झीनी सी चूनर ओढ़े
लाज हया घर पर छोड़े
मुक्त हवा सी बल खाती
सुघड़ बनावट दिखलाती
यौवन मद के नशे में चूर
मुखड़े पर लिए अजब सा नूर
बला की बाला जो निकली
कईयों की नज़रे फिसली
वो खम्बें से जा टकराया
ये मानों है बुत की काया
एक ने उसका रूप आंका
दूजे ने भीतर तक झांका
इसने भरीं ठन्डी आहें
उसने फैला दीं बाहें
हर कोई चाहे उसको पाना
रस पीकर बस फिर उड़ जाना
रूप को अपने गोरी छुपा ले
गुणों की बोली पहले लगा ले
मिले अगर सच्चा खरीदार
दे उसको सारे अधिकार
मुश्किल में वो साथ चलेगा
उसके लिए न रूप ढलेगा
ऐसे नर का रख अरमान
जिससे मिले पूरा सम्मान।।









7 responses so far ↓
संजय बेंगाणी // September 13, 2006 at 5:01 pm
शरारतपूर्ण शुरूआत से होती हुई सिख देकर पूर्ण होती यह कविता आपकी रसोई का उत्तम व्यंजन हैं.
बला(बाला) सम्भले तो जग को सम्भलने का मौका मिले.
समीर लाल // September 13, 2006 at 8:39 pm
यह क्या पकने लगा रसोई मे आपकी. लगता तो लज़ीज है.
नीरज दीवान // September 13, 2006 at 11:34 pm
इतनी सुंदर नारी, भई वाह.
मिले अगर सच्चा खरीदार
दे उसको सारे अधिकार
मुश्किल में वो साथ चलेगा
उसके लिए न रूप ढलेगा
ऐसे नर का रख अरमान
जिससे मिले पूरा सम्मान।।
- उक्त पंक्तियां बहुत पसंद आईं. धन्यवाद रत्ना जी.
rahi // September 14, 2006 at 2:26 am
सादगी का सँबंध, ज्यादा सच्चा है
‘बला’ यदि टल जाये, तो ही अच्छा है
hitendra // September 16, 2006 at 2:00 pm
बला की बाला जो निकली
कईयों की नज़रे फिसली
अति सुंदर!
मनीष // September 19, 2006 at 11:12 am
वाह भई वाह ! बहुत सुंदर भाव और संदेश
SHUAIB // September 21, 2006 at 11:21 am
रत्ना जी आपकी ये रसोई भी लज़ीज़ है
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