रत्ना की रसोई

मुनव्वर राना और शायरी

October 27, 2006 · 24 Comments

मैं इक फकीर के होंठों की मुस्कुराहट हूँ

किसी से भी मेरी कीमत अदा नहीं होती

जिनाब मुनव्वर राना साहब का यह शेर उनकी शख्सियत पर सौ फी सदी खरा उतरता है। उनकी लाजवाब शायरी,उस शायरी को पेश करने का दिलकश अन्दाज़, उस अंदाज़ को जज़बात देती बुलन्द आवाज़ सब मिलकर इस कदर मुतासिर करते है कि सुनने वाला बेहिचक कह उठता है

धुल गई है रूह लेकिन दिल को यह एहसास है,

ये सकूँ बस चंद लम्हों को ही मेरे पास है।

 

मुशहरे और काव्य-गोष्ट्ठियों में कहकहे और ठहाके तो अक्सर सुनाई देते है पर आखों में नमी, मुनव्वर राना जैसे हुनरमंद ही ला पाते है। दर्द के एहसास की तपिश जब दिल को तपाती है तभी आँसू टपकता है। मुसल्सल टीस की चोट से गढ़ी गई गज़लों की गूँज ताउमर साथ चलती है। राना साहब की शायरी भी अपनों की जुदाई के गम से तप कर निकली है इसी लिए सीधे दिल पर असर करती है। अपनी किताब माँमें आप कहते है–” बचपन में मुझे सूखे की बिमारी थी, शायद इसी सूखे का असर है कि आज तक मेरी ज़िन्दगी का हर कुआं खुश्क है, आरज़ू का ,दोस्ती का, मोहब्बत का, वफ़ादारी का। मेरी हंसी मेरे आंसूयों की बिगड़ी हुई तस्वीर है, मेरे एहसास की भटकती हुई आत्मा है। मेरी हंसी इंशाकी खोखली हँसी, ‘मीरकी खामोश उदासी, और ग़ालिबके ज़िद्दी फक्कड़पन से बहुत मिलती जुलती है।

 

 

मेरी हँसी तो मेरे गमों का लिबास है

लेकिन ज़माना कहाँ इतना गम-श्नास है

हम न दिल्ली थे न मज़दूर की बेटी लेकिन

काफ़िले जो भी इधर आए हमें लूट गए

कच्चे समर शजर से अलग कर दिए गए

हम कमसिनी में घर से अलग कर दिए गए

मुझे सभांलने वाला कहाँ से आएगा

मैं गिर रह हूँ पुरानी इमारतों की तरह

ज़रा सी बात पर आँखें बरसने लगती थी

कहाँ चले गए वो मौसम  चाहतों वाले

हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है

हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है।

मैं पटरियों की तरह ज़मी पर पड़ा रहा

सीने से गम गुज़रते रहे रेल की तरह

 

बेबसी के आलम में भी वो खुद्दारी की बात करते है

 

चमक ऐसे नहीं आती है खुद्दारी के चेहरे पर

अना को हमने दो दो वक्त का फाका कराया है

दिल ऐसा कि सीधे किए जूते भी बड़ों के

ज़िद इतनी कि खुद ताज उठा कर नहीं पहना

मियां मै शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती

मैं लहजा नरम भी कर लूँ तो झुंझलाहट नही जाती

 

 

 

राना साहब की शायरी में जहाँ दर्द का एहसास है, खुद्दारी है, वहीं ऱिश्तों का एहतराम भी है। उन्होंने तकरीबन हर रिश्ते की अच्छाई और बुराई को अपने शेरों में तोला है। बुज़ुर्गों के बारे में वो बड़ी बेबाकी से एक तरफ कहते है

खुद से चलकर नहीं ये तर्ज़े सुखन आया है,

पांव दाबे है बुज़ुर्गों के तो फन आया है।

मेरे बुज़ुर्गों का साया था जब तलक मुझ पर

मैं अपनी उमर से छोटा दिखाई देता रहा।

 

 

जबकि दूसरी ओर कहते है

मेरे बुज़ुर्गों को इसकी खबर नहीं शायद

पनप सका नहीं जो पेड़ बरगदों में रहा।

इश्क में राय बुज़ुर्गों से नहीं ली जाती

आग बुझते हुए चूल्हों से नहीं ली जाती

 

 

बच्चों के लिए उनकी राय है कि

हवा के रुख पे रहने दो ये जलना सीख जाएगा

कि बच्चा लड़खड़ाएगा तो चलना सीख जाएगा
इन्हें अपनी ज़रूरत के ठिकाने याद रहते है

कहाँ पर है खिलौनों की दुकां बच्चे समझते है।

 

 

 

दो भाईयों के प्यार और रंजिश को वो यूँ देखते है

अब मुझे अपने हरीफ़ों से ज़रा भी डर नहीं

मेरे कपड़े भाइयों के जिस्म पर आने लगे।

तन्हा मुझे कभी न समझना मेरे हरीफ़

एक भाई मर चुका है मगर एक घर में है

 

 

जो लोग कम हो तो कांधा ज़रूर दे देना

सरहाने आकर मगर भाई भाई मत करना

आपने खुलके मोहब्बत नहीं की है हमसे

आप भाई नहीं कहते है मियाँ कहते है

कांटो से बच गया था मगर फूल चुभ गया

मेरे बदन में भाई का त्रिशूल चुभ गया

 

 

बहनों और बेटियों के प्रति ज़िम्मेवारी समझाते हुये उनके ये शेर हमारे समाज में लड़कियों की नाज़ुक स्थिती पर भी रोशनी डाल जाते है

किस दिन कोई रिश्ता मेरी बहनों को मिलेगा

कब नींद का मौसम मेरी आँखों को मिलेगा

बड़ी होने लगी है मूरतें आंगन में मिट्टी की

बहुत से काम बाकी है संभाला ले लिया जाए

ऐसा लगता है कि जैसे खत्म मेला हो गया

उड़ गई आंगन से चिड़ियां घर अकेला हो गया।

तो फिर जाकर कहीं माँ-बाप को कुछ चैन पड़ता है

कि जब ससुराल से घर आ के बेटी मुस्कुराती है

 

 

देवर-भाबी की चुहल बाज़ी देखिए

ना कमरा जान पाताा है न अंगनाई समझती है

कहाँ देवर का दिल अटका है भौजाई समझती है

 

 

माँ के लिए लिखे गये उनके शेर माँ की ममता के लहराते सागर से निकाले गये बेशकीमती मोती है इन मोतियों को उन्होंने माँ नामक संकलन की अंजुलि में भर, दुनिया की हर माँ के चरणों में अर्पित कर दिया है। यह किताब समर्पित है–” हर उस बेटे के नाम जिसे माँ याद है।क्योंकि वे कहते है– ” मैं दुनिया के सबसे मुकद्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ इसलिए करता हूँ कि अगर मेरे शेर पढ़ कर कोई भी बेटा माँ की खिदमत और ख्याल करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए। उनके अनुसार

 

 

इस तरह मेरे गुनाहों को वो धो देती है

माँ बहुत गुस्से में होती है तो रो देती है।

अभी ज़िंदा है माँ मेरी, मुझे कुछ भी नहीं होगा

मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

जब भी कश्ती मेरी सैलाब में आ जाती है

माँ दुआ करती हुई ख्वाब में आ जाती है

ऐ अंधेरे देख ले मुंह तेरा काला हो गया

माँ ने आँखें खोल दी घर में उजाला हो गया

लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती

बस एक माँ है जो मुझसे खफ़ा नहीं होती

मुनव्वरमाँ के आगे यूँ कभी खुलकर नहीं रोना

जहाँ बुनियाद हो इतनी नमी अच्छी नहीं होती

 

 

जन्म-दातीी से ऊपर उठ कर उनकी शायरी जन्म-भूमि की इबादत करती हुई कहती है

तेरे आगे माँ भी मौसी जैसी लगती है

तेरी गोद में गंगा-मैया अच्छा लगता है

यहीं रहूंगा कहीं उम्र भर न जाऊंगा

ज़मीन माँ है इसे छोड़ कर न जाऊँगा

पैदा यहीं हुया हूँ यहीं पर मरूंगा मैं

वो और लोग थे जो कराची चले गए

मैं मरूंगा तो यहीं दफ्न किया जाऊंगा

मेरी मिट्टी भी कराची नहीं जाने वाली

फिर उसको मर के भी खुद से जुदा होने नहीं देती

यह मिट्टी जब किसी को अपना बेटा मान लेती है।

 

 

यह उनका माँ से मोहब्बत का जज़बा था, उनकी सोच की गहराई थी, रिश्तों का एहसास था जो उन्होंने अपनी पुस्तक माँ को किसी को भेंट देते वक्त, उस पर औटोग्राफ देने से यह कह कर मना कर दिया – “माफ़ कीजिए, मैं माँ पर दस्ख़त नही करता।अकबर इलाहाबादी ने शायद सही कहा था

सखुन- सज्जी का क्या कहना मगर ये याद रख अकबर

जो सच्ची बात होती है वही दिल में उतरती है।

 

 

Categories: बस यूँ ही

24 responses so far ↓

  • समीर लाल // October 27, 2006 at 11:40 pm | Reply

    मज़ा आ गया, रत्ना जी. बेहद खुबसूरती के साथ आपने यह प्रस्तुति की है. इसी का इंतजार था.

    ऐसे ही लिखते रहिये. बधाई.

  • अनुराग मिश्र // October 28, 2006 at 1:10 am | Reply

    क्य़ा बेहतरीन शेर हैं। दिल खुश हो गया।

  • kali // October 28, 2006 at 3:42 am | Reply

    मज़ा आ गया, रत्ना जी. बेहद खुबसूरती के साथ आपने यह प्रस्तुति की है. क्य़ा बेहतरीन शेर हैं.

  • nitin // October 28, 2006 at 5:01 am | Reply

    बहुत खूब!! आपकी रसोई का शाही पकवान पसंद आया!

  • Prabhakar Pandey // October 28, 2006 at 5:42 am | Reply

    मुनव्वर राना साहब के दिल से फूटे हुए शेरों को आपने बहुत ही खूबसूरती और रोचकतापूर्ण ढंग से परोसा है और इस रचना में उनका व्यक्तित्व झलक उठा है ।

  • SHUAIB // October 28, 2006 at 10:33 am | Reply

    सच पूछें तो मुनव्वर राना की शायरी से ज़्यादा आपका उन पर लिखने का अंदाज़ बहुत पसंद आया।

  • Giriraj Joshi // October 28, 2006 at 10:42 am | Reply

    शुक्रिया रत्नाजी!!!

    मुनव्वर राना साहब शेरों को आपने बहुत ही खूबसूरती से परोसा है, इस कड़ी को जारी रखियेगा ॰॰॰

  • संजय बेंगाणी // October 28, 2006 at 1:04 pm | Reply

    बहुत खुब.
    शायरी भी और लेख भी.

  • Anoop Bhargava // October 28, 2006 at 11:14 pm | Reply

    वाह ! आनन्द आ गया ।

  • Reetesh gupta // October 28, 2006 at 11:29 pm | Reply

    रत्ना जी,

    बहुत सुंदर शेर हैं और उतनी ही बढ़िया आपकी भावुक प्रस्तुति …….

    बहुत धन्यवाद एवं बधाई !!!!

  • मनीष // October 29, 2006 at 12:10 am | Reply

    बहुत अच्छी प्रस्तुति ! ऐसे तो तमाम शेर बेहतरीन थे पर ये खास तौर पर पसंद आया
    मियां मै शेर हूँ शेरों की गुर्राहट नहीं जाती
    मैं लहजा नरम भी कर लूँ तो झुंझलाहट नही जाती
    भई वाह, खूब कहा है राना साहब ने !

  • प्रत्यक्षा // October 30, 2006 at 10:03 am | Reply

    बहुत बढिया !

  • reetesh gupta // November 1, 2006 at 8:14 pm | Reply

    सुनकर शायरों को लिखें हैं ये शेर मैंने
    ये लेखनी यह लिखावट मेरी नहीं मुनब्बर
    हम तो तेरे जैसे शायरों की बंदगी में स्वाहा हुए हैं

  • तुषार जोशी // December 5, 2006 at 5:54 pm | Reply

    नागपुर के पास कामठी में मुनव्वर राना साहब एक मुशायरे में शेर पढ़ के गये थे। मेरी खुश किस्मती थी के मैं वहाँ मौजूद था। तभी से उनकी शायरी का कायल हूँ। मै उनकी किताब “माँ” खरिदना चाहता हूँ। क्या मुझे कोई तरिका इस चिठ्ठे से मिल सकता है ? कोई पता कोई नंबर जहाँ मै पुछताछ कर पाऊँ?

  • prashant // December 16, 2006 at 10:58 am | Reply

    aap ka tah dil se sukriya ada karta hu,rana sahab ka har sher lajab he,…………………..unke bare me to bas ye kah sakta hu….
    tere man ki gahrayi ka RANA koi naap nahi,
    kya kahu tere baare me,itni meri AAUKAT nahi.

  • इन्द्रेश // January 24, 2007 at 11:52 am | Reply

    अच्छा है।

  • Indresh // January 24, 2007 at 12:00 pm | Reply

    ऐसा कोई शब्द नहिं मिल रहा जिससे आपकि तारिफ करुँ।

  • vijendra sharma // March 31, 2007 at 4:18 pm | Reply

    aap ne RANA Saheb ke kalam ko khubsurti se pesh kiya … Wah
    RANA SAHEB KO SUNANA EK ZINDAGI JINE KE BARABER HAI ……..

    MAAN kahan mil sakti hai ya publisher ka nam batana plz

    regards

  • uchit // August 16, 2007 at 3:36 pm | Reply

    कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है,मगर धरती की बैचेनी को बस बादल समझता है।
    तू मुझसे दूर कैसी है, मैं तुझसे दूर कैसा हूँ,ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है।
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  • amit // January 5, 2008 at 12:37 pm | Reply

    MEIN RANA SAHEB KA DIWANA HOON. ISS KITAB KO KAISE PA SAKTE HAIN KYONKI HUM MAA KO KHAREED NAHI SAKTE. PLEASE BATA DE PURE INDORE ME NAHI MILI YAH KITAB, BOOK FAIR ME BHI DHOONDA PAR MEIN BADNASEEB HI RAHA JO MUJHE MAA NAHI MILI. MUJH PE AHSAAN KAR DO, JAAN LE LO MAA NAAM KAR DO.

  • MD.Manazir Hasan // March 3, 2008 at 3:45 pm | Reply

    Very Nice

  • Diwaakar Pratap Singh // March 3, 2008 at 10:24 pm | Reply

    बहुत खूब! क्य़ा पकवान है और उतनी ही खुबसूरती के साथ आपने परोसा है, मज़ा आ गया !!
    बहुत – बहुत धन्यवाद।
    ऐसे ही लिखते रहिये……..

  • शिवेंद्र कुमार सिंह // April 2, 2008 at 2:12 am | Reply

    मुनव्वर भाई की शायरी प्रेमिका के पल्लू से निकल कर रोजमर्रा की परेशानियों से वाकिफ कराती है। हिंदी में पहली किताब बदन सराय (अगर मैं गलत नहीं हूं तो…) भी उन्ही को नसीब होती है जिन्हें मुनव्वर भाई का स्नेह मिला है। मंच के बेजोड़ शायर हैं मुनव्वर भाई-

    तुम्ही नवाजते तो क्यूं इधर उधर जाते
    तुम्हारे पास ही रहते क्यों छोड़कर जाते
    किसी के नाम से मंसूब ये इमारत थी
    बदन सराय नहीं था कि सब ठहर जाते

  • om // October 24, 2008 at 12:49 pm | Reply

    very nice.great thought.really you are very sensitive to mother.

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