रत्ना की रसोई

सागर और सरिता

September 23, 2006 · 5 Comments

 

जानें किस बात पर है सागर इतराता

अहंकार की गर्मी से हर पल उफनाता

सरिता जो उसमें समाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती ।

 

 

चाहत में उसकी वो बहती रही

जीवन के सुख दुख को सहती रही

पर्वत की पुत्री जब आकर मिली

अस्तित्व को उसके थी गरिमा मिली

अनुभवों की गाथा जो सुनाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती।

 

 

नाद नदी का बना उसकी गर्जन

मन की उमंग लाई लहरों में थिरकन

प्यार में उसके वो तिल तिल जली

बन कर धुंआ बादल में ढली

जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती ।।

 

 

Categories: कविता

5 responses so far ↓

  • hitendra // September 24, 2006 at 5:32 pm

    बन कर धुंआ बादल में ढली

    जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

    This was the best

  • मनीष // September 24, 2006 at 8:30 pm

    प्यार में उसके वो तिल तिल जली

    बन कर धुंआ बादल में ढली

    जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

    सागर में इतनी गहराई न होती ।।

    रत्ना जी इतनी सुंदरता से आपने इन पंक्तियों में अपनी बात रखी है कि मुँह से वाह-वाह निकले बिना नहीं रह पाता ।

  • संजय बेंगाणी // September 25, 2006 at 8:40 pm

    बहुत दिनो बाद कुछ पका हैं.

    सरिता जो उसमें समाई न होती
    सागर में इतनी गहराई न होती ।

    सत्य वचन और

    प्यार में उसके वो तिल तिल जली
    बन कर धुंआ बादल में ढली
    जो विरह में बदरी डबडबाई न होती
    सागर में इतनी गहराई न होती ।।

    वाह वाह..

    कहना न होगा सागर ने भी ऐसे प्रेम से समा लिया था की विरह में बदरी डबडबाई.

  • pratyaksha26 // September 26, 2006 at 2:09 pm

    अच्छी कविता

  • Prabhakar Pandey // October 1, 2006 at 2:56 pm

    आपकी रसोई में पकी यह कविता खुशबूदार है और आपकी
    भावनाओं ने इसे अथाह गहराई दी है.
    -धन्यवाद.

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