पुरूष प्रकृति भंवरे के समान वांछित-अवांछित पर मंडराती ही रहती है इसीलिए पतिदेव जब एक खूबसूरत माडल को देख लालायित हो उठे और हमारे हिस्से का समय उसकी परख-पड़ताल में बिताने लगे तो हमने य़ह सोच कर आंखें मूंद ली कि नया-नया शौक है, चाहत की साध पूरी कर लेने दो, चार दिन में ऊब जाएंगें, मन भर जाएगा, खुमार उतर जाएगा और अपने पुराने ढर्रे पर लौट आएंगें।
कितने गलत थे हम। देखते ही देखते शौक आदत बना और खुमार नशा। पतिदेव उस माडल से उकताए तो उनकी नजरें भटकनें लगी और लार किसी अन्य के लिए टपकने लगी। नम्बर एक से नम्बर दो और फिर तीन—यानि सिलसिला कुछ ऐसा चल निकला कि पानी गले तक आ पहुँचा और बात हमारी बर्दाशत से बाहर हो गई। लाख बार समझाया कि अपनी चाहत को लगाम दो, बेकार में पैसा पानी की तरह मत बहाओ। परन्तु कानों पर जूं तक न रेंगी। उल्टे यह कह कर– ” क्या कोई अपनी कमाई का एक भाग अपनी मरजी से खर्च भी नहीं कर सकता” उन्होंने हमारी ज़ुबान पर ताला डाल दिया।
हम सामने बैठे होते और पतिदेव उससे गाल सटा कर, मुस्काते बतियाते तो हमारे सीने पर हज़ारों सांप लोट जाते। मौके-बेमौके उसके अंग-प्रत्यंग टटोलना, उसके चेहरे की इबारत पढ़ना और उसकी हर प्रतिक्रया को आंकना-जांचना, जब हद से ज्यादा बढ़ने लगा तो हमारे सब्र का सोत्र सूख गया। हमारे प्रेम को तिलांजली देकर उनका किसी अन्य के साथ टाइम-पास करना आखिर हम कब तक सहते। “मेरा पति सिर्फ मेरा है “ यह फिल्म हमने दस बार देखी थी सो एक दिन पांव पटक कर अल्टीमेटम दे दिया कि इन चोंचलों के चस्के को चुकता कर दो वरना—।
साहब को मानो मन की मुराद मिलने वाली थी, चेहरे से टपकती खुशी को गम्भीरता की रुमाल से पोंछते हुए बोले– “ वरना क्या तुम मायके चली जाओगी” हमने घूर कर उन्हें देखा और बर्फ की सिल्ली जैसे ठोस और ठंडे शब्दों में कहा–“ जी नहीं। वरना मैं आपके नक्शे-कदम पर निकल पडूंगी। अपना घर छोड़ कर चल दूं, मैं इतनी बेवकूफ नहीं हूँ।” पल भर को रंग स्याह पड़ गया। उन्होंने अविश्वास से हमारी ओर देखा। परन्तु फिर हमारी टकपूंजिया, पिलपिली, पुरातन-पंथी प्रवृत्ति का पल्ला पकड़, पारखी पतिदेव ठहाका मार कर हंस दिए, मानों कह रहे हो-चलत तो पावत ना,दौड़न चली है। ये मुँह मसूर की दाल।
उनकी हंसी से हुलस कर अगले ही हफ्ते हमने अपनी कथनी को करनी में बदल दिया और देखने में सुन्दर, अनेक गुणों से भरपूर, हर फन मौला मोबाइल खरीद लाए। जी हाँ, मोबाइल!
( क्यों, आप लोग कुछ और समझे थे क्या? खैर, छोड़िए, आगे सुनिए।)
हमारी पसंद को देख पतिदेव की आँखों में जो जलन और प्रशंसा की मिली-जुली लहर लहराई उसमें डूब कर हम तर हो ही रहे थे कि उनका “अरे वाह! बढ़िया कैमरा, नेट सरफिंग सुविधा,ब्लू टूथ — सब है। अच्छी चीज़ लाई हो” हमें ठिठका कर ठिठुरा गया। बाकी तो सब ठीक था पर यह ब्लू-टूथ क्या बला थी, हम समझ न पाए। हमारे ज्ञान-कोष में तो केवल ब्लू-ब्लड(Blue Blood) और विज़डम-टूथ(Wisdom Tooth) था।
अपने मुँह में कई सालों से मौजूद अक्ल-दाढ़ को हमने काफी हिलाया डुलाया पर ब्लू से टूथ के संगम की समस्या का समाधान न कर पाए। शायद आजकल ब्लू सामाग्री की कथायों और दांत दिखाने और दांत गढ़ाने की प्रथायों के चलते ब्लू और टूथ बच गया और क्योंकि अब अक्ल की बात कोई सुनना नहीं चाहता और खून में लाली रही नहीं, इसी लिए ब्लड और विज़डम शब्द समय की गर्त में खो गए। परन्तु खून सफेद होकर पानी सा पारदर्शी कैसे और क्यों हुया और विजडम कब और कहाँ विलुप्त हो गई, हम जान न पाए। इस सारी फिलासफी का मोबाइल से क्या सम्बन्ध है इसका प्रश्न का प्रबन्ध भी कठिन था।
अत: जिज्ञासा को शान्त करने हेतु हम पतिदेव की शरण में पहूँचे तो पता चला कि हमारी अक्ल के घोड़े गलत दिशा में दौड़ रहे थे। ब्लू टूथ तो एक तकनीक का नाम था जिसकी मदद से हम इधर का माल उधर बेधड़क,बेतार कर सकते थे। इतना सुनना था कि हमने ढेरों फोटो खींच डाली और उन्हें अपने डेस्क-टाप पर भेजने का प्रयोग कर डाला। प्रयत्न असफल रहा और इसका काऱण ब्लू-टूथ में ब्लू ब्लड के जीवाणू होना था। यानि ब्लू टूथ भी ब्लू-ब्लड लोगों की तरह अपने समकक्ष से ही मेल-जोल करता था और क्योंकि हमारे डेस्क-टोप में ब्लू-टूथ नही था जबकि पतिदेव के लेप-टोप में ब्लू-टूथ था सो मोबइल के सगं-संग मजबूरी में उनका लैप-टाप भी हमारे अधिकार क्षेत्र में आ गया।
आजकल हम मोबाइल, डेस्क-टोप और लैप-टाप के प्रेम के त्रिकोण में फंसे है और हमारा पहला प्रेम ( पतिदेव) हाशिए पर बैठ अपने मोबाइल से हमें SMS कर रहा है–
तुम न जाने किस जहाँ में खो गए–; आजा-आजा, मैं हूँ प्यार तेरा—-; हम-तुम इक कमरे में बंद हो और मोबाइल गुम जाए.
हमें ‘लोहा लोहे को काटता है और कांटे से कांटा निकलता है’- की सत्यता प्रमाणित होती प्रतीत हो रही है।









9 responses so far ↓
Prabhakar Pandey // November 24, 2006 at 8:43 am
पुरूष प्रकृति भंवरे के समान वांछित-अवांछित पर मंडराती ही रहती है———–अतिसुंदर लेख ।
संजय बेंगाणी // November 24, 2006 at 9:18 am
काफी लम्बा एस.एम.एस. टाइप कर पोस्ट किये हो.
उम्दा जायकेदार विनोद का तड़का लगा व्यंजन.
प्रतीक पाण्डे // November 24, 2006 at 9:41 am
बढिया है…
लेकिन आपने यह तो बताया ही नहीं कि मॉडल कौन-सा है?
हितेन्द्र // November 24, 2006 at 11:06 am
@ प्रतीक,
मॉडल कौन सा है ये ना बताया जाए, वर्ना कंपनी नाहक बदनाम होगी एक प्रेम त्रिकोण बनाने के आरोप में।
समीर लाल // November 24, 2006 at 7:30 pm
अच्छा त्रिकोण खींचा है, हम तो अलग ही उड़ान ले रहे थे कि धप्प!!!
Shrish // November 25, 2006 at 12:38 am
हे-हे! रूचिकर पोस्ट थी, पता नहीं क्यों हमारा दिमाग शायद कुछ Tags जैसे प्रेम, कन्या, मॉडल, फिल्में, कम्प्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट आदि के लिए कुछ ज्यादा ही संवेदनशील है, इनको बहुत जल्दी सर्च कर लेता है। जहाँ एक टैग दिखा फट से वो लिंक क्लिक कर देता है।
मनीष // November 30, 2006 at 4:21 pm
वाह, मजेदार ढ़ंग से त्रिकोण खींचा है आपने !
ramadwivedi // December 4, 2006 at 4:25 pm
बहुत सुन्दर हास्य से परिपूर्ण यथार्थ त्रिकोण का चित्र खींचा है आपने।आधुनिकरण के वैश्वीकरण के अन्तर्गत आदमी आदमी से ज्यादा इन्हीं चीजों से अधिक प्यार करने लगा है…..बधाई… चट्पटे पकवान परोसते रहें…..
vivek // January 3, 2007 at 11:14 pm
Namaskaar
munavvar rana ji ki kuch panktiyaan -
kaafiron ke shahar main imaan walaa mil gayaa
chalo ek kamara to roshandaanwala mil gaya
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rone main ek khataraa hai talaab nadi ho jate hain
hansana bhi aasan nahin hai lab zakhmi ho jaate hain
hansanaa
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