
कल तीस अप्रैल है। हमारे लिए यह दिन बहुत खास है क्योंकि इस दिन हमने नारद संसार में पहला कदम रखा था। सच मानिए पहला पग धरते ही हमें ऐसा लगा मानो किसी वन्डर-लैंड में पहुंच गए हैं। इसी लिए इस खास दिन के उपलक्ष्य में हमने आज से ही अपनी रसोई को ढेर से पकवानों से सजा दिया है। साल भर का लेखा जोखा फिर कभी। अभी सिर्फ खाना पीना, मौज मस्ती। देर किस बात की है ? प्लेट उठाइए और शुरू हो जाइए।
दाईं ओर है–दही-बड़ा, अमेरिकन-कार्न, चीज़-टोस्ट, और पंजाबी छोले। गरमा-गरम भटूरे किचन में तले जा रहे है, बस सीधे कढ़ाई से आते ही होगें। वैसे भी थोड़ा रुकिए क्योंकि आगे रखी डिश वेजटेरियन साथियों के लिए नहीं है। यह मटन के शामी-कबाब हैं। खाने वाले अक्सर कहते है कि हमारे यहाँ बने कबाब लाजवाब होते है। मुन्ने की अम्मा की यह मनपंसद डिश है, जिस दिन उनके यहाँ भेज देती हूँ, वाह वाह करते थकती नहीं। शुहेब भाई ज़रा चख कर बताएं,सही बने है या नहीं।
चाकलेट केक में अंडा पड़ा है। वेजिटेरियन मेहमानों के लिए मैने ट्राइफल पुडिंग बनाई है जो केक के पास और मेज़ के बीच में रखी है। इसमें पड़ा केक ऐग-लेस है। उसके आगे रखी प्लेटों में से एक में काजू-रोल और काजू-कतली है और दूसरी में मिक्सड-मिठाई। गुलाब-जामुन लखनऊ- बरेली मार्ग पर पड़ने वाले मैगल-गंज(माईकल गंज) से मंगाए है। मुहँ में रखते ही एकदम घुल जाते हैं। प्रियकंर व प्रभाकर जी, तीखे मीठे से परहेज़ है तो आगरे का अंगूरी पेठा और मेरठ की गज़क लीजिए। यह दोनों चीज़े हमने इतनी दूर से खास आप सब के लिए मंगवाई है। प्रतीक जी से पूछ लें, पेठे उन्ही की देख-रेख में बने हैं।
मीठे से मन भर गया हो तो बाईं ओर रखे इलाहाबाद के मशहूर मसाले वाले छोटे समोसे से स्वाद बदल लें। प्रमेन्द्र जी ने इनकी बहुत तारीफ़ की है। या फिर फ्राइड-राइस या नूडल्स ले लें । विजय वडनेरे जी ने सिंगापुर से भेजे है। समोसे हम साथ भी बांध देंगें। महिने भर तक इनका स्वाद ज्यों का त्यों रहता है।
अनूप भाई से कानपुर के मशहूर ठग्गू के लड्डू मंगवाएं है जैसे ही भेज देगें, खाली प्लेट में सजा देगें। सुना था ठग्गू जी अभिषेक- ऐश की शादी के लिए इकावन किलो लड्डू लेकर गये है। पता नहीं अभी तक लौटे कि नहीं।
बाकी की दो खाली प्लेटें लखनऊ के मलाई पान और आइस क्रीम के लिए रखी हैं। अब इस गर्मी के मौसम में कुछ ठंडा भी तो होना चाहिए। जीतू भाई आपके खाने को लज्ज़तदार बनाने के लिए अरज़ करते है–
ज़माने का दस्तूर है नुक्ताचीनी
ज़माने से बिल्कुल न घबराइयेगा।
समीर भाई, माना आप शादी से भर पेट लौटे है पर हम यूँ नहीं टलने वाले, खिलाए बिना न मानेगें। वरना आप कह देगें- खाया नहीं तो खिलाना कैसा। ऐसे नहीं चलेगा। आपके एकाउंट में दो पार्टी डियू हो गई है। अपने भक्त कविराज को भी समझाइये कि कविता छोड़ें और लुक्मा तोड़े। हमारी वो सुनेगें नहीं। बेचारे भुवनेश, तुषार और राजीव जी चुपचाप चम्मच थामे उनके हायकू सुन रहे है।
ई-छाया और रजनीश मंगला जी की किसी को कोई खबर हो तो हमारी ओर से बोल दे–
जानो-दिल हैं उदास-से मेरे
उठ गया कौन पास से मेरे
मनीष जी, रितेश जी, हितेन्द्र और तरुण भाई चिन्तन छोड़ें, पहले प्लेट उठाएंं और काजू कतली नौश फरमाएं। जगदीश जी व श्रीश जी, नितिन और नीरज जी, यह सागर भाई आजकल कहाँ छुप गए है। लगता है घबरा रहे है कि कहीं हम हैदराबादी मोतियों की फरमाइश न कर दें। सृजन शिल्पी भी दिखाई नहीं दे रहे है। आज ही उन्हें संदेशा भेज दें–
यूं दोस्ती के नाम को रुसवा न कीजिए
तर्क-तअल्लुक़ात का चर्चा न कीजिए (रिश्ते तोड़ने की बात न करें)
रमन कौल साहब शायद ही आएं। हम खालिस कश्मीरी खाना जैसे कोफ्ते, कलिया, कबरगाह, मेथी चामन, दम तरकारी, खट्टे नदरू, हाक और गुश्ताबा बनाते तो उनका मन ज़रूर डोल जाता।
दीपक भाई अपनीो पसंद अभी बता दीजिए, बाद में न लिखीएगा– जो आप कह न पाए।
प्रत्यक्षा ,रचनाी, नीलिमा, सुजाता, रंजू, ममता, कान्ती और निधी भई आप लोग कहाँ रैसपीज़ डिसकस करने में लगी है और आप सब ये डाइटिंग-वाइटिंग का चक्कर आज छोड़ दीजिए। कल रामदेव का प्राणायाम-पैकज कर लेना या दो किलो मीटर पैदल टहल लेना। मामला फिट रहेगा। वैसे भी–
सदा ऐश दौरां(समय) दिखाता नहीं
गया वक्त फिर हाथ आता नहीं।
पंकज और संजय जी आप खुुशी और नन्हे मास्टर को क्यों नहीं लाए। बाद में गरबे का प्रोग्राम रखा है। सब लोग होगें तभी मज़ा आएगा। रवि रतलामी जी की गाड़ी पाँच घंटे लेट है। अनुराग, अतुल, आशीष और अमित जी अभी अभी निकले है, पहुँचने में टाइम लगेगा। उन्मुक्त जी तो उन्मुक्त है सो उनके लिए हम यही कहेगें–
आने में सदा देर लगाते ही रहे तुम
जाते रहे हम जान से आते ही रहे तुम
क्या कहा गला सूख रहा है, पीने में क्या है। अजी साहिबान सब है। साल भर आप लोगों ने हमें टिप्पणीी के अमृत पर जिन्दा रखा है, आप के लिए हर पेय हाज़िर है। अपनी-अपनी पसंद बताएं। हम इंतज़ाम करतेे हैं। आखिर आपकी बदौलत ही हम है वरना हम में क्या दम है। नारद परिवार का यह प्यार है जिससे हमारी सजृनशक्ति साकार है।
इसे नहीं भूलते जहाँ जाएं
अब करें क्या कहाँ जाएं
वो राम का है भक्त
यह कान्हा की राधा
नारदमय जनों को
कोई दूजा न भाता
उसकी दीक्षा को धारे
स्व धर्म हम निभाएं
जो भी तकल्लुफ़ में आए
उसको भोजन ठूंसाएं।।









28 responses so far ↓
प्रमोद सिंह // April 29, 2007 at 12:20 pm
ये तो हद है! एक तो आपने हमें कार्ड नहीं भेजा, हम बेहयाई करके चले आए, और आ गए तो इतना ताम-झाम देख रहे हैं लेकिन बैठने को एक कुर्सी नहीं दिख रही.. टेबल पर चढ़कर खायेंगे? क्या रत्ना जी, सोचना चाहिये था ना?..
खैर, आपको याद नहीं होगा.. पिछले साल के आखिर में इंटरनेट पर हिंदी कैसे लिखें का सवाल पूछते हुए आप ही को पत्र लिखा था, आपने तड़ से जवाबी मेल किया था। धन्यवाद! बाकी मज़े में रहें, अच्छे से पार्टी का आनंद उठायें।
अभय तिवारी // April 29, 2007 at 12:42 pm
मिठाईयों में आप्ने चीनी डाली है या गुड़ ? मै आजकल चीनी नहीं खाता.. शहद चलेगा..
ratna // April 29, 2007 at 1:08 pm
प्रमोद जी,
ये बुफे सिस्टम है। कुर्सियां मेज़ से दूर चारों ओर लगी है। अब बारह की टेबल पर बहत्तर को कैसे खिलाते।
और हाँ हमारी रसोई में हर किसी का स्वागत है। यह घर की रसोई है जहाँ परिवार वाले हक से पहुँचते है उन्हे निमन्त्रण पत्र नहीं भेजा जाता।
बहुत से लोगों का उल्लेख इस लिए नहीं हो पाया है क्योंकि परिवार जब बड़ा हो जाता है तो रसोई पकाने वालों को अक्सर दुुआ सलाम करनेे वालों के नाम ही याद रहते है। आशा है बाकी बचे लोग अन्यथा नहीं लेंगें।
PRAMENDRA PRATAP SINGH // April 29, 2007 at 1:25 pm
आपने इस चिठ्ठा संसार को अपना परिवार माना है इस नाते हम सब एक परिवार के सदस्य हुये। पपरिवार के प्रत्येक सदस्य की खुशी मे परिवार की खुशी निहित रहती है। कितना अच्छा लगता है कि एक जगह पर ही सब हिल मिल कर खुश रहते है।
अपके इस परिवार मे एक साल पूरा होने पर हार्दिक शुभकानऐं। आप दिनों दिन अपने लेखन कौशल से लोगें की पठन प्यास को बुझाती रहे है। यही ईश्वर से कामना है।
खाने मे तो बहुत कुछ दिख रहा है, यदि खाने के लिये हो तो आया जाये, अगर ललख्वाने के लिये है तो लालच के मारे मुँह मे पानी तो आ ही गया है।
पुन:श्च ढेरों शुभ कामनाऐं।
PRAMENDRA PRATAP SINGH // April 29, 2007 at 1:26 pm
ललख्वाने —- ललचवानें पढ़ा जायें।
श्रीश // April 29, 2007 at 2:03 pm
यम यम मजा आ गया। अजी आप आवाज तो लगाओ हम हाजिर हैं। बाकी हम बहुत दिनों से कह रहे हैं कि प्रोग्रामर भाई लोग कोई तरीका निकालें कि यहीं बैठे वो ऊपर दिखाए सब पकवान हम तक पहुँच जाएं।
ये सीन देखकर भूख लग गई। खाने को कुछ ढंढने जाता हूँ…
mamta // April 29, 2007 at 4:10 pm
रतना जी पहले तो बधाई स्वीकार करें। रतना जी लगता है आपने हमारी फोटो ध्यान से नही देखी वरना ये dieting वाली बात नही कहती और इतने स्वादिष्ट पकवान देखकर भला कौन रूक सकता है।
रवि // April 29, 2007 at 4:11 pm
“…रवि रतलामी जी की गाड़ी पाँच घंटे लेट है।…”
गाड़ी भले ही लेट हो, परंतु हमारे रतलामी सेव जरूर आपकी टेबल पर हैं जो हमने पहले ही कोरियर से भेज दिए थे… मेहमानों का स्वागत् उसी नमकीन से कीजिएगा…
काहे कि बाद में कह सकते हैं - आपने हमारा नमक खाया है - और रविरतलामी का भी!
अनूप शुक्ला // April 29, 2007 at 5:47 pm
वाह बधाई! बहुत-बहुत बधाई! घर में सबकी तबियत खराब/ठीक होने की खबर के बाद यह जन्मदिन की
पार्टी बहुत खुशनुमा लग रही है। आपके लिये ठग्गू के लड्डू भेज दिये हैं। सबेरे प्रयागराज एक्सप्रेस से पहुंचेंगे।
उन्मुक्त // April 29, 2007 at 6:10 pm
साल गिरह की बधाई। आपने पार्टी एक दिन पहले कर दी। अब आने पर देर तो हो जायगी। कम ही सही पर देर सबेर पहुंच तो जाता हूं।
समीर लाल // April 29, 2007 at 7:20 pm
चिन्ता न करें. अब इस पार्टी के बाद ही नये सिरे से ट्रेड मिल तोड़ी जायेगी. जब तक चज़न न बढ़े, घटाने में क्या मजा. बहुते लज़ीज पार्टी, वाह वाह!!

परिवार जब बड़ा हो जाता है तो रसोई पकाने वालों को अक्सर दुुआ सलाम करनेे वालों के नाम ही याद रहते है। —कितनी ज्ञानवर्धक और पौष्टिक बात कहती है आप ..
Tarun // April 29, 2007 at 7:59 pm
मजा आ गया इतवार के दिन पार्टी खाने को मिल गयी, क्या शाही दावत लग रही है। पार्टी में बुलाने का और अरेंज करने का बहुत बहुत धन्यवाद।
सागर // April 29, 2007 at 8:17 pm
रत्नादी
“अहोभाग्य होता मेरा जब आप मुझसे मोतियों की फरमाईश करती। ” फिलहाल तो टिप्प्णी रूपी पोष्टिक खुराक से ही काम चलाइये।
पहली सालगिरह पर ढ़ेरों बधाईयाँ।
दावत तो बड़ी अच्छी लग रही है पर मुझे अलग से देनी होगी क्यों कि आपने एक ही टेबल पर सामिष- निरामिष आहार रख दिया है
फिर भी मेरी पसन्दीदा काजू कतली और काजू रोल आपने रख दिये। धन्यवाद
ratna // April 29, 2007 at 8:29 pm
सागर जी हमें तो आपके अथाह ज्ञान के मोतियों की चाहत है वही देते रहें । हम अभारी रहेंगें।
मनीष // April 29, 2007 at 9:47 pm
भई वाह क्या पकवान परोसे हैं आपने ! देखकर ही दिल प्रसन्न हो गया । पहली सालगिरह की ढ़ेर सारी बधाईयाँ..आशा है आने वाले सालों ऐसी ही और पार्टियों में दावत उड़ाने का मौका मिलता रहेगा ।
जगदीश भाटिया // April 29, 2007 at 10:04 pm
बहुत सी बधाई।
पकवान वाकई बहुत स्वादिष्ट हैं।
धन्यवाद ।
फुरसतिया » जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनके भी अपराध… // April 30, 2007 at 2:14 am
[...] इसके बाद चुपके से रत्नाजी के यहां पार्टी में चले जायेंगे-ठग्गू के लड्डू लेकर [...]
राजीव // April 30, 2007 at 3:39 am
रत्ना जी,
पहले तो आपकी चिट्ठाकारिता की प्रथम वर्षगाँठ पर बधाई।
आपने तो बड़ी ही शानदार दावत दी है। तमाम शहरों / क्षेत्रों से उनके प्रसिद्ध इतने ढेर सारे व्यंजन। हम तो वैसे ही कनफुजिया गये। क्या खायें, क्या नहीं। अभी तो कुछ चुनिंदा व्यंजन ही चुनने पड़ेंगे।
पिछले ही वर्ष एक बार मैगल गंज पर रुका था, इतनी सारी गुलाब-जामुन की दूकानें, और हर कोई दावा करता था कि वही पुरानी व प्रसिद्ध दूकान है।
जीतू // April 30, 2007 at 11:03 am
रत्ना जी,
इत्ता सारा खाना बनाए, इत्ती देर बात बुलायी, ये अच्छी बात नही है। अब तो सारा माल मेहमान (पिछली १८ टिप्पणी वाले) चट कर गए होंगे। ना ना, हम किसी पर इल्ज़ाम नही लगा रहे है, लेकिन सुकुल, समीर जैसे भारी भरकम लोग तो पहले ही थाल उठा चुके होंगे, हमारे लिए अब का बचा?
सालगिरह की बहुत बहुत मुबारक हो।
ranjana // April 30, 2007 at 11:28 am
बहुत बहुत बधाई आपको रत्ना जी ..
इतने सारे पकवान ..अब कौन करे योग और आसान का ध्यान
पर लगता है थोड़ी लेट हो गयी ..[
Nitin Bagla // April 30, 2007 at 12:16 pm
इतनी सारी मिठाइयां एक साथ….
हम परम-आनन्द को प्राप्त हुए..
पंकज बेंगाणी // April 30, 2007 at 2:14 pm
ye galat bat hai. एक तो जोरों की भूख लगी है, उपर से ये पकवान.. अब इन्हे कैसे चट किया जाए, वर्चुली करना पडेगा ना. ना हो तो पार्सल ही लगा दीजिए . अब भूखे पेट तो ना आया जाएगा.
चलिए अब लगे हाथ बधाई भी स्विकार कर ही लीजिए..
पर ये मिठाई… .. हाये….
सृजन शिल्पी // April 30, 2007 at 3:36 pm
रत्ना दी, आपका संदेशा मिल गया, हाजिर हूं। तो यहां सब पहले से मौजूद हैं! शुक्र है, पार्टी खत्म होने से पहले शामिल हो पाया। मजा आ गया, पकवान तो लजीज बने हैं। सालगिरह की पार्टी हो तो ऐसी। क्या निराला अंदाज है! अभी कुछ ही दिनों पहले मनीष जी ने यादगार टिप्पणियों को सजाकर सालगिरह मनाई थी। उम्मीद जगती है कि आगे कभी सालगिरह की ऐसी पार्टियां वर्चअल को पारकर रीयल जगत में भी हुआ करेंगी!
आपने दोस्ती की बात की तो हमारा कहना है -
‘गर दोस्ती हो तो उसे कभी रुसवा नहीं होने देंगे
मगर तक़ल्लुफ़ को हम इख़लास नहीं समझेंगे
क्यूंकि कह गए हैं शायर अहमद फ़राज़ कि-
दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला
दोस्त बनकर भी नहीं साथ निभाने वाला
Amit // April 30, 2007 at 6:16 pm
वाह जी वाह, हम पहुँच गया हूँ, ई लज़ीज़ पकवानों की सुगन्धवा हमरे नथुनों से अंदर घुस बेचैन किए रही सारे रास्ते, ईब चैन मिलेगा। भाई लोगन, तनिक कुछ हमारे लिए भी छोड़ दीजिएगा, सभी पकवान चट नाही कर जाईयेगा।
अरे हम भी बुड़बक हूँ, पहले हमार बधाई टिका लीजिए रत्ना जी, हम शपथ लेकर कहता हूँ कि अभी तक किसी पकवान को हाथ नहीं लगाया हूँ(चम्मच से डायरेक्ट मुँह में लिया हूँ)।
पर ईब तो लगा लेंगे, बधाई टिका दिए हैं। 
rachana // April 30, 2007 at 11:25 pm
वाह रत्ना जी!! चिट्ठाजगत मे भी “टाइमिंग” का बडा महत्व है! और कुछ दिनों की निष्क्रियता के बाद क्या खूब वक्त पर वापस आई हूँ, आपकी पार्टी मे शामिल होने! याद करके बुलाने का बहुत शुक्रिया! इसे कहते हैं-
दाने- दाने पर लिखा होता है खाने वाले का नाम!
डाइटिंग???? जी नही, ये मेरा नही काम!!!
अतुल शर्मा // May 1, 2007 at 5:50 pm
चिट्ठे के जन्मदिन की पार्टी बड़ी अच्छी रखी है आपने। मैं तो दो दिन लेट हो गया। वैसे अब जो भी बचा खुचा है वही ले लूँगा।
वाह! व्यंजनों का जवाब नहीं।
reetesh gupta // May 8, 2007 at 2:13 am
काजू कतली बहुत अच्छी लगी …….कृपया ऎसा ही स्नेह बनाये रखें
Rohit // May 17, 2007 at 11:36 am
Ratna ji bahut acha likha aapne
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