एक दिन अपने मूषकराज पर सवारी करते हुए हम हिन्दी विकीपीडीया पर जा पहुंचे और पाया कि वहां की रसोई बिल्कुल सूनी है। पकवानों के नाम पर वहां खाना-खजाना से लाया गया केवल एक बटर चिकन रखा था। सोचा क्यों न अपनी रसोई के कुछ अन्य व्यंजन वहाँ रख दिए जाएं। रत्ना-रैस्पीज़ में व्यंजनों की विधीयां इसी ख्याल से मैंने लिखनी शुरू की है। पर फ़ीरनी परोसते ही जब शुहेब जी के मुँह से वाह की बजाए आह निकली तो मन भर आया। रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे अनेकों युवा पढ़ने या नौकरी करने घर से कोसों दूर चले जाते है और परदेस में दाल-रोटी तक को तरस जाते है। परिभ्रमण के दौरान केवल हफ्ता भर होटलों का खाना खाने के पश्चात् ही जब घर की दाल की याद सताने लगती है तो कई महिने और साल घर से दूर रहने वालों की क्या हालत होती है,इसकी कल्पना मात्र ही आँखे डबडबा देती है। मेरे दोनों बेटे बाहर पढ़ रहे है इसलिए शुहेब जी की व्यथा मैं अच्छी तरह समझ सकती हूँ। सोलह साल तक जो बेटे घर में पकी मुर्गी को दाल का दरज़ा दे नाक-भौं सिंकोड़ते थे, छुट्टी में घर लौटने पर जब मेरे सामने बैठ कर सुड़प-सुड़प के दाल पीते है तो दिल में एक चुभती सी टीस उठती है। हालांकि उनकी खिसियानी हंसीं परिस्थितीयों से सीखा हुया आटे दाल का भाव बयान करती है परन्तु उन की अनुपस्थिती में खाना मेरे हलक में अटकता है। रसोई में घुसने को मन नहीं करता, अवन में काकरोच बसेरा बना लेते है और मिक्सी की मोटर जाम हो जाती है। रत्ना रैस्पीज़ में शुहेब जी जैसे लोगों के लिए कई तरह की सुस्वादु दाल बनाने की सुगम और सरल विधियां लिख रही हूँ । उनके ज़रिए अगर एक प्रतिशत भी घर के खाने का स्वाद परदेस तक पहुँच पाया तो मेरी मेहनत सफल हो जाएगी। दूसरे बेटे के छात्रावास जाने पर मन के भाव उमड़ कर कविता में ढल गए थे। एक बार पहले भी पोस्ट कर चुकी हूँ। आज दुबारा घर से दूर गए बच्चों के लिए माँ की भावनायों का तोहफा। मदर-डे साल में चाहे एक बार आता है पर एक माँ के लिए तो साल भर चौदह नवम्बर रहता है।—-
एक स्वपन आँख में आया था
मैने कोख में उसे छुपाया था
पर कुछ दिन भी न छिप पाया
झट गोद में आकर मुस्काया
हंसी खेल में गोद से भी खिसका
मेरा आँचल थाम ज़रा ठिठका
फिर आँचल तक सिर से फिसला
जब घर से बाहर वो निकला
थी चाह कि वो उड़ना सीखे
जब उड़ा तो क्यों नैना भीगे
उसके जाने पर घर मेरा
क्यों लगता भुतहा सा डेरा
घर में बिखरी उसकी चीज़ें
पैन्ट पुराने कसी कमीज़े
टूटे खिलौने बदरंग ताश
बने धरोहर मेरे पास
मुस्काती उसकी तस्वीरें
जब तब मुझे रूलाती है
उसकी यादें आँसू बन कर
मेरे आँचल में छुप जाती है
फोन की घन्टी बन किलकारी
मन में हूक उठाती है
पल दो पल उससे बातें कर
ममता राहत पाती है
केक चाकलेट देख कर पर
पानी आँखों में आता है
जाने क्योंकर मन भाता
पकवान न अब पक पाता है
भरा भगौना दूध का दिन भर
ज्यों का त्यों रह जाता है
दिनचर्या का खालीपन
हर पल मुझे सताता है
कब आएगा मुन्ना मेरा ?
कब चहकेगा आँगन ?
कब नज़रो की चमक बढ़ेगी ?
दूर होगा धुँधलापन ????









11 responses so far ↓
Ashish // September 8, 2006 at 9:10 pm
बहुत ही अच्छी कविता लिखी। मैं भी बाहर हूँ कई सालों से और जब भी अपनी माँ से बात करता है वो भी ऐसा ही कहती है। लगता है सारी माँऐं एक सी ही होती है। किस समय होता है माँ को बेटे से ये अद्वितिय प्रेम? गर्भावस्था, जन्म या फिर पालन के दौरान? या फिर हमेशा से ही (संतानोत्पत्ति के पूर्व से ही)?
बचपन में मुझे ये लगता था कि जब मैं बड़ा हो जाऊँगा तो माँ-बेटे का प्यार कम हो जायेगा। मुझे लगता कि मेरी मासूमियत कम हो जायेगी तो क्यों माँ इतना चाहेगी और मुझे माँ की जरूरत नही होगी तो क्यों उनकी याद आयेगी। अब सोचकर भी शर्म आती है। प्यार के बीच में उम्र बिल्कुल ही नही आई हालांकि उस समय ये सोचना संभव नही लगता था।
अतुल // September 8, 2006 at 10:37 pm
कविता और आपकी भावना की तारीफ के लिये मेरे पास शब्द नही हैं।
समीर लाल // September 8, 2006 at 11:05 pm
पूरी अभिव्यक्ति ही बहुत सुंदर है.
SHUAIB // September 9, 2006 at 10:33 am
धन्यवाद रत्ना जी और आपकी कवीता दिल को छू गई - अगर कुछ दाल चावल पकाना आजाए तो सप्ताह मे एक दिन खूद से कुछ पकाना चाहता हूं
मेरे मेरे चंद मित्र अपने फ्लैट्स मे खुद पका कर खाते हैं, कुछ भी मज़ेदार पकाया हो तो मुझे ज़रूर बुलाते भी हैं मगर हर बार उनके हां खाने मे मुझे शर्म आती है ;(
अशीश जीः हां सभी माँऐं एक जैसी ही होती हैं
माँ और बेटे का प्यार बिलकुल सच्चा है, और जैसे जैसे बेटा जवान होता है माँ मन ही मन मे बहुत खुश होती है और उसका प्यार और ज़यादा हो जाता है।
SHUAIB // September 9, 2006 at 10:37 am
आपकी ताज़ा भांति भांति की दालें और आने वाले सभी पकवानों के लेख एक अलग text file मे svae करता रहूंगा
धन्यवाद
सागर चन्द नाहर // September 9, 2006 at 3:21 pm
रत्ना दी,
माँ से दूर होकर हम बच्चों की हालत कुछ ऐसी ही है, पर हम बच्चे उन भावों को शब्दों में बयाँ नही कर सकते।
संजय बेंगाणी // September 9, 2006 at 6:56 pm
दील को छू लेने वाली रचना हैं.
pratyaksha26 // September 11, 2006 at 9:11 am
बिलकुल सही कहा रत्ना जी
Shilpa // September 12, 2006 at 12:40 am
रत्ना जी,
भाव-विह्वल करने वाली इस रचना के लिये आपको बधाई |इसकी प्रशन्सा करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं है| कहीं मैंने पढा था-” परदेस में मैं रोया भीगा माँ का प्यार , दु:ख ने दु:ख से बात की बिन चिट्ठी बिन तार |” आपकी रचना इसे पूर्णतया चरितार्थ करती है|
नीरज दीवान // September 13, 2006 at 11:43 pm
मुझे तो बस याद आती है वो रोटी-सब्ज़ी.. स्कूल के दिन.. बरसों से अकेले कट रहे हैं. भावपूर्ण कविता के लिए धन्यवाद
ratna // September 25, 2006 at 2:14 pm
मेरी भावनायों को समझने के लिए आप सबका धन्यवाद
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