रत्ना की रसोई का चुल्हा पूरे तीन महिनों से ठंडा पड़ा था। भई क्यों ? वो हुया यूँ कि व्यस्तताओं का बोझ इस कदर बढ़ा कि हमारी लिखने की चाहत उसके तले दब कर रह गई। राम राम करते बोझ को थोड़ा निपटाया और कुछ सरकाया तो पाया कि महिनों तक पोषण न मिलने के काऱण हमारी “सृजन-चाह” अधमरी हो चुकी हैै। हमने कई बार चाय और काफी के छींटें मारे, स्नैक सूंघाऐ, बढ़िया डायरी मंगवाई, चकाचक कलम कसवाई, दिमाग को दौड़ाया, सिर को खुजाया, बाल नोचे, ढेरों विषय सोचे पर नेट रिजल्ट ज़ीरो रहा।
हमारी लम्बी उपेक्षा से बेचारी इतनी आहत हो गई थी कि आँखें खोलने का नाम ही नहीं ले रही थी। हमने भी सोचा मरने दो ससुरी को। अच्छा है बला टली। रोज़ इसके चक्कर में दो चार घंटे ग़रक हो जाते थे। पति और बच्चों से फजीहत, सास-ससुर की नसीहत, दोस्तों के उलाहनों और दबी आवाज़ में मिलते तानों –इन सब से छुट्टी पा, अब हम मज़े से एकता कपूर के सीरियलज़ में मन रमाएंगें और जीवन दर्शन की प्ररेक्टीकल नोलिज़ पाएंगें।
कुछ दिन बड़े आराम से कटे, साथियों से सुख दुख बंटे। चैन की बंसी बजी, टेबल नए-नए पकवानों से सजी। खाने वाले तो मुस्कुराने लगे किन्तु हम मन ही मन छटपटाने लगे। धीरे धीरे दिनचर्या बेजान हुई, जिन्दगी विरान हुई और उकता कर हम, अन्तिम सांसे लेती अपनी “सृजन- चाह” में नई शक्ति फूंकने के लिए, उसे सिर पर लाद कर देशाटन पर निकल पड़े।
आबो-हवा बदली तो मामला पटने लगा, कन्फ्यूजन का कोहरा छटने लगा। होश में आते ही वो कुछ- कुछ बड़बड़ाने लगी और उसे नारद परिवार की याद सतानेे लगी। लिहाज़ा हम उसे लेकर आपके पास वापस लौट आए है।
ताज़े हेल्थ-बुलेटिन के अनुसार हालत में अब सन्तोष जनक सुधार है। विशेषज्ञों का विचार है कि यदि टिप्पणियों का टानिक प्रेम से पिलाया जाए तो आश्चर्य जनक परिवर्तन की आशा की जा सकती है।
शेष सृजन-शक्ति के भली- चंगी होने पर–









13 responses so far ↓
रीतेश गुप्ता // April 4, 2007 at 4:34 pm
स्वागत है फ़िर से आपका….
आपके बनाये पकवान खाये बहुत समय हो गया है
्रजनी भार्गव // April 4, 2007 at 4:46 pm
आपका पुन: स्वागत है.
समीर लाल // April 4, 2007 at 5:39 pm
यह लिजिये टिप्पणी टॉनिक-ताकत आयेगी. यह गद्य वृतांत भी बिल्कुल पद्यमय है-स्वागत है आपका वापिसी पर. अब शुरु हो जायें.
अनूप शुक्ला // April 4, 2007 at 6:34 pm
स्वागत है! आपका बार-बार स्वागत है! फिर से लिखना शुरू करिये दनादन!
सागर चन्द नाहर // April 4, 2007 at 7:45 pm
बच्चों को भूखे मार दिया ये भी नहीं सोचा कि बच्चे मारे भूख के बिलख रहे होंगे…और तो और टॉनिक भी आपको चाहिये??? जाईये नहीं देते पहले बच्चों की तीन महीने की भूख मिटाइये फिर आपको टिप्पणी टॉनिक देंगे………….. अरे यह क्या आपको टॉनिक का डोज दे ही दिया गलती से।
कोई बात नहीं आज दे दिया आगे से नहीं देंगे, जब तक तीन महीने की कसर नहीं निकल जाती।
उन्मुक्त // April 5, 2007 at 6:44 am
कितनी टिप्पणियों मिलें तो आश्चर्य जनक परिवर्तन की आशा की जा सकती है?
नोट्पैड // April 5, 2007 at 9:04 am
ज़बरदस्त !!
और क्या कहे!
बस ऐसा लगता है आपने हमारा भी हाल-ए-दिल सुना डाला।
जीतू // April 5, 2007 at 11:08 am
अरे कहाँ टहल गयी थी आप?
इत्ते दिन हो गए, आपके ढाबे का खाना खाए हुए। अब आते ही हैल्थ वैल्थ की बाते करने लगी आप। अरे भाई जल्दी से परोसिए, भूख लगी है तेज!
SHUAIB // April 5, 2007 at 11:54 am
नारद पर आपकी पोस्ट देखा, यूं मेहसूस हुआ कि बहुत दिनों बाद कुछ खाने को मिला
स्वागत है आपका
अतुल शर्मा // April 5, 2007 at 3:30 pm
अरे तीन महीनों में बच्चे कुपोषित हो गए हैं बेचारे यहाँ बार बार आएँ और देखें तो रसोई का दरवाजा बंद। सोचिए आप भूखे बच्चों को रसोई बंद मिले तो कैसा लगता होगा। इतने दिनों से इधर उधर भटक रहे हैं और उन्हीं से टॉनिक माँग रहीं हैं। इस बार तो भूखे बच्चे टॉनिक दिए देते हैं पर आपको रोज नए नए व्यंजन पका कर इतने दिनों की कमी पूरी करनी होगी।
Rachana // April 5, 2007 at 11:38 pm
लीजिये एक विटामिन की गोली मेरी तरफ से भी! मै यहाँ आई और आप गायब हो गईं! अब कुछ दिनो साथ दीजियेगा..
राजीव // April 5, 2007 at 11:42 pm
लीजिये, लीजिये और टॉनिक लीजिये। यह तो बाता दें कि डॉक्टर ने कितनी बार के लिये कहा है, कहिये तो दिन में तीन-चार बार भी यह टिप्पणी-टॉनिक दे दिया जाय!
वैसे यह रचना अपने आप में भी जानदार है, बस एक कमी ज़रूर लगती है। इसके रूप (Formatting) को ऐसा रखें कि यह लगे पद्य ही। मसलन… नये वाक्य का प्रारम्भ नयी पंक्ति से करें तो यह लेख रूपी पद्य, अपेक्षाकृत और सुन्दर लगेगा
सर्जना-शक्ति के शीघ्रातिशीघ्र स्वास्थ्य-लाभ की शुभ-कामनाओं (और फल-पुष्प आदि भी) के साथ -
masijeevi // April 19, 2007 at 3:46 pm
अब और कितनी देर लगेगी भई
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