रत्ना की रसोई

संगम तट का मेला

December 2, 2006 · 10 Comments

तीन जनवरी से इलाहाबाद के संगम तट पर ढेड़ माह तक चलने वाले अर्ध-कुम्भ मेले का आयोजन होने वाला है। विदेशों में बड़े पैमाने पर इसका प्रचार किया जा रहा है। इस विषय पर अधिक जानकारी अगली पोस्ट में, अभी तो आपको लुभाने के लिए कुम्भ-2001 का पद्य मय विवरण—-

माघ मास प्रयाग बुलावे

संगम तट नगरी बस जावे

संगी साथी के दल-बल में

भक्तन् का दरिया लहरावे

रेले पर रेला चला आवे

पोलिस खड़ी कतार बंधावे

सुरसरि के बर्फीले जल में

हर इक डुबकी आन लगावे

जन्म सधावें, अर्ध चढ़ावें

पितृ-पूजा पाठ करावें

गंगा यमुना की कल कल में

भगीरथ धर्म का कर्म निभावें

धोती अंगोछा रेती सुखावें

उघड़ा तन वो खड़ी छुपावें

पर्व-स्नान की उथल पुथल में

पंडे मल्लाह माल कमावें

भोपू भजन प्रवचन सुनावे

भक्ति की गगरी छलकावे

सत्सगं के इस कोलाहल में

हर- हर गंगेघोष गुंजावे

सन्तन की पलटन जुट जावे

चिमटा ढोलक शंख बजावे

भगवा कपड़ा बांध कमर में

तान के तम्बू अलख जगावे

रोली चन्दन भस्म लगावें

जूट जटा से सिरहिं सजावें

माला पोथी ले कर तल में

कलिजुग को सत्जुगी बनावें

मंगते दान की आस लगावें

दीन हीन सी दशा बनावें

काठ कठोती धरहिं बगल में

राजा हर्ष की बाट जुहावें

चना चबेना खड़ा चबावे

हांडी में कोई भात पकावे

पाप पुण्य की फेर बदल में

अंतरी भीतर भूख सतावे

गंध पकवान की खींच बुलावे

देख जलेबी जीभ टपकावे

पूड़ी सब्ज़ी ले पत्तल में

मस्त मगन वो पेट पुजावें

लकड़ी पतरी को सुलगावें

घास पूस पर लोट लगावें

लिपट के कटे फटे कंबल में

घोर शीत को ठेंग दिखावें

उत्तर से दक्खिन मिल जावे

पच्छिम पूरबी रंग अपनावे

संगम के इस तीरथ स्थल में

चहुं दिशा संगम दिख जावे।।

Categories: कविता

10 responses so far ↓

  • Pramendra Pratap Singh // December 2, 2006 at 6:23 am

    कविता का वर्णन इतना अच्‍छा किसा है कि वाह के अलावा और कोई शब्‍द नही है

  • श्रीश । ई-पंडित // December 2, 2006 at 5:19 pm

    सुन्दर कविता है रत्ना जी, एक सुझाव है, बुरा न मानिएगा।

    आप चिट्ठे पर सभी पंक्तियाँ Bold क्यों लिखती हैं, आँखों में चुभता है। सामान्य फोंट साइज करके बीच-बीच में महत्वपूर्ण पंक्तियों को Bold, Italic तथा Color आदि किया कीजिए।

  • ratna // December 2, 2006 at 9:00 pm

    सुझाव के लिए धन्यवाद। मैं लिनिक्स पर काम करती हूँ और OFFICE पर टाइप करती हूँ। मेरे कम्प्यूटर पर अक्षर बोल्ड नहीं दिखते है। पर जब भी यदा कदा विन्डोस से नेट कनैक्ट करती हूँ तो अक्षर बोल्ड हो जाते है, क्यों ,नहीं जानती । कृपया मदद करें।

  • उन्मुक्त // December 2, 2006 at 9:29 pm

    ‘मैं लिनिक्स पर काम करती हूँ’ पढ़ कर अच्छा लगा। मेरे विचार से और चिट्ठे बन्धु इससे प्रेणना लेंगे।

  • अनूप शुक्ला // December 3, 2006 at 5:52 pm

    कविता बहुत अच्छी लगी!

  • सम्पादक // December 4, 2006 at 8:19 am

    रत्ना जी आपकी टिप्पणी पढ़ी, ‘मैं लिनिक्स पर काम करती हूँ और OFFICE पर टाइप करती हूँ। मेरे कम्प्यूटर पर अक्षर बोल्ड नहीं दिखते है। पर जब भी यदा कदा विन्डोस से नेट कनैक्ट करती हूँ तो अक्षर बोल्ड हो जाते है, क्यों ,नहीं जानती। कृपया मदद करें।’
    इसके लिये आप यहां प्रश्न नम्बर १४ तथा उसका उत्तर देखें। आपकी परेशानी दूर हो जायगी। इसके अतिरिक्त यहीं पर हिन्दी चिट्ठेकारी से जुड़े बहुत सारे अन्य अकसर उठने वाले सवालों के जवाब भी हैं।

  • ratna // December 4, 2006 at 12:31 pm

    धन्यवाद।

  • हितेन्द्र // December 4, 2006 at 5:46 pm

    अब प्रयाग जाकर क्या करेंगे? :-)
    सुंदर कविता

  • अनूप भार्गव // December 7, 2006 at 8:13 am

    आप नें तो यहाँ बैठे ही प्रयागराज के दर्शन करवा दिये ।
    धन्यवाद

  • vebhore // December 30, 2006 at 7:36 pm

    simply the best ever and closest to reality.
    no toppings just the KUMBH as it is.

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