रत्ना की रसोई

Entries from April 2007

पार्टी में आपका स्वागत है

April 29, 2007 · 28 Comments

कल तीस अप्रैल है। हमारे लिए यह दिन बहुत खास है क्योंकि इस दिन हमने नारद संसार में पहला कदम रखा था। सच मानिए पहला पग धरते ही हमें ऐसा लगा मानो किसी वन्डर-लैंड में पहुंच गए हैं। इसी लिए इस खास दिन के उपलक्ष्य में हमने आज से ही अपनी रसोई को ढेर से पकवानों से सजा दिया है। साल भर का लेखा जोखा फिर कभी। अभी सिर्फ खाना पीना, मौज मस्ती। देर किस बात की है ? प्लेट उठाइए और शुरू हो जाइए।

दाईं ओर है–दही-बड़ा, अमेरिकन-कार्न, चीज़-टोस्ट, और पंजाबी छोले। गरमा-गरम भटूरे किचन में तले जा रहे है, बस सीधे कढ़ाई से आते ही होगें। वैसे भी थोड़ा रुकिए क्योंकि आगे रखी डिश वेजटेरियन साथियों के लिए नहीं है। यह मटन के शामी-कबाब हैं। खाने वाले अक्सर कहते है कि हमारे यहाँ बने कबाब लाजवाब होते है। मुन्ने की अम्मा की यह मनपंसद डिश है, जिस दिन उनके यहाँ भेज देती हूँ, वाह वाह करते थकती नहीं। शुहेब भाई ज़रा चख कर बताएं,सही बने है या नहीं।

चाकलेट केक में अंडा पड़ा है। वेजिटेरियन मेहमानों के लिए मैने ट्राइफल पुडिंग बनाई है जो केक के पास और मेज़ के बीच में रखी है। इसमें पड़ा केक ऐग-लेस है। उसके आगे रखी प्लेटों में से एक में काजू-रोल और काजू-कतली है और दूसरी में मिक्सड-मिठाई। गुलाब-जामुन लखनऊ- बरेली मार्ग पर पड़ने वाले मैगल-गंज(माईकल गंज) से मंगाए है। मुहँ में रखते ही एकदम घुल जाते हैं। प्रियकंर व प्रभाकर जी, तीखे मीठे से परहेज़ है तो आगरे का अंगूरी पेठा और मेरठ की गज़क लीजिए। यह दोनों चीज़े हमने इतनी दूर से खास आप सब के लिए मंगवाई है। प्रतीक जी से पूछ लें, पेठे उन्ही की देख-रेख में बने हैं।

मीठे से मन भर गया हो तो बाईं ओर रखे इलाहाबाद के मशहूर मसाले वाले छोटे समोसे से स्वाद बदल लें। प्रमेन्द्र जी ने इनकी बहुत तारीफ़ की है। या फिर फ्राइड-राइस या नूडल्स ले लें । विजय वडनेरे जी ने सिंगापुर से भेजे है। समोसे हम साथ भी बांध देंगें। महिने भर तक इनका स्वाद ज्यों का त्यों रहता है।

अनूप भाई से कानपुर के मशहूर ठग्गू के लड्डू मंगवाएं है जैसे ही भेज देगें, खाली प्लेट में सजा देगें। सुना था ठग्गू जी अभिषेक- ऐश की शादी के लिए इकावन किलो लड्डू लेकर गये है। पता नहीं अभी तक लौटे कि नहीं।

बाकी की दो खाली प्लेटें लखनऊ के मलाई पान और आइस क्रीम के लिए रखी हैं। अब इस गर्मी के मौसम में कुछ ठंडा भी तो होना चाहिए। जीतू भाई आपके खाने को लज्ज़तदार बनाने के लिए अरज़ करते है–

ज़माने का दस्तूर है नुक्ताचीनी

ज़माने से बिल्कुल न घबराइयेगा।
समीर भाई, माना आप शादी से भर पेट लौटे है पर हम यूँ नहीं टलने वाले, खिलाए बिना न मानेगें। वरना आप कह देगें- खाया नहीं तो खिलाना कैसा। ऐसे नहीं चलेगा। आपके एकाउंट में दो पार्टी डियू हो गई है। अपने भक्त कविराज को भी समझाइये कि कविता छोड़ें और लुक्मा तोड़े। हमारी वो सुनेगें नहीं। बेचारे भुवनेश, तुषार और राजीव जी चुपचाप चम्मच थामे उनके हायकू सुन रहे है।

ई-छाया और रजनीश मंगला जी की किसी को कोई खबर हो तो हमारी ओर से बोल दे–

जानो-दिल हैं उदास-से मेरे

उठ गया कौन पास से मेरे

मनीष जी, रितेश जी, हितेन्द्र और तरुण भाई चिन्तन छोड़ें, पहले प्लेट उठाएंं और काजू कतली नौश फरमाएं। जगदीश जी व श्रीश जी, नितिन और नीरज जी, यह सागर भाई आजकल कहाँ छुप गए है। लगता है घबरा रहे है कि कहीं हम हैदराबादी मोतियों की फरमाइश न कर दें। सृजन शिल्पी भी दिखाई नहीं दे रहे है। आज ही उन्हें संदेशा भेज दें–

यूं दोस्ती के नाम को रुसवा न कीजिए

तर्क-तअल्लुक़ात का चर्चा न कीजिए (रिश्ते तोड़ने की बात न करें)
रमन कौल साहब शायद ही आएं। हम खालिस कश्मीरी खाना जैसे कोफ्ते, कलिया, कबरगाह, मेथी चामन, दम तरकारी, खट्टे नदरू, हाक और गुश्ताबा बनाते तो उनका मन ज़रूर डोल जाता।

दीपक भाई अपनीो पसंद अभी बता दीजिए, बाद में न लिखीएगा– जो आप कह न पाए।
प्रत्यक्षा ,रचनाी, नीलिमा, सुजाता, रंजू, ममता, कान्ती और निधी भई आप लोग कहाँ रैसपीज़ डिसकस करने में लगी है और आप सब ये डाइटिंग-वाइटिंग का चक्कर आज छोड़ दीजिए। कल रामदेव का प्राणायाम-पैकज कर लेना या दो किलो मीटर पैदल टहल लेना। मामला फिट रहेगा। वैसे भी–

सदा ऐश दौरां(समय) दिखाता नहीं

गया वक्त फिर हाथ आता नहीं।
पंकज और संजय जी आप खुुशी और नन्हे मास्टर को क्यों नहीं लाए। बाद में गरबे का प्रोग्राम रखा है। सब लोग होगें तभी मज़ा आएगा। रवि रतलामी जी की गाड़ी पाँच घंटे लेट है। अनुराग, अतुल, आशीष और अमित जी अभी अभी निकले है, पहुँचने में टाइम लगेगा। उन्मुक्त जी तो उन्मुक्त है सो उनके लिए हम यही कहेगें–

आने में सदा देर लगाते ही रहे तुम

जाते रहे हम जान से आते ही रहे तुम

क्या कहा गला सूख रहा है, पीने में क्या है। अजी साहिबान सब है। साल भर आप लोगों ने हमें टिप्पणीी के अमृत पर जिन्दा रखा है, आप के लिए हर पेय हाज़िर है। अपनी-अपनी पसंद बताएं। हम इंतज़ाम करतेे हैं। आखिर आपकी बदौलत ही हम है वरना हम में क्या दम है। नारद परिवार का यह प्यार है जिससे हमारी सजृनशक्ति साकार है।

इसे नहीं भूलते जहाँ जाएं

अब करें क्या कहाँ जाएं

वो राम का है भक्त

यह कान्हा की राधा

नारदमय जनों को

कोई दूजा न भाता

उसकी दीक्षा को धारे

स्व धर्म हम निभाएं

जो भी तकल्लुफ़ में आए

उसको भोजन ठूंसाएं।।

Categories: बस यूँ ही

और नहीं बस और नहीं

April 26, 2007 · 13 Comments

विपत्ति एंव दुश्वारी, तकलीफ और बिमारी कभी अकेले नहीं चलती। चले भी क्यूँ। आखिर उनकी जान-माल का सवाल है। नई-नई दवायों, वित्तिय सुविधायों के मारे उनके स्टेटस का यूहीं बुरा हाल है। इसीलिए हमेशा ये अपनी निजी कमांडो- फोर्स के साथ, लगा कर घात चुपके से धर दबोचती हैं।

जनवरी मास में, कुम्भ- प्रवास में आए मेहमानों की खातिरदारी की खबर जाने कैसे उन तक पहुंच गई कि दल बल के सगं ये सब हमारे घर में बिना बुलाए मेहमानों की तरह घुस आईं। पहला हमला हमारे छोटे बेटे पर किया । विश्व- फुटबाल मैच के बाद से उसकी बैकहेम बनने की धुन को घुन उस समय लग गया जब वो बाँह तुड़वा कर, पलस्तर बंधवा कर हमारे आँचल के तम्बू नुमा पवेलियन में वापिस लौट आया। उसकी तिमारदारी से फ़ारिग नहीं हुए थे कि बड़े बेटे के पेट में दर्द शुरू हो गया। मामले की छान-बीन हुई और पता चला कि होस्टल के खाने में मौजूद कंकड़ पत्थर उनके गुर्दे (kidney) की छननी तक जा पहुंचे है। मरते क्या न करते हम उन्हे बिनवाने में जुट गए।

काम निपटा कर ज़रा कमर सीधी की थी कि ससुर साहिब ने असल से सूद अधिक प्यारा होता हैकी सत्यता का प्रमाण दे दिया। बच्चों की टहलदारी में टेड़ी हुई हमारी कमर की कदर किए बिना, पोतों की चिन्ता में घुल घुल कर खाट पकड़ ली। मशीन पुरानी थी सो ओवर-आयलिंग करके दुरस्त करते करते काफ़ी समय लगा। अब तक वार दर वार झेल कर हम इतना थक चुके थे कि सोचा क्यों न कुछ दिन केलिए अंडर- ग्राउंड हो जाएं। मैदान खाली देख कर तकलीफ़-दुश्वारी खुद ही घर से दफा हो जाएगी।

हफ्ते भर घूम-घाम कर वापिस आए तो माहौल खुश-गवार लगा। आप लोगों से मुलाकात भी की। पर हमारा इस तरह से दगा देना मैडम बिमारी को पसंद न आया। मौका पाते ही उसने हमारे शरीर के कोने-कुतरे में छुपे चिकन-पौक्स (Chicken-pox) के जीवाणुयों को भड़का दिया और उन्होंने हरपीस( Herpes) का लबादा औढ़ हम पर हल्ला बोल दिया। दर्द के ऐसे भयानक झटके दिए कि हमें नानी याद आ गई। पिछले बीस दिन से हम वायरस नाशक और दर्द निवारक असले से लैस होकर, ज़बरदस्त गोला बारी कर रहे है पर अभी तक इन दहशतगर्दों पर पूरी तरह से विजय प्राप्त करने में सफल नहीं हुए है।

पतिदेव ऐसी हालत में हमें अकेला छोड़ देते तो बेवफा कहलाते सो इस बीच उन्होंने भी बराबर के बिस्तर पर डेरा जमा, दुख सुख में साथ निभाने का अपना वायदा पूरा कर दिया है।

घर के सभी सदस्य बारी बारी बिमारी की तिमारदारी में अपना य़ोगदान दे चुके है इसलिए उम्मीद करती हुँ कि अब कष्ट-चक्र पूरा हो गया होगा और आगे का सफ़र शांति पूर्ण रहेगा। पिछली पोस्ट में पीड़ा- पुराण सुनाने का मन न हुया क्योकि ढेरों गम है इस ज़माने में, क्यों अपना कष्ट किसी को बताएं, छोटी सी ज़िन्दगी है, बेहतर है, हिल मिल कर बैठें व सिर्फ खुशियाँ लुटाएं। परन्तु टिप्पणी-टानिक के कई चम्मच डकार कर जब हम बिना धन्यवाद कहे बीस दिन के लिए तड़ी-पार हो गए तो सोचा वाज़िब वजह से आपको वाकिफ़ करवाना हमारा फर्ज बनता है।

शेष स्वास्थ्य सुधार के आधार पर—-

 

Categories: बस यूँ ही

हेल्थ-बुलेटिन

April 4, 2007 · 13 Comments

रत्ना की रसोई का चुल्हा पूरे तीन महिनों से ठंडा पड़ा था। भई क्यों ? वो हुया यूँ कि व्यस्तताओं का बोझ इस कदर बढ़ा कि हमारी लिखने की चाहत उसके तले दब कर रह गई। राम राम करते बोझ को थोड़ा निपटाया और कुछ सरकाया तो पाया कि महिनों तक पोषण न मिलने के काऱण हमारी सृजन-चाहअधमरी हो चुकी हैै। हमने कई बार चाय और काफी के छींटें मारे, स्नैक सूंघाऐ, बढ़िया डायरी मंगवाई, चकाचक कलम कसवाई, दिमाग को दौड़ाया, सिर को खुजाया, बाल नोचे, ढेरों विषय सोचे पर नेट रिजल्ट ज़ीरो रहा।

हमारी लम्बी उपेक्षा से बेचारी इतनी आहत हो गई थी कि आँखें खोलने का नाम ही नहीं ले रही थी। हमने भी सोचा मरने दो ससुरी को। अच्छा है बला टली। रोज़ इसके चक्कर में दो चार घंटे ग़रक हो जाते थे। पति और बच्चों से फजीहत, सास-ससुर की नसीहत, दोस्तों के उलाहनों और दबी आवाज़ में मिलते तानों इन सब से छुट्टी पा, अब हम मज़े से एकता कपूर के सीरियलज़ में मन रमाएंगें और जीवन दर्शन की प्ररेक्टीकल नोलिज़ पाएंगें।

कुछ दिन बड़े आराम से कटे, साथियों से सुख दुख बंटे। चैन की बंसी बजी, टेबल नए-नए पकवानों से सजी। खाने वाले तो मुस्कुराने लगे किन्तु हम मन ही मन छटपटाने लगे। धीरे धीरे दिनचर्या बेजान हुई, जिन्दगी विरान हुई और उकता कर हम, अन्तिम सांसे लेती अपनी सृजन- चाहमें नई शक्ति फूंकने के लिए, उसे सिर पर लाद कर देशाटन पर निकल पड़े।

आबो-हवा बदली तो मामला पटने लगा, कन्फ्यूजन का कोहरा छटने लगा। होश में आते ही वो कुछ- कुछ बड़बड़ाने लगी और उसे नारद परिवार की याद सतानेे लगी। लिहाज़ा  हम उसे लेकर आपके पास वापस लौट आए है।

ताज़े हेल्थ-बुलेटिन के अनुसार हालत में अब सन्तोष जनक  सुधार है। विशेषज्ञों का विचार है कि यदि टिप्पणियों का टानिक प्रेम से पिलाया जाए तो आश्चर्य जनक परिवर्तन की आशा की जा सकती है।

                 शेष सृजन-शक्ति के भली- चंगी होने पर

 

Categories: बस यूँ ही