रत्ना की रसोई

Entries from November 2006

प्रेम का त्रिकोण

November 23, 2006 · 9 Comments

पुरूष प्रकृति भंवरे के समान वांछित-अवांछित पर मंडराती ही रहती है इसीलिए पतिदेव जब एक खूबसूरत माडल को देख लालायित हो उठे और हमारे हिस्से का समय उसकी परख-पड़ताल में बिताने लगे तो हमने य़ह सोच कर आंखें मूंद ली कि नया-नया शौक है, चाहत की साध पूरी कर लेने दो, चार दिन में ऊब जाएंगें, मन भर जाएगा, खुमार उतर जाएगा और अपने पुराने ढर्रे पर लौट आएंगें।

कितने गलत थे हम। देखते ही देखते शौक आदत बना और खुमार नशा। पतिदेव उस माडल से उकताए तो उनकी नजरें भटकनें लगी और लार किसी अन्य के लिए टपकने लगी। नम्बर एक से नम्बर दो और फिर तीनयानि सिलसिला कुछ ऐसा चल निकला कि पानी गले तक आ पहुँचा और बात हमारी बर्दाशत से बाहर हो गई। लाख बार समझाया कि अपनी चाहत को लगाम दो, बेकार में पैसा पानी की तरह मत बहाओ। परन्तु कानों पर जूं तक न रेंगी। उल्टे यह कह कर– ” क्या कोई अपनी कमाई का एक भाग अपनी मरजी से खर्च भी नहीं कर सकताउन्होंने हमारी ज़ुबान पर ताला डाल दिया।

हम सामने बैठे होते और पतिदेव उससे गाल सटा कर, मुस्काते बतियाते तो हमारे सीने पर हज़ारों सांप लोट जाते। मौके-बेमौके उसके अंग-प्रत्यंग टटोलना, उसके चेहरे की इबारत पढ़ना और उसकी हर प्रतिक्रया को आंकना-जांचना, जब हद से ज्यादा बढ़ने लगा तो हमारे सब्र का सोत्र सूख गया। हमारे प्रेम को तिलांजली देकर उनका किसी अन्य के साथ टाइम-पास करना आखिर हम कब तक सहते। मेरा पति सिर्फ मेरा है “ यह फिल्म हमने दस बार देखी थी सो एक दिन पांव पटक कर अल्टीमेटम दे दिया कि इन चोंचलों के चस्के को चुकता कर दो वरना

साहब को मानो मन की मुराद मिलने वाली थी, चेहरे से टपकती खुशी को गम्भीरता की रुमाल से पोंछते हुए बोले– “ वरना क्या तुम मायके चली जाओगी” हमने घूर कर उन्हें देखा और बर्फ की सिल्ली जैसे ठोस और ठंडे शब्दों में कहा–“ जी नहीं। वरना मैं आपके नक्शे-कदम पर निकल पडूंगी। अपना घर छोड़ कर चल दूं, मैं इतनी बेवकूफ नहीं हूँ।पल भर को रंग स्याह पड़ गया। उन्होंने अविश्वास से हमारी ओर देखा। परन्तु फिर हमारी टकपूंजिया, पिलपिली, पुरातन-पंथी प्रवृत्ति का पल्ला पकड़, पारखी पतिदेव ठहाका मार कर हंस दिए, मानों कह रहे हो-चलत तो पावत ना,दौड़न चली है। ये मुँह मसूर की दाल।

उनकी हंसी से हुलस कर अगले ही हफ्ते हमने अपनी कथनी को करनी में बदल दिया और देखने में सुन्दर, अनेक गुणों से भरपूर, हर फन मौला मोबाइल खरीद लाए। जी हाँ, मोबाइल!

( क्यों, आप लोग कुछ और समझे थे क्या? खैर, छोड़िए, आगे सुनिए।)

 

हमारी पसंद को देख पतिदेव की आँखों में जो जलन और प्रशंसा की मिली-जुली लहर लहराई उसमें डूब कर हम तर हो ही रहे थे कि उनका अरे वाह! बढ़िया कैमरा, नेट सरफिंग सुविधा,ब्लू टूथ सब है। अच्छी चीज़ लाई होहमें ठिठका कर ठिठुरा गया। बाकी तो सब ठीक था पर यह ब्लू-टूथ क्या बला थी, हम समझ न पाए। हमारे ज्ञान-कोष में तो केवल ब्लू-ब्लड(Blue Blood) और विज़डम-टूथ(Wisdom Tooth) था।

अपने मुँह में कई सालों से मौजूद अक्ल-दाढ़ को हमने काफी हिलाया डुलाया पर ब्लू से टूथ के संगम की समस्या का समाधान न कर पाए। शायद आजकल ब्लू सामाग्री की कथायों और दांत दिखाने और दांत गढ़ाने की प्रथायों के चलते ब्लू और टूथ बच गया और क्योंकि अब अक्ल की बात कोई सुनना नहीं चाहता और खून में लाली रही नहीं, इसी लिए ब्लड और विज़डम शब्द समय की गर्त में खो गए। परन्तु खून सफेद होकर पानी सा पारदर्शी कैसे और क्यों हुया और विजडम कब और कहाँ विलुप्त हो गई, हम जान न पाए। इस सारी फिलासफी का मोबाइल से क्या सम्बन्ध है इसका प्रश्न का प्रबन्ध भी कठिन था।

अत: जिज्ञासा को शान्त करने हेतु हम पतिदेव की शरण में पहूँचे तो पता चला कि हमारी अक्ल के घोड़े गलत दिशा में दौड़ रहे थे। ब्लू टूथ तो एक तकनीक का नाम था जिसकी मदद से हम इधर का माल उधर बेधड़क,बेतार कर सकते थे। इतना सुनना था कि हमने ढेरों फोटो खींच डाली और उन्हें अपने डेस्क-टाप पर भेजने का प्रयोग कर डाला। प्रयत्न असफल रहा और इसका काऱण ब्लू-टूथ में ब्लू ब्लड के जीवाणू होना था। यानि ब्लू टूथ भी ब्लू-ब्लड लोगों की तरह अपने समकक्ष से ही मेल-जोल करता था और क्योंकि हमारे डेस्क-टोप में ब्लू-टूथ नही था जबकि पतिदेव के लेप-टोप में ब्लू-टूथ था सो मोबइल के सगं-संग मजबूरी में उनका लैप-टाप भी हमारे अधिकार क्षेत्र में आ गया।

आजकल हम मोबाइल, डेस्क-टोप और लैप-टाप के प्रेम के त्रिकोण में फंसे है और हमारा पहला प्रेम ( पतिदेव) हाशिए पर बैठ अपने मोबाइल से हमें SMS कर रहा है

तुम न जाने किस जहाँ में खो गए–;    आजा-आजा, मैं हूँ प्यार तेरा—-;    हम-तुम इक कमरे में बंद हो और मोबाइल गुम जाए.

   हमें  ‘लोहा लोहे को काटता है और कांटे से कांटा निकलता है’- की सत्यता प्रमाणित होती प्रतीत हो रही है।

 

 

 

Categories: बस यूँ ही

पग-पग कुआं, पग-पग खाई

November 11, 2006 · 7 Comments

नारी हूँ, इसलिए नारी-जीवन की विषमताओं को जानती हूँ और उसके मन की भावनाओं को पहचानती हूँ। शायद इसी कारण नारी से सम्बन्धित मेरी रचनाएं काफी सराही गई। परन्तु जब भी मैनें नारी के विषय में लिखा, मेरे विवेक ने यह उलाहना दिया कि नारीत्व के मोह से बंधे मेरे हाथों ने तुला का पलड़ा जान-बूझ कर स्त्री-सहानुभूति की ओर कुछ अधिक ही झुका दिया है। यह सत्य है कि आज भी नारी पर अत्याचार हो रहे हैं और कहीं-कहीं स्त्री की स्थिति समाज मे शोचनीय है, पर क्या इन परिस्थितियों के लिए केवल पुरुष ही जिम्मेवार है, स्त्रियों का कोई दोष नहीं? क्या पुरूषों के प्रति अन्याय बढ़ नहीं रहे हैं? नारी के हितों के रक्षक कानून क्या बेकसूर पुरषों का भक्षण नहीं कर रहे है? आज के बदलते परिवेश में क्या नारी सचमुच अबला रह गई है? हर बार अपनी जाति के प्रति वफादारी निभाते हुए मैनें इस आवाज़ को सरक्षंण कमज़ोर का अधिकार हैके कथन और भविष्य में भूल सुधारके वचन तले दाब दिया, किन्तु बिहारी बाबू की व्यंग्य-व्यथा की चीत्कार ने मुझे ऐसा झिंझोड़ा कि अचानक मेरे स्मृति-पटल पर कुछ दयनीय चेहरे उभर कर आ गए जिनसे मेरा परिचय एक लोक-अदालत में भाग लेने के दौरान हुया था।

अदालतों में लम्बित मुकद्दमों की बढ़ती संख्या से निपटने के लिए एक विकल्प के रूप में लोक-अदालतों की शुरूवात की गई थी। लगभग हर माह किसी भी रविवार को ज़िला कचहरी में इसका आयोजन होता है जहां दोनों पक्ष के लोगों को समझा बुझा कर उनकी सहमति से विवादों का निस्तारण किया जाता है। नारी पर हो रहे अत्याचार का मूल्यांकन हम प्राय: दहेज-उत्पीड़न और बलात्कार के बढ़ते हुए आंकड़ों के आधार पर करते है। पर इन आंकड़ों के विकरित तथ्य को जान मैं हैरान रह गई क्योंकि हमारी टीम के सामने अधिकतर मामले नारी नहीं अपितु पुरूष-उत्पीड़न के थे। सच और झूठ को परखना तो काफी कठिन है पर पुरुष-प्रतिवादियों के चेहरे पर पुती बेचारगी भोगे हुए कष्ट का हवाला दे रही थी। सबकी कहानियां जुदा थीं पर दर्द एक सा था।

एक तीस वर्षीय इन्जिनियर युवक पुलिस में दरोगा पत्नी से तलाक चाहता था। पत्नी तलाक के खिलाफ थी और उसका आरोप था कि पति अधिक दहेज की लालच में दूसरा विवाह करने हेतु तलाक मांग रहा है। जांच करने पर पता चला कि पत्नी किसी अन्य व्यक्ति के साथ रह रही थी, उससे उसका एक बच्चा भी था और पति की पारिवारिक सम्पत्ति के हिस्से की लालच में वह उसे कई बार मारने का यत्न भी कर चुकी थी। युवक की आँखों में डर, बदन पर चोट और जले के निशान को देख टीम के एक बुज़ुर्ग सदस्य को ताव आ गया और वे बोले- कैसे मरद हो तुम! एक औरत को नहीं संभाल सकते।आँसूओं से भीगा चेहरा उठा वो बोला था—” सर, मैं औरत को तो संभाल सकता हूँ पर इस मरद-नुमा औरत का क्या करूँ। न तो साथ रहना चाहती है न छोड़ना। अगर यह अपनी नौकरी छोड़ मेरे साथ कलकत्ता चले तो मै अभी तलाक की अरज़ी वापिस ले लूं और बच्चे को भी अपना लूं पर इसकी ज़िद है कि साथ रहना है तो इसके शहर में बदली करवानी पड़ेगी। मुझे मालूम है यहां आते ही यह और इसका पुलिस वाला दोस्त मुझे मार डालेंगे। मैं तो इतना दुखी हो चुका हूँ कि खुद ही फांसी पर झूल जाना चाहता हूँ पर इससे इसका काम और आसान हो जाएगा और यह मेरे माँ-बाप का जीना हराम कर देगी। छुट्टी लेकर पेशी दर पेशी दौड़ते हुए मैं थक चुका हूँ, जो यह मांगेगी मैं देने को तैयार हूँ बस इस जोंक से मेरा पीछा छुड़वा दीजिए।“

लोक अदालत की प्रभाव-हीनता और कानून के बंधे हाथ मुझे उस समय तड़पा गए थे जब दरोगा पत्नी ने ढिठाई से दबी ज़ुबान में कहा था– “कैसे छुड़वा देंगे। यह लोग कुछ नहीं कर सकते। कानून मेरे साथ है और फिर मैं तो कानून की रक्षक भी हूं। ऐसे सबूत जुटाउंगी कि तुम्हारी सात पीढियां न छुट पाएंगी।कानून की शिथिलता और कोमलांगी कही जाने वाली अबला की कठोर क्रूरता से मेरा यह पहला परिचय था।

दूसरा मामला तीन बच्चों के पिता का था। इन अबोध बच्चों की माँ उन्हें भगवान भरोसे छोड़ अपने प्रेमी के संग रंग-रलियां मनाने कहीं निकल गई थी। पत्नी की बेवफाई, नौकरी और बच्चो के पालन-पोषण के बीच पिछले दो सालों से पिसते उस सीधे-साधे इन्सान को देख लड़की के माता-पिता अपनी बेटी की करतूतों से इतने क्षुब्ध हो गए थे कि उन्होंने स्वंय जमाई को तलाक ले कर दूसरा विवाह करने की सलाह दी थी। लड़की का अता पता न होने के कारण, लड़की के माँ-बाप और भाई उसकी ओर से रज़ामंदी देने के लिए खुद हमारे सामने खड़े थे परन्तु हम समझते बूझते हुए भी कुछ कर पाने में असमर्थ थे क्योकि हमें लड़की की सहमति चाहिए थी।

अगले दो मामलों में लोक अदालत की उपयोगिता, उसके आयोजन पर होने वाला खर्च और हमारी कई घन्टों की मेहनत कुछ वसूल हुई जब दो जोड़ों को समझा बुझा कर हमने साथ रहने को मना लिया और उन्होंने तलाक की अरज़ी वापिस ले ली। पर यहाँ भी सुलह की पहल पति पक्ष की ओर से आई थी। अन्य दो नव-विवाहितों का सहमति से तलाक भी तभी सम्भव हो पाया था जब वर-पक्ष कन्या पक्ष की जायज़-नाजायज़ मांगों के समक्ष टूट कर झुक गया था। वातावरण का बोझिलपन मेरे अन्त: करण को उस समय मथ गया था जब एक सत्तर वर्ष का ग्रामीण वृद्ध बुक्का फाड़ कर रोने लगा क्योकि उसके आठ बच्चों की माँ सरपंच चुने जाने के बाद उससे तलाक चाहती थी। समझाने पर वह पांचवी पास, पचपन-साठ के लगभग आयु वाली, दबंग महिला ठेठ देहाती भाषा में हमें समझा गई कि वह इस खासंते, हांफते और कांखते बुड्डे का लेखा जोखा नहीं रख सकती। अब वह बच्चों के पास जाए या मरे खपे। उसे इससे कोई वास्ता नहीं है। बस वह उसके पास न आए। उसके पास उसकी तीमारदारी करने का टैम नहीं है।

मेरे साथी उस देहाती दम्पत्ति से हंसी ठट्ठा कर मामला रफ़ा दफ़ा रहे थे और मैं आधुनिक सीता और सती सावित्री के इस नवीनीकरण और पति को परमेश्वर मानने वाली पति-व्रताओं के पंथ परिवर्तन का विश्लेषण कर रही थी। असीम क्रोध से उफनती, मुख से नफरत की ज्वाला उगलती, हाथों मे कानून के विभिन्न अस्त्र-शस्त्र (Acts) थामे, चारों ओर विनाश की लीला रचती, ये नारियां शायद स्वंय को दुर्गा का अवतार समझ रही थीं। देवी माँ तो भगवान् शिव को चरणों में देख शान्त हो गई थी परन्तु ये चण्डी-स्वरूपा किस प्रकार शान्त होगीं, मैं समझ न पा रही थी। पुरूष-सहयोगी हंस कर कह रहे थे—पग-पग कुआं, पग पग खाई, ए मालिक क्यों नारी बनाई। सांस भी लें तो हिले खुदाई, ऐ मालिक क्या चीज़ बनाई।

घर लौटी तो मन का गुबार पन्नों पर कुछ इस प्रकार बिखर गया था—

नई सदी में नव-निर्मित हुई
नारी की पहचान
संस्कारों के बंधन पर क्यों
लगते उसको अपमान

सहनशीलता लाज और ममता
त्याग, प्रेम गुण दिए बिसार
उसकी सोच की धुरी बनी क्यों
मैं और मेरे की तकरार

पिछली पीढ़ी की पीड़ा का
क्यों मांगे पुरषों से मोल
क्षमा बड़न् का शस्त्र है
भूल गई यह सीख अनमोल

आदम के हर गुण-अवगुण पर
उसने अधिकार जताया है
सब कुछ पा लेने की चाह में
अपना अस्तित्व गंवाया है

नारी के बिन नर है अधूरा
बिन नर नारी अपूर्ण
दोनों के सहयोग से बनती
ये सृष्टि सम्पूर्ण ।

Categories: बस यूँ ही

जीवन के दो रंग

November 3, 2006 · 6 Comments

निराशा

संसकारों की बेड़ियां

रिश्तों की दिवारें

तन के कारावास पर

पहरा देती सांसे

रूह ने कौन जुर्म किया है

क्यों है कैद बेचारी

अरमानों की भट्टी चढ़ने में

क्या उसकी लाचारी

आँखों की खिड़की से दिखती

कभी उसकी परछांई

आज़ादी के लिए तरसती

थकी हारी उकताई

अपमान के आंसू पीती

खाती नफरत के कोड़े

सही गल्त की आंधी उसकी

काया को झकझोरे

ज़ुल्मों के पाटों में पिसती

तिल तिल बिखर न जाए

ऐ मालिक अब मुक्ति दे दो

कहीं रूह मर न जाए।

 

आशा

काश मै एसी तकदीर पाऊं

जीवन के पल छिन को यूं न गवाऊं

जीऊं तो जीने के मायने बदल दूं

सांसो के सुर और तराने बदल दूं

जान हो मेरी अमानत जहां की

काम नशा और इच्छा हो साकी

माटी के तन से यूँ महके अपनापन

गीली मिट्टी से ज्यों उड़ता सोंधापन

जाने अन्जाने तूलिका जो उठाऊं

बेरंग तस्वीरों को फिर से सजाऊं

अधरों पर उनके हंसी सी खिले

भावों को बोलती भावुकता मिले

रंगों की पाए वो इतनी विविधता

सांझ का सूरज ज्यों दिखे पिघलता

खामोश जुबां पर कलम मेरी बोले

अनुभव की गठरी को धीरे से खोले

कविता गूंजे जैसे कोयल की कूक

किस्से कहानी ज्यों सर्दी की धूप

लेखों से अर्थों का सागर बहे

भाषा जो सीधी जा दिल में रहे

समय है कम अरमान बहुतेरे

कैसे सच होंगे सब सपने ये मेरे

तदबीर से ऐसी तकदीर पाऊं

कर्मों से जन्मों का कर्ज़ा चुकाऊं।

Categories: कविता