रत्ना की रसोई

Entries from October 2006

एक शाम काव्य-गोष्ठी के नाम

October 13, 2006 · 13 Comments

कवि और कवियत्री के हमसफ़र का सफ़र काफी दुश्वार होता है। कवि महाराज़ रोज़ अपनी महारानी के गुणों का गुणगान ऐसे चुनिंदा शब्दों में करते है कि बेचारी सुघढ़, सुमुखी, नायिका सरींखी पत्नी, सरस्वती के उपासक को लक्ष्मी के द्वारे ठेलती, गृहकायों के कोल्हू में पेलती, डांटती-फटकारती हन्टर वाली खलनायिका के रूप में प्रसिद्धि पाकर, परिचितों से आँखें चुराती और अपनी धूमिल छवि को चमकाती नज़र आती है। कवियत्री के पति का व्यक्तित्व-हनन तो नहीं होता पर उसे एक अन्य प्रकार का कष्ट भोगना पड़ता है।

कल्पना की उड़ान के दौरान निर्मित हुए, अपने अधपके विचारों के समान कच्चे-पक्के पदार्थ, स्वामी के समक्ष परोस कर, हाथ में कविता का पात्र(डायरी) थाम कर, जब उसकी सरस्वती-स्वरूपा राग छेड़ती है तो पतिदेव की आत्मा तृप्त हो जाती है। अतुलनिय खाद्य को पद्य-रस में लपेट कर हलक के नीचे गटकने की कोशिश में वह बरबस कह उठता है-

बिना बदरी गगन में, हमें बिजली दिखी है

हाय! उन्होंने फिर आज कविता लिखी है

इसी काव्य जनित कष्ट में जीवन काटते हमारे साहब को कुछ रोज़ पहले एक काव्य-गोष्ठी में बतौर मुख्य-अतिथी आमन्त्रित किया गया। सार्वजनिक कार्यक्रमों से कन्नी काटने वाले, फीता-कटाई व भाषण-बाज़ी पर भाषण झाड़ने वाले हमारे नाथ ने जब आयोजकों को नियत दिन दर्शन देने का वरदान दिया तो हमारी मन्द बुद्धि उनकी लीला समझ न पाई। खैर, अन्धा क्या चाहे- दो आँखें। इस अकारण और अप्रत्याशित मिले उपहार को शीश धरे, आयोजन का आनन्द लेने के प्रयोजन से, अपनी दो-चार कवितायों से लैस हो, हम सही समय और सही आसन पर स्वामी नारायण की बगल में विराज गए।

साहित्यिक-सभा के रूप में मनाए गए इस आयोजन के आरम्भ में दीप-प्रजवल्न के बाद कविता, निबन्ध, कहानी,व्यंग्य एवं नारा- लेखन पर आयोजित अंतर-विद्यालय प्रतियोगितायों में विजयी हुए विद्यार्थीयों को पुरूस्कार देकर प्रोत्साहित किया गया। तदापुरान्त मुशहरा/काव्य-गोष्टी का आरम्भ हुया जिसमें मुनव्वर राना,बुद्धसेन शर्मा, विनोद श्रीवास्तव, सुधांशु उपाध्य, कमलेश द्विवेदी, यश मालवीय, श्यामा सिंह सबा‘, ताजवर सुल्ताना और रागिनी चतुर्वेदी जैसी हस्तियों ने हिस्सा लिया। कई घन्टें तक ये लोग रसधारा बहाते रहे और हम भाव-विभोर हो उस मधु-रस में गोते लगाते रहे।

 

गोष्ठी का संचालन यश मालवीय जी ने ऐसे दिलकश अंदाज़ में किया कि मानो समां बंध सा गया। उनका हर किस्सा हास्य-रंग की फुहार से तन मन को सराबोर कर गया। उनके शुरूवाती किस्सेएक कवि ने रेल में सफर के दौरान बातचीत के इरादे से अपने सहयात्री से कहा– “मैं कवि हूँ।सहयात्री बोला–“ मैं बहरा हूँ ।”पर जो हंसी छिटकी तो अन्त तक बिखरती ही चली गई।

सर्वप्रथम बुद्धसेन शर्मा जी ने शमा जलाई और खुद की तबियत ख़राब होते हुए भी श्रोतायों की तबियत खुश कर दी। उनके अनुसार

 

मुझे ए रास्तों पल भर ठहरने की इजाज़त दो

कहीं चलते हुए भी पांव का कांटा निकलता है।

मां-बाप को नसीहत देते हुए उन्होंने कहा

अभी सच बोलता है ये,

अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा

अगर डांटोगे तो बच्चा

बहाना सीख जाएगा।

 

बुद्धसेन जी का हर एक मोती अनमोल था। वो खजाना लुटा रहे थे और हम संचित करने में असमर्थ क्योंकि ऐन मौके पर हमारा पेन और मोबाइल दगा दे गया था। जब तक मामला फिट हुया माइक पर रागिनी जी गीत गा रही थी – “घटा याद आई,नदी याद आई, तुम्हारी खनकती हंसी याद आई।

एक नारी अपने प्रियतम को याद करे और दूसरी कुछ न कहे ,यह कैसे हो सकता है, ताजवर सुलताना ने सुर में सुर मिलाया–”जब से वो हमसफ़र मिल गया है, जीने का हर हुनर मिल गया है।

हुस्न का हुनर देख इश्क मचल उठा और विनोद श्रीवास्तव जी की ज़ुबान में बोला

 

 

मैं अगर रूठ भी जाऊं तो क्या

मैं अगर छूट भी जाऊं तो क्या

तुम को मिल जाएंगे कई दर्पण

मैं अगर टूट भी जाऊं तो क्या।

 

उनकी यह चार लाइनें मुझे बेहद पसंद आई

धर्म छोटे बड़े नहीं होते

जानते तो लड़े नहीं होते

चोट तो फूल से भी लगती है

सिर्फ पत्थर कड़े नहीं होते।

 

मेरे विचार में एक अच्छी कविता या उम्दा शेर का सही तोल तालियां नहीं होती पर फिर भी कमोबेश श्रोतायों की पसंद-नापसंद को तो ये मापती ही है। सम्मेलन में सबसे अधिक तालियां राना साहिब के अतिरिक्त श्यामा सिहं सबा‘ ,कमलेश द्विवेदी,और सुधांशु उपाध्याय को मिली। सुधांशु जी की इस कविता पर जो तालियां बजनी शुरू हुई तो बहुत देर बाद थमी।

 

बड़ी बेटियां बेटी कम

अधिक सहेली हो जाती हैं

जब घर में केवल बेटे होते हैं

माएं और अकेली हो जाती हैं

अपना हिस्सा नहीं मांगती

खुद हिस्सा बन जाती हैं

माँ की आँखें वो छननी हैं

जहाँ बेटियाँ छन जाती हैं।

 

आयोजन स्थल महिला महाविद्यालय था, सुधांशु जी की पत्नी वहाँ शिक्षिका थी, अत: मैं समझ न पाई कि लगातार बजती तालियों की हकदार उनकी कविता है या——–

 

आस्ट्रेलिया से हाल में लौटी श्यामा सिंह सबाजी की जो रचना सबसे अधिक सराही गई ,वो थी

 

नरम लहजे में भी मुमकिन है कि नफरत मिल जाए

अब तो फूलों की भी पोशाक में बम मिलते है।

अपने चेहरे पर ये नया चेहरा लगाना छोड़ दे

ए ज़माने अब नए फितने जताना छोड़ दे।

आइने के सामने आ देख अपनी खामियां

गैर के किरदार पर उंगली उठाना छोड़ दे।

ऐसा न हो कि आप भी हो जाएं बेज़ुबान

अच्छा नहीं मज़ाक किसी बेज़ुबां के साथ

प्यार उलफ़त कसौटी से अलग ही रखना

साथ तोहफ़े के मुनासिब नहीं कीमत लिखना।

 

श्यामा जी की बुलंद आवाज़ ने एक-एक शब्द मानों दिलों पर उकेर दिया। यश मालवीय की यह कविता भी काफी पसंद की गई। —-

आओ भाई राम सुभग

दरी बिछाओ राम सुभग

मंच लगाओ राम सुभग

माइक लाओ राम सुभग

भीड़ जुटाओ राम सुभग

 

मुनव्वर राना साहब मंच पर आने वाले थे,अपनी शेरो-शायरी से रंग गहराने वाले थे कि अन्जाने में हमारी ज़ुबान से यह जुमला फिसल कर पतिदेव के कान में जा गिरा– “इतनी अच्छी रचनाएं सुनने के बाद हमें अपनी कविता-गिरी पर शर्म आ रही है। सोचतें है कि कविताएं लिखना छोड़ दें। पतिदेव ने झुक कर फुसफुसा कर कहा–” यही बात समझाने तो हम तुम्हें इस कवि-सम्मेलन मेंं लाए थे। चलो देर आए दुरूस्त आए। गरदन घुमा साहब मुनव्वर राना को सुन रहे थे और हम गरदन लटकाए अपना सिर धुन रहे थे।

 

शेष फिर

Categories: बस यूँ ही

हालत नौनिहालों की

October 10, 2006 · 8 Comments

परिचर्चा पर एक सदस्या ने हमें फिल्मी कव्वाली की धुन पर, बच्चों के जीवन से सम्बन्धित एक गीत लिखने को कहा था। नीचे लिखा गीत उसी फरमाइश का परिणाम है।

आज इस सादी डिश से काम चला लें । वादा है, अगली बार हम ऊँची और मशहूर दुकानों पर उम्दा ढंग से बने, बढिया व्यंजन लेकर उपस्थित होगें।

वो क्या है कि दो रोज़ पहले ही कुछ मशहूर शायरों और कवियों से मुलाकात हुई है। ज़ाहिर है मुलाकात हुई है तो बात भी हुई होगीं।

अब बात हो और दूर तलक न जाए यह तो सम्भव नहीं है।

 

गीत

 

( गीत और धुनये देश है वीर जवानों का,

अलबेलों का मस्तानों का–)

सुनो हालत हम मतवालों की

इस देश के नौनिहालों की

हम दिल का हाल, होए-होए

हम दिल का हाल सुनाते है

तुम्हें दर्द अपना दिखलाते है

——-—————–

हो————————-

हम ज़रा सा बस तुतलाए थे

माँ ने ढेरों सबक रटाए थे

यहाँ मुँह खोलना, होए- होए

यहाँ बोलना तक जंजाल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुया

———————

हो———————–

अभी चलना सीख न पाए थे

पापा स्कूल ले आए थे

यहाँ कदम बढ़ाना, होए-होए

यहाँ चलना तक भूचाल हुआ

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

———————

हो———————–

जब भोऱ के सपने आते है

माँ-बाप झिंझोड़ जगाते है

यहाँ सपन-सलौना,होए-होए

यहाँ सपनों का आकाल हुआ

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

———————

हो———————–

जब क्लास में भूख सताती है

तो टीचर पाठ पढ़ाती है

यहाँ खाना-पीना, होए-होए

यहाँ खाना तक मुहाल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

———————

हो———————–

संध्या को खेल न पाते है

हम होमवर्क निपटाते है

यहाँ खेलना-कूदना, होए-होए

यहाँ खेलना एक ख्याल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुआ

———————

हो———————–

जब से दुनिया में आए है

हम खुल कर न मुस्काए है

यहाँ हंसना-हंसाना,होए- होए

यहाँ हंसना तक बे -ताल हुया

हाय बचपन का बुरा हाल हुया

यहाँ बोलना तक जंजाल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुया

यहाँ चलना तक भूचाल हुआ

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ सपनों का आकाल हुआ

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ खाना तक मुहाल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ खेलना एक ख्याल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुआ

यहाँ हंसना तक बेताल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुया

हाय बचपन का क्या हाल हुया

Categories: कविता

उठ जाग मुसाफ़िर भोर भई—

October 7, 2006 · 6 Comments

 

चिड़ियो का मचने लगा शोर

लगता है अब हो गई भोर

उठ खिड़की का परदा खींचें

उगता सूरज आंखों में मींचें

पड़े अधूरे दर्जनों काम

सैर, योग और व्यायाम

 

 

रोके रज़ाई की गरमाई

गुदगुदे गद्दे की नरमाई

लगे बदन में कुनकुना दर्द

बाहर हवा भी है कुछ सर्द

अभी तो हुई थी रोशनी मंद

अभी तो की थी आँखें बंद

 

 

थोड़ी देर ज़रा और सो लें

सपनों की नगरी में डोलें

सालों से न किया आराम

चलते रहे उमर भर काम

चलो सुबह की सैर आज छोड़े

बरसों पुराना नियम तोड़ें

 

 

यही सोच जो हम अलसाए

घड़ी ने छ: से आठ बजाए

भूल अंगड़ाई उछल कर जागे

खोए समय को खोजने भागे

दिनचर्या में मची हड़बड़ी

न चाह कर भी हुई गड़बड़ी

 

 

दो घन्टे की निंदिया प्यारी

पड़ गई सारे दिन पर भारी।।

Categories: कविता

Man,Woman And Happiness

October 3, 2006 · 7 Comments

सागर जी ने रुठी सजनी को मनाने का मार्ग सुझाया था। क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सजनी कभी रुठे ही नहीं । बिल्कुल हो सकता है ,नीचे लिखे संजाल छाप पेस्ट से स्वयं को चमकाए और सदैव पत्नी की कालगेटी मुस्कान पाएं। घूमते घूमाते हम यह नुस्खा कहीं पर पा गए थे सो सोचा आप लोगों से शेयर कर लें। हींग लगे न फिटकरी और रंग –भैया उसका क्या चढ़े न चढ़े. टिकाऊ और सही रंग की गारंटी तो आजकल के फैशनपरस्त जगत् में कहीं नहीं मिलती। तो आइए,आज़माइए और सुखी हो जाइए। क्योंकि—-

IT IS REALLY NOT DIFFICULT TO MAKE A WOMAN HAPPY
WELL, It’s really not difficult at all…
To make a woman happy; a man only needs to be :
1. a friend
2. a companion
3. a lover
4. a brother
5. a father
6. a master
7. a chef
8. an electrician
9. a carpenter
10. a plumber
11. a mechanic
12. a decorator
13. a stylist
17. a psychologist
18. a pest exterminator
19. a psychiatrist
20. a healer
20. a good listener
22. an organizer
23. a good story teller
24. very clean
25. sympathetic
26. athletic
26. warm
27. attentive
28. gallant
29. intelligent
30. funny
31. creative
32. tender
33. strong
34. understanding
35. tolerant
36. prudent
37. ambitious
38. capable
39. courageous
40. determined
41. true
42. dependable
43. passionate

WITHOUT FORGETTING TO:
44. give her compliments regularly
45. love shopping
46. be honest
47. be very rich
48. not stress her out
49. not look at other girls

AND AT THE SAME TIME, YOU MUST ALSO:
50. give her lots of attention, but expect little
yourself
51. give her lots of time, especially time for herself
52. give her lots of space, never worrying about where
she goes

IT IS VERY IMPORTANT:
53. Never to forget:
* birthdays
* anniversaries
AND NOW—

HOW TO MAKE A MAN HAPPY__
Just leave him in PEACE.

PEACE अर्थात शांति जो कलियुगी नश्वर संसार में मिलनी असंभव है। अब असंभव वस्तु चाहेंगे तो कैसे खुशियां पावेंगे।—-

Categories: बस यूँ ही