोग्राफ के हमें भेजने की पेशकश भी की थी। लो जी हींग लगी न फिटकरी और रंग जम गया चोखा। तभी कहा जाता है कि वो देता है तो छप्पर फाड़ कर देता है। सब ऊपर वाले की माया है।

परसों कोरियर से किताब हम तक पँहुच गई है। अब जब तक हम उसे पढ़ कर समीक्षा तैयार करते है, आप उचित मात्रा में मक्खन या घी जमा करें, मन्दिर का रुख करें, दीए की लौ ऊँची करें और बोलेंजय कृपानिधान तू बढ़ा बलवान।।

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माँ और मुनव्वर राना

May 18, 2007 · 21 Comments

मातृ दिवस के अवसर पर मुनव्वर राना साहिब की किताब माँकी समीक्षा लिखना चाह रही थी पर कारणवश यह सम्भव न हो पाया। ईद के गुज़र जाने पर सिंवई की देग चढ़ााऊं या नहीं इस उलझन में उलझी थी कि मन ने कहा —- माँ की ममता का मुल्य चुकाना तो जन्म-जन्मान्तर तक कठिन है, फिर मई महिने का मात्र एक दिन ममत्व को मान देने के लिए मुक्कर्र रहे यह तो मुनासिब नहीं है।

 

मन के इस मार्ग-दर्शन से मुतासिर होकर मैं, जिनाब मुनव्वर राना के तसुव्वर से तामीर हुई माँसे आपकी एक मुलाकात करवाने को, हाज़िर हूँ। मेरे विचार में यह किताब रूसी लेखक मैक्सिम गोर्की( Maxim Gorky) द्वारा रचित मदर” (Mother) के सार का काव्यात्मक रूप और जमाने की हर माँ का मूक प्रतिरूप है। खूबसूरत ल़फ्ज़ों का लिबास पहने इस माँमें एहसास की गरमी और अपनत्व की नरमी है। कभी दुलारती है, कभी फटकारती है, इक पल मुस्काती है तो दूजे पल आँसू बहाती है। इसका पोर-पोर मोहब्बत के ज़ज़बे से लबरेज़ है और लब्बो-लुआब यह कि ममता के हर पहलू को समेटने की चाहत रखने वालों के लिए यह एक उम्दा दस्तावेज़ है।

 

इस किताब के प्रकाशकवाली आसी एकेडमी,8-प्रथम तल, एफ. आई. ढींगरा अपार्टमेंटस,लाल कुआँ, लखनऊ-226001 (.प्र.) है। मुद्रक का पता हैनेचर आफसेट प्रिंटर्स, दिल्ली। फोन-22015607. कवर टाइटल रिकोन एडवर्टाइज़र्स ग्रुप, लखनऊ की देन है। किताब का मुल्य केवल 25/- रुपये है और यह राशि माँ फाउण्डेशनके प्रति सहयोग की तरह ली जा रही है जो ज़ररूतमन्दों की इमदाद के लिए खर्च की जाएगी।

 

इस किताब के शुरूवात में अपनी बात कहते हुए राना साहिब कहते है– “मैं दुनिया के सबसे मुकद्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ इसलिए करता हूँ कि अगर मेरे शेर पढ़ कर कोई भी बेटा माँ की खिदमत और ख्याल करने लगे, रिश्तों का एहतराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए। ये किताब भी आपकी ख़िदमत तक सिर्फ इसलिए पहुँचाना चाहता हूँ कि आप मेरी इस छोटी सी कोशिश के गवाह बन सकें और मुझे भी अपनी दुआओं में शामिल करते रहें।

ज़रा सी बात है लेकिन हवा को कौन समझाए

दीए से मेरी माँ मेरे लिए काजल बनाती है।”

 

कुल बहत्तर पन्नों वाली यह किताब हर उस बेटे के नाम समर्पित है जिसे माँ याद है। य़ूं तो इसका हर पन्ना एक सरमाया है और उस पर छपा हर श़ेर एक बेशकीमती नगीना पर कुछ श़ेर जो मुझे बेहद पंसद आए वो आपकी नज़र कर देती हूँ क्योंकि आखिर मैं भी तो एक माँ हूँ और राना साहिब के अनुसार—-

 

सुख देती हुई माओं को गिनती नहीं आती

पीपल की घनी छायों को गिनती नहीं आती।

 

 

लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती,

बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।

 

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है

माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।

 

मैंने रोते हुए पोछे थे किसी दिन आँसू

मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुप्पट्टा अपना।

 

अभी ज़िंदा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा,

मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है।

 

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है,

माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है।

 

ऐ अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया,

माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया।

 

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फरिश्ता हो जाऊं

मां से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ।

 

मुनव्वर‘ माँ के आगे यूँ कभी खुलकर नहीं रोना

जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

 

लिपट जाता हूँ माँ से और मौसी मुस्कुराती है

मैं उर्दू में गज़ल कहता हूँ हिन्दी मुस्कुराती है।

 

Categories: बस यूँ ही