रत्ना की रसोई

जीवन के दो रंग

November 3, 2006 · 6 Comments

निराशा

संसकारों की बेड़ियां

रिश्तों की दिवारें

तन के कारावास पर

पहरा देती सांसे

रूह ने कौन जुर्म किया है

क्यों है कैद बेचारी

अरमानों की भट्टी चढ़ने में

क्या उसकी लाचारी

आँखों की खिड़की से दिखती

कभी उसकी परछांई

आज़ादी के लिए तरसती

थकी हारी उकताई

अपमान के आंसू पीती

खाती नफरत के कोड़े

सही गल्त की आंधी उसकी

काया को झकझोरे

ज़ुल्मों के पाटों में पिसती

तिल तिल बिखर न जाए

ऐ मालिक अब मुक्ति दे दो

कहीं रूह मर न जाए।

 

आशा

काश मै एसी तकदीर पाऊं

जीवन के पल छिन को यूं न गवाऊं

जीऊं तो जीने के मायने बदल दूं

सांसो के सुर और तराने बदल दूं

जान हो मेरी अमानत जहां की

काम नशा और इच्छा हो साकी

माटी के तन से यूँ महके अपनापन

गीली मिट्टी से ज्यों उड़ता सोंधापन

जाने अन्जाने तूलिका जो उठाऊं

बेरंग तस्वीरों को फिर से सजाऊं

अधरों पर उनके हंसी सी खिले

भावों को बोलती भावुकता मिले

रंगों की पाए वो इतनी विविधता

सांझ का सूरज ज्यों दिखे पिघलता

खामोश जुबां पर कलम मेरी बोले

अनुभव की गठरी को धीरे से खोले

कविता गूंजे जैसे कोयल की कूक

किस्से कहानी ज्यों सर्दी की धूप

लेखों से अर्थों का सागर बहे

भाषा जो सीधी जा दिल में रहे

समय है कम अरमान बहुतेरे

कैसे सच होंगे सब सपने ये मेरे

तदबीर से ऐसी तकदीर पाऊं

कर्मों से जन्मों का कर्ज़ा चुकाऊं।

Categories: कविता

6 responses so far ↓

  • bhuvnesh // November 3, 2006 at 5:39 pm

    जीवन के दोनों ही रंगों को खूबसूरती से उकेरा है शब्दों में। बाद की कविता ज्यादा अच्छी लगी।

  • प्रमेन्‍द्र प्रताप सिंह // November 3, 2006 at 8:20 pm

    आपने जीवन रूपी एक सिक्‍के के दोनो पहलूओं को जीवन्‍त चित्रण किया है।

  • समीर लाल // November 3, 2006 at 10:54 pm

    चलो, यह अच्छा रहा, कविता आशा वाली बाद में है, निराशा खत्म हो गई. बढ़ियां भाव हैं.

  • मनीष // November 4, 2006 at 9:17 am

    जीवन आशा और निराशा के पहियों पर उछलती तो कभी मन्द होती सतत चलने वाली गाड़ी का दूसरा नाम है ।

  • हितेन्द्र // November 4, 2006 at 4:56 pm

    कर्मों से जनमों का कर्जा चुकाने की बात अच्छी है। पर ऐसा कोइ कर्जा सचमुच होता है क्या? नीचे वाली कविता में बस यूँ लगा ज़रा सा कि नीरज का प्रभाव है।

  • संजय बेंगाणी // November 5, 2006 at 10:30 am

    आशा और निराशा.
    दोनो पर अच्छी कविता लिखी है.

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