रत्ना की रसोई

Entries from December 2006

नव वर्ष मंगलमय हो

December 31, 2006 · 10 Comments

सन् 2006 विदा ले रहा है और सन् 2007 बाहें पसारे हमें अपने आगोश में लेने को बेकरार है। फोन की घन्टियां लगातार बज रही है, दोस्तों, रिश्तेदारों से महफिलें सज रही है, मस्ती का दौर है, हर ओर शोर है, इसलिए आज कोई लम्बी बात नहीं,बस नए साल के लिए ढेर सी शुभकामनाएं और एक संदेश जो कुछ देर पहले मुझे मिला

                                  इससे पहले कि

 

                    2006 का अन्तिम सूरज अस्त हो

 

                        इस साल का कलैन्डर नष्ट हो

 

                     आप खुशी के माहौल में मस्त हो

 

                          फोन का नेटवर्क व्यस्त हो

 

                     दुआ है आपका आने वाला साल

 

                                 ज़बरदस्त हो

 

 

 

                      HAPPY NEW YEAR

Categories: बस यूँ ही

हम होगें कामयाब

December 25, 2006 · 11 Comments

नई पीढ़ी पुरानी पीढ़ी से हमेशा एक कदम आगे रहती है। उदाहरण के तौर पर सत्युग के दिव्य-दृष्टि वाले संजय और कलियुग के दूर-दृष्टि वाले संजय जी को देखिए। धृतराष्ट्र के संजय तो हाथ पर हाथ धरे केवल कौरवों और पांडवों की सेना का समाचार ही सुनाते थे परन्तु तरकश के संजय कभी नारद की सेना की गतिविधियां बांचते है तो कभी मातृ-भाषा के उद्धार के लिए शब्दों के अस्त्र-शस्त्र लेकर, चिट्ठा-क्षेत्र में अपनी कार्य-कुशलता के झंडे गाड़ते नज़र आते हैं। कभी अन्य योद्धायों को तरकश थमा युद्ध-करकी प्ररेणा देते है और कभी हमारे जैसे साधारण सैनिकों के प्रयासों पर टिप्पणी कर हमारी हिम्मत बंधाते है। इतना ही नहीं, एक सच्चे नायक की तरह जब उन्होंने देखा कि हिन्दी-सेना की लेखन शक्ति पर शीत की लहर का असर कुछ बढ़ रहा है तो झट अपने सेनापति के बेबाक मंतव्य के ज़रिए चुनाव की सर-गर्मी फैला सैनानियों में नई ऊर्जा का संचार किया।

अब इससे पहले कि हम पर एक जज को बरगलानेे का और चुनाव- आयोग को पोस्ट के बक्से में भर कर प्रशंसा के नोट पहुंचाने का आरोप लगे, हम अपनी स्थिती सपष्ट कर देते है और इस प्रशंसा के पीछे की मंशा एवं इस आभार का आधार बनी परिस्थितियों से आपको अवगत करा देते है।

वो हुया यूँ

कुछ अर्सा पहले हमने एक शायर बेनाम का विडीयो अपने चिट्ठे पर चिपकाया था और आप लोंगों से उसके विषय में जानकारी देने की गुज़ारिश की थी। काफी रोज़ बाद समीर भाई ने हमारे शायर बेनाम का नाम डाक्टर कुमार विश्वासबताया और सागर जी के अनुसार —-

फरवरी (बसंत-पंचमी ) को पिलखुवा (गाज़ियाबाद) में जन्में डॉ कुमार विश्वास का नाम हिन्दी कविता-प्रेमियों के लिए परिचय का मोहताज नहीं है। कवि-सम्मेलन के मंचों पर उनकी लोकप्रियता का कारण उनकी वाक्-पटुता, विद्वता, और समय-अवसर पर अपनी विराट स्मरण-शक्ति का प्रयोग है। श्रोताओं को अपने जादुई सम्मोहन में लेने का उनका अदभुत कौशल, उन्हें समकालीन हिन्दी कवि-सम्मेलनों का सबसे दुलारा कवि बनाता है। आई.आई.टी , आई.आई.एम या कॉरपरेट-जगत के अधिक सचेत श्रोता हों, या कोटा-मेले के बेतरतीब फैले दो लाख के जन समूह का विस्तार हो , प्रत्येक मंच को अपने संचालन में डॉ कुमार विश्वास इस तरह लयबद्ध कर देते हैं कि पूरा समारोह अपनी संपूर्णता को जीने लगता है। स्व० धर्मवीर भारती ने उन्हें हिन्दी की युवतम पीढ़ी का सर्वाधिक संभावनाशील गीतकार कहा था। महाकवि नीरज जी उनके संचालन को निशा नियामक कहते हैं। तो प्रसिद्ध हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा के अनुसार वे इस पीढ़ी के एकमात्र ISO 2006 कवि हैं। हास्यरसावतार लालू यादव, अभिनेता राजबब्बर , खिलाड़ी राहुल द्रविड़, मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी , नीतिश कुमार, टेली न्यूज के चेहरे आशुतोष, कुमार संजोय सिंह ,प्रभात शुंगलू, उद्योग समूह के नवीन जिंदल व श्रीजयप्रकाश गौड़ से लेकर भोपाल स्टेशन के कुलियों और मंदसौर मध्यप्रदेश की अनाज मंडी के पल्लेदारों तक फैला उनका प्रशंसक परिवार ही डॉ कुमार विश्वास की सचेत प्रज्ञा का परिचायक है।

समीर भाई और सागर जी की सशक्त व सजग सामान्य समझ-बूझ से सम्मोहित हो, उनकी संयुक्त सहायता के लिए, उन दोनों के समक्ष हम साभार सिर झुकाने ही वाले थे कि औरकुट क्षेत्र (ORKUT) से उचित जी टपक पड़े। उन्होंने सागर जी का बयान दोहराया और हमें औरकुट पर बने विश्वास जी के फैन क्लब का निमन्त्रण पकड़ाया। हम भी सब भूलकर खुशी-खुशी औरकुट जा पहुंचे। भीड़ भाड़ वाली वहां की भूलभूलैयां में भटकते भटकते हम जाने कैसे घूमते घूमाते वहाँ पर मंडली जमाए अपने दोनों सपूतों से जा टकराए। औरकुट पर हमें पाकर दोनों को मानो साँप सूंघ गया। तुरन्त फोन मिला कर ताकीद दी कि औरकुट टीन-एजर या यंग कराउड की भ्रमण-स्थली है। माता जी, आप उधर का रुख न करें तो बेहतर है।

हमें अपनी बढ़ती उमर का एहसास था पर इतनी बेदर्दी से हम यंग कराउड के घेरे से धकिया कर बाहर कर दिए जाएंगे, यह कभी सोचा न था। दिल पर ऐसी चोट लगी कि क्या बताएं। मन हुया कि कमन्डल लेकर हिमालय की ओर कूच कर जाएं। खैर किसी तरह खुद को समझाया कि दुनिया की रीत ही ऐसी है-सन्तान के लिए जहान और माँ-बाप के लिए एक कोना बियाबान।

कई रोज़ तक हम आईने के सामने खड़े होकर सिर में सफेद बाल ढ़ूंढते रहे, आखों का चेकअप करवा आए,जिम में ट्रेड-मिल पर बिना हांफे जोगिंग करी और सठियाने-बुढ़ाने का जब कोई भी सिम्टम नज़र नहीं आया तो बुढ़ापे के अवसाद को दूर धकेल, ‘अभी तो मैं जवान हूँगुनगुनाते हुए, इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि बच्चे अपने राज़ खुलने से घबराते है, थोड़ी स्पेस चाहते है। जाने दो, उन्हें उनका चिरकुट औरकुट मुबारिक और हमें हमारी रसोई।

पर हाय री किस्मत। लौटे तो पाया कि हमारी रसोई में उचित जी की कृपा से ओरकुट वासियों का मेला लगा था और सब के सब शायर बेनाम पर बलिहारी जा रहे थे। चिट्ठे का टी आर पी तो टैक्सी के मीटर की भांति भाग रहा था। परन्तु यू-टयूब के होटल से मंगवाए पकवान के प्रशंसक हज़ार और हमारी पकाई डिश के लिए मुश्किल से सात-सत्तर-सौ की कतार।

हमें ऐसा लगा कि आंकड़े दबी आवाज़ में कह रहे थे कि अपनी फुल्ली फालतु बकवास को बंद करो, सृजन चाह पर लानत भेजो, कल्पना शक्ति को आराम दो और इधर उधर से सामान ला डिब्बा-सर्विस शुरू कर दो। इसमें हींग लगे न फिटकरी और रंग चोखा। हो सके तो लम्बी छुट्टी लेकर टैलेंट की तलाश में संजाल के भ्रमण पर निकल जाओ। अन्यथा कुछ अच्छा साहित्य पढ़ कर अपना टैलेंट चमकाओ।अगर किसी विधी यह सम्भव न हो तो रसोई पर ताला डालो। दूसरा ब्लाग बनाओ , नई पहचान सजाओ, उस पर किसी सोलहवें सावन वाली की सुन्दर तस्वीर चिपकाओ और औरकुट से वर्डप्रेस तक जहाँ चाहो आँख मटकाओ। पंख पसारो और उड़ान लगायो।

अंतर्मन की इस निराशा जनित सुनामी में बहते बहते, हमारे भीतर पलते रचनाकार की धड़कन मंदी पड़ गई। मूंछों पर ताव देते, अपने को तीस मार खाँ समझते हमारे कानफिडेंस का एक दम कचरा हो गया और सर्दी के मौसम में ठंड से कंपकंपाते हमारे लिखने के जोश पर घड़ो पानी पड़ गया। हम लम्बी छुट्टी का आवेदन-पत्र नारद जी को भेजने और आप लोगों से टाटा-बाय करने ही वाले थे कि तरकश का चुनावी तीर सामने आ गिरा।

डूबते को मानो तिनके का सहारा मिल गया। क्या करें क्या न करें का कोहरा छट गया और कलम की भक्ति का इनाम मिलने की आशा जगी। यही नहीं, आशा की किरणों के इस उजले प्रकाश में, हमें अपने दोनों हाथों में लड्डू दिखाई पड़े। यानि चित भी मेरी और पट भी मेरी। जीत गए तो वाह-वाह। हो सकता है कि इनाम के तौर पर कोई औरकुट पर हमारे लिए एक फैन-क्लब बना कर ससम्मान हमें वहाँ विराज दें। नहीं जीते तो भी बल्ले-बल्ले। अपनी जुझारू शक्ति से, फुरसतिया जी के पद-चिन्हों का अनुसरण कर, दो-तीन साल में जज की कुर्सी ज़रूर हथिया लेगें। हम भी फुरसत में है, हमें कौन जल्दी है। लब्बो-लुआब यह कि हम होंगे कामयाब एक दिन।

Categories: बस यूँ ही

ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी

December 8, 2006 · 12 Comments

छ: दिसम्बर की चौदहवीं बरसी पर शुऐब भाई के विचार जान बहुत अच्छा लगा और इस विषय पर लिखी अपनी एक कविता मुझे याद आ गई। हृदय के यह उदगार उस समय पन्नों पर बिखर गए थे जब विवादित स्थल पर खुदाई का आदेश दिया गया था। आइए,आप भी सुनिए, ख़ुदाई की कहानी, खुदाई की ज़बानी –

परम् पिता के थे

दो पुत्र होनहार

करते थे जो उसे

जी जाँ से ज़्यादा प्यार

दोनों हर इक शैय में

थे उसका रूप तकते

वो इनके दिल में रहता

ये उसके दिल में बसते

ऊँचा जो ज़रा हो गया

बच्चों का जीवन स्तर

बन गए पिता के लिए

दो आलीशान घर

एक ने अपने घर में

उसकी मूर्ति बिठाई

आयतों से दूजे ने

दिवारें थी सजाईं

इस दिशा में टनटनाता

घन्टी रूपी साज़

उस दिशा में गूंजती

आज़ान की आवाज़

मन्दिर और मस्जिद हुया

उन दो घरों का नाम

हृदय से सरके पिता का

अब यही था धाम

 

 

सदियों तक समय का रथ

अपनी राह चलता रहा

पालनहार का परिवार

फूलता फलता रहा

फैले हुए परिवार में

कुछ बढ़ने लगे फ़ासले

सन्तानों और औलादों के

दूर हो गए काफ़िले

दूरी से गलतफहमी

नफ़रत की आंधी लाई

टकरा गए गुबार में

इक दूसरे से भाई

मन्दिर भी गया टूट

मस्जिद भी गई ढाई

पिता की खोज में वहाँ

फिर होने लगी खुदाई

काश धरा की कोख इन्हें

इसका सबूत दे पाए

एक पिता के पुत्र है

इक माता के है ये जाए।।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Categories: कविता

संगम तट का मेला

December 2, 2006 · 10 Comments

तीन जनवरी से इलाहाबाद के संगम तट पर ढेड़ माह तक चलने वाले अर्ध-कुम्भ मेले का आयोजन होने वाला है। विदेशों में बड़े पैमाने पर इसका प्रचार किया जा रहा है। इस विषय पर अधिक जानकारी अगली पोस्ट में, अभी तो आपको लुभाने के लिए कुम्भ-2001 का पद्य मय विवरण—-

माघ मास प्रयाग बुलावे

संगम तट नगरी बस जावे

संगी साथी के दल-बल में

भक्तन् का दरिया लहरावे

रेले पर रेला चला आवे

पोलिस खड़ी कतार बंधावे

सुरसरि के बर्फीले जल में

हर इक डुबकी आन लगावे

जन्म सधावें, अर्ध चढ़ावें

पितृ-पूजा पाठ करावें

गंगा यमुना की कल कल में

भगीरथ धर्म का कर्म निभावें

धोती अंगोछा रेती सुखावें

उघड़ा तन वो खड़ी छुपावें

पर्व-स्नान की उथल पुथल में

पंडे मल्लाह माल कमावें

भोपू भजन प्रवचन सुनावे

भक्ति की गगरी छलकावे

सत्सगं के इस कोलाहल में

हर- हर गंगेघोष गुंजावे

सन्तन की पलटन जुट जावे

चिमटा ढोलक शंख बजावे

भगवा कपड़ा बांध कमर में

तान के तम्बू अलख जगावे

रोली चन्दन भस्म लगावें

जूट जटा से सिरहिं सजावें

माला पोथी ले कर तल में

कलिजुग को सत्जुगी बनावें

मंगते दान की आस लगावें

दीन हीन सी दशा बनावें

काठ कठोती धरहिं बगल में

राजा हर्ष की बाट जुहावें

चना चबेना खड़ा चबावे

हांडी में कोई भात पकावे

पाप पुण्य की फेर बदल में

अंतरी भीतर भूख सतावे

गंध पकवान की खींच बुलावे

देख जलेबी जीभ टपकावे

पूड़ी सब्ज़ी ले पत्तल में

मस्त मगन वो पेट पुजावें

लकड़ी पतरी को सुलगावें

घास पूस पर लोट लगावें

लिपट के कटे फटे कंबल में

घोर शीत को ठेंग दिखावें

उत्तर से दक्खिन मिल जावे

पच्छिम पूरबी रंग अपनावे

संगम के इस तीरथ स्थल में

चहुं दिशा संगम दिख जावे।।

Categories: कविता