रत्ना की रसोई

हम होगें कामयाब

December 25, 2006 · 11 Comments

नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से हमेशा एक कदम आगे रहती है। उदाहरण के तौर पर सत्युग के दिव्य-दृष्टि वाले संजय और कलियुग के दूर-दृष्टि वाले संजय जी को देखिए। धृतराष्ट्र के संजय तो हाथ पर हाथ धरे केवल कौरवों और पांडवों की सेना का समाचार ही सुनाते थे परन्तु तरकश के संजय कभी नारद की सेना की गतिविधियां बांचते है तो कभी मातृ-भाषा के उद्धार के लिए शब्दों के अस्त्र-शस्त्र लेकर, चिट्ठा-क्षेत्र में अपनी कार्य-कुशलता के झंडे गाड़ते नज़र आते हैं। कभी अन्य योद्धायों को तरकश थमा युद्ध-करकी प्ररेणा देते है और कभी हमारे जैसे साधारण सैनिकों के प्रयासों पर टिप्पणी कर हमारी हिम्मत बंधाते है। इतना ही नहीं, एक सच्चे नायक की तरह जब उन्होंने देखा कि हिन्दी-सेना की लेखन शक्ति पर शीत की लहर का असर कुछ बढ़ रहा है तो झट अपने सेनापति के बेबाक मंतव्य के ज़रिए चुनाव की सर-गर्मी फैला सैनानियों में नई ऊर्जा का संचार किया।

अब इससे पहले कि हम पर एक जज को बरगलानेे का और चुनाव- आयोग को पोस्ट के बक्से में भर कर प्रशंसा के नोट पहुंचाने का आरोप लगे, हम अपनी स्थिती सपष्ट कर देते है और इस प्रशंसा के पीछे की मंशा एवं इस आभार का आधार बनी परिस्थितियों से आपको अवगत करा देते है।

वो हुया यूँ

कुछ अर्सा पहले हमने एक शायर बेनाम का विडीयो अपने चिट्ठे पर चिपकाया था और आप लोंगों से उसके विषय में जानकारी देने की गुज़ारिश की थी। काफी रोज़ बाद समीर भाई ने हमारे शायर बेनाम का नाम डाक्टर कुमार विश्वासबताया और सागर जी के अनुसार —-

फरवरी (बसंत-पंचमी ) को पिलखुवा (गाज़ियाबाद) में जन्में डॉ कुमार विश्वास का नाम हिन्दी कविता-प्रेमियों के लिए परिचय का मोहताज नहीं है। कवि-सम्मेलन के मंचों पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी वाक्-पटुता, विद्वता, और समय-अवसर पर अपनी विराट स्मरण-शक्ति का प्रयोग है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कवि-सम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है। आई.आई.टी , आई.आई.एम या कॉरपरेट-जगत के अधिक सचेत श्रोता हों, या कोटा-मेले के बेतरतीब फैले दो लाख के जन समूह का विस्तार हो , प्रत्येक मंच को अपने संचालन में डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं। तो प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं। हास्यरसावतार लालू यादव, अभिनेता राजबब्बर , खिलाड़ी राहुल द्रविड़, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी , नीतिश कुमार, टेली न्यूज के चेहरे आशुतोष, कुमार संजोय सिंह ,प्रभात शुंगलू, उद्योग समूह के नवीन जिंदल व श्रीजयप्रकाश गौड़ से लेकर भोपाल स्टेशन के कुलियों और मंदसौर मध्यप्रदेश की अनाज मंडी के पल्लेदारों तक फैला उनका प्रशंसक परिवार ही डॉ कुमार विश्वास की सचेत प्रज्ञा का परिचायक है।

समीर भाई और सागर जी की सशक्त व सजग सामान्य समझ-बूझ से सम्मोहित हो, उनकी संयुक्त सहायता के लिए, उन दोनों के समक्ष हम साभार सिर झुकाने ही वाले थे कि औरकुट क्षेत्र (ORKUT) से उचित जी टपक पड़े। उन्होंने सागर जी का बयान दोहराया और हमें औरकुट पर बने विश्वास जी के फैन क्लब का निमन्त्रण पकड़ाया। हम भी सब भूलकर खुशी-खुशी औरकुट जा पहुंचे। भीड़ भाड़ वाली वहां की भूलभूलैयां में भटकते भटकते हम जाने कैसे घूमते घूमाते वहाँ पर मंडली जमाए अपने दोनों सपूतों से जा टकराए। औरकुट पर हमें पाकर दोनों को मानो साँप सूंघ गया। तुरन्त फोन मिला कर ताकीद दी कि औरकुट टीन-एजर या यंग कराउड की भ्रमण-स्थली है। माता जी, आप उधर का रुख न करें तो बेहतर है।

हमें अपनी बढ़ती उमर का एहसास था पर इतनी बेदर्दी से हम यंग कराउड के घेरे से धकिया कर बाहर कर दिए जाएंगे, यह कभी सोचा न था। दिल पर ऐसी चोट लगी कि क्या बताएं। मन हुया कि कमन्डल लेकर हिमालय की ओर कूच कर जाएं। खैर किसी तरह खुद को समझाया कि दुनिया की रीत ही ऐसी है-सन्तान के लिए जहान और माँ-बाप के लिए एक कोना बियाबान।

कई रोज़ तक हम आईने के सामने खड़े होकर सिर में सफेद बाल ढ़ूंढते रहे, आखों का चेकअप करवा आए,जिम में ट्रेड-मिल पर बिना हांफे जोगिंग करी और सठियाने-बुढ़ाने का जब कोई भी सिम्टम नज़र नहीं आया तो बुढ़ापे के अवसाद को दूर धकेल, ‘अभी तो मैं जवान हूँगुनगुनाते हुए, इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बच्चे अपने राज़ खुलने से घबराते है, थोड़ी स्पेस चाहते है। जाने दो, उन्हें उनका चिरकुट औरकुट मुबारिक और हमें हमारी रसोई।

पर हाय री किस्मत। लौटे तो पाया कि हमारी रसोई में उचित जी की कृपा से ओरकुट वासियों का मेला लगा था और सब के सब शायर बेनाम पर बलिहारी जा रहे थे। चिट्ठे का टी आर पी तो टैक्सी के मीटर की भांति भाग रहा था। परन्तु यू-टयूब के होटल से मंगवाए पकवान के प्रशंसक हज़ार और हमारी पकाई डिश के लिए मुश्किल से सात-सत्तर-सौ की कतार।

हमें ऐसा लगा कि आंकड़े दबी आवाज़ में कह रहे थे कि अपनी फुल्ली फालतु बकवास को बंद करो, सृजन चाह पर लानत भेजो, कल्पना शक्ति को आराम दो और इधर उधर से सामान ला डिब्बा-सर्विस शुरू कर दो। इसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। हो सके तो लम्बी छुट्टी लेकर टैलेंट की तलाश में संजाल के भ्रमण पर निकल जाओ। अन्यथा कुछ अच्छा साहित्य पढ़ कर अपना टैलेंट चमकाओ।अगर किसी विधी यह सम्भव न हो तो रसोई पर ताला डालो। दूसरा ब्लाग बनाओ , नई पहचान सजाओ, उस पर किसी सोलहवें सावन वाली की सुन्दर तस्वीर चिपकाओ और औरकुट से वर्डप्रेस तक जहाँ चाहो आँख मटकाओ। पंख पसारो और उड़ान लगायो।

अंतर्मन की इस निराशा जनित सुनामी में बहते बहते, हमारे भीतर पलते रचनाकार की धड़कन मंदी पड़ गई। मूंछों पर ताव देते, अपने को तीस मार खाँ समझते हमारे कानफिडेंस का एक दम कचरा हो गया और सर्दी के मौसम में ठंड से कंपकंपाते हमारे लिखने के जोश पर घड़ो पानी पड़ गया। हम लम्बी छुट्टी का आवेदन-पत्र नारद जी को भेजने और आप लोगों से टाटा-बाय करने ही वाले थे कि तरकश का चुनावी तीर सामने आ गिरा।

डूबते को मानो तिनके का सहारा मिल गया। क्या करें क्या न करें का कोहरा छट गया और कलम की भक्ति का इनाम मिलने की आशा जगी। यही नहीं, आशा की किरणों के इस उजले प्रकाश में, हमें अपने दोनों हाथों में लड्डू दिखाई पड़े। यानि चित भी मेरी और पट भी मेरी। जीत गए तो वाह-वाह। हो सकता है कि इनाम के तौर पर कोई औरकुट पर हमारे लिए एक फैन-क्लब बना कर ससम्मान हमें वहाँ विराज दें। नहीं जीते तो भी बल्ले-बल्ले। अपनी जुझारू शक्ति से, फुरसतिया जी के पद-चिन्हों का अनुसरण कर, दो-तीन साल में जज की कुर्सी ज़रूर हथिया लेगें। हम भी फुरसत में है, हमें कौन जल्दी है। लब्बो-लुआब यह कि हम होंगे कामयाब एक दिन।

Categories: बस यूँ ही

11 responses so far ↓

  • समीर लाल // December 25, 2006 at 11:32 pm

    जल्दी बाजी का काम यूँ भी शैतान का होता है. आप तो बस धीरज रखें, इस बार तो थोड़ी मजबूरी अटकी है, वरना आपकी कामयाबी में प्रश्न चिंन्ह का कोई सवाल नही होता. :)

    वैसे आपको हमारी हार्दिक शुभकामनायें कि आप ही चुनी जायें एक न एक दिन. फिर बात चाहे जज चुने जाने की ही क्यूँ न हो!!

    और वो जो आशा की किरणों के इस उजले प्रकाश में, हमें अपने दोनों हाथों में लड्डू दिखाई पड़ रहे हैं न, उन्हें खा लें वरना मौसम की नमीं में आजकल खराब बहुत जल्दी हो जाते हैं. :) (स्माईली नोट करते चलें)

  • अनूप शुक्ला // December 25, 2006 at 11:38 pm

    इनाम-विनाम तो चलते-फिरते छलावे हैं! वो तो जनता तय करेगी। हम लोग तो दस अच्छे ब्लाग छांटेंगे! आपके लेखन की बोलती हुयी शैली गज़ब की है, कबिले तारीफ़!

  • Shrish // December 26, 2006 at 4:26 am

    वो भगवान जी बोल गये हैं ना, “कर्मण्येव …’ आप भी हमारी तरह बिंदास होके लिखे जाओ। हमारा ब्लॉग पढ़ा है न सिर ना पैर, बस लिखे जाते हैं। कभी पढ़ाने बैठ गए और कभी खुद पढ़ने , जिस दिन और कुछ नहीं सूझा उठा के मखौल चेप दिए। :)

  • संजय बेंगाणी // December 26, 2006 at 9:12 am

    हमारी शुभकामनाएँ आपके साथ है.

  • गिरिराज जोशी "कविराज" // December 26, 2006 at 10:14 am

    सन्तान के लिए जहान और माँ-बाप के लिए एक कोना बियाबान।

    मगर मेरे हिसाब से तो आपकी रसोई का यह कोना, जहान से कम नहीं. :)

  • प्रियंकर // December 26, 2006 at 6:11 pm

    जब-जब ‘औरकुटियन अवसाद’ घेरे , हफ़ीज़ जलंधरी के लिखे और मलिका पुखराज के गाये जवानी के अमर-गीत ‘अभी तो मैं जवान हूं’ का सुबह-शाम बिना नागा आद्योपरांत श्रवण और पारायण कीजिये . अवसाद छूमंतर हो जायेगा , चुनाव के लिये नई ऊर्जा मिलेगी .

  • मनीष // December 28, 2006 at 12:21 pm

    मजेदार पोस्ट है आपकी ! वैसे आरकुट में तो सारी दुनिया ही है ये अलग बात है की नई पीढ़ी उसमें कुछ ज्यादा ही रमी हुई है ।

  • girindra nath jha // December 28, 2006 at 2:42 pm

    आपकी रसोई वाकयी लाजबाब है. मैं तो कुछ ऐसे ही पकवान को चाओअ से हजम करता हुं.हम होंगे कमयाब से लेकर संगम तट की बातें दिल को टच करती है…कसम से.खासकर राणा जी की शायरी को पेश करने के लिए धन्यवाद्….खुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े सुखन आया है,
    पांव दाबे है बुज़ुर्गों के तो फन आया है।
    मेरे बुज़ुर्गों का साया था जब तलक मुझ पर
    मैं अपनी उमर से छोटा दिखाई देता रहा।
    गिरीन्द्र नाथ झा.Delhi

  • ranjubhatia // December 29, 2006 at 11:29 am

    औरकुट पर हमें पाकर दोनों को मानो साँप सूंघ गया। तुरन्त फोन मिला कर ताकीद दी कि औरकुट टीन-एजर या यंग कराउड की भ्रमण-स्थली है। माता जी, आप उधर का रुख न करें तो बेहतर है। :) :) मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ पर हम अभी इसी चिरकूट पर जमे हैं :)

    बहुत अच्छी रचना लिखी है आपने ….शुक्रिया

  • taxinumbert35 // April 8, 2007 at 8:07 am

    Very Good

  • uchit // April 19, 2007 at 11:23 pm

    http://www.orkut.com/Community.aspx?cmm=28172629
    Yahan aana tha Mata ji ko
    Par na janey kahan pahunch gayin
    Khair aap to yahan aa hi jaiye sab

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