रंग-रौगन के विज्ञापन वाली श्रीमति जी को जैसे घूमते-घूमाते “मेरे वाला पिंक “ अचानक मिल गया था, बिल्कुल उसी तरह कुछ रोज़ पहले पी.चार्ल्स अनायास मेरी नज़रों के दायरे में आ गए और जब उन्होंने बातचीत शुरू की तो मैं ज़बान तालू से चिपकाए, एक टक उन्हें देखती रह गई। मुझे मालूम है कि आप ने इस समय प्रिन्स चार्ल्स के विषय में सोचना शुरू कर दिया होगा। अजी साहब, पामिला की मुट्ठी में धंसे, दो जवान बेटों की ज़िम्मेवारी में फंसे, उड़ते बालों वाले, पिचके गालों वाले, बढ़ते सालों वाले उन हज़रात में ऐसा क्या है, जो मेरी ऐसी हालत हो जाए। हाँ, डायना से मिलने से पहले मेरे हत्थे चढ़े होते तो बात फ़रक होती। अपनी ठगी सी हालत के हालात बताने से पहले आइए आपको ‘ मेरे वाले चार्ल्स ‘ से मिलवा दूँ।
चार्ल्स हमारे एक मित्र के बेटे के संग Havard Uni में पढ़ता है। बेल्जियम निवासी है, दो पोस्ट-ग्रेजुएशन कर चुका है व तीसरी की तैयारी में लगा है। भारत की हर चीज़ से बेहद प्रभावित है और छुट्टी मिलते ही भारत-भ्रमण पर निकल पड़ता है। विद्यार्थी है इसलिए जेब की खनकार के अनुसार ही राग छेड़ता है। अर्थात सरकारी बसों का टूटी-फूटी सड़कों पर उछलना, रेलों का मन-मरज़ी से चलना, अच्छे बजट होटलों की तंगी, मच्छरों की सारंगी, गलियों में कूड़े का सड़ना, सड़कों पर जेब का कतरना,भिखारियों की रीं-रीं और बेलगाम ट्रैफिक की पीं-पीं–इन सबसे वो बखूबी वाकिफ़ है। पर्यटन प्रसार होने से ऐसे विदेशी प्राय: आजकल थोक के भाव दिखाई देते है, अत: जब उसनेे बेक्ड-वेजिटेबल की जगह बेंगन का भर्ता, ब्रेड को छोड़ पूरी और चाकलेट-पुडिंग की बजाए खीर के लिए लार टपकाई तो कुल मिलाकर पहली नज़र में वो मुझे एक साधारण सा विदेशी पर्यटक लगा जो हर नई चीज़ के प्रति बच्चे सी जिज्ञासा दिखाता है और हर नए अनुभव से रोमांचित हो जाता है। परन्तु घर की दिवार पर लटकी मघुबनी पेन्टिंग पर नज़र पड़ते ही वह मेहमाने-आम मेहमाने-खास मे प्रवर्तित हो गया। वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण,गीता, महाभारत, पाँच तत्व यानि कि हिन्दू धर्म से सम्बंधित हर विषय पर उसका ज्ञान अद्भुत था। हमारी धार्मिक पुस्तकों के लिए रुचि और हिन्दू धर्म के प्रति उसकी आस्था ने मुझे इतना प्रभावित नहीं किया जितना उसकी सटीक सोच और गहरी समझ ने किया। वो धारा प्रवाह बोल रहा था, मै उसका चेहरा देख रही थी और सोच रही थी कि जो उसने देखा वो हमारी आँखें क्यूँ नहीं देख पाईं, जो उसने समझा वह शाश्वत सत्य हम क्यों नहीं समझ पाए। उसके अनुसार— ” हिन्दू धर्म का खुलापन ही इसकी खासियत है। ढेरों विदेशी इसकी ओर केवल इस लिए आकर्षित होते है क्योंकि इसमें कट्टरता का आभाव है, इसे किसी के गले के नीचे ज़बरदस्ती नहीं उतारा जाता। तभी तो इतने आक्रमण होने पर भी यह आज तक जीवित है। “
काश! वन्देमातरम् न बोलने का आदेश देने वाले और ज़बरदस्ती बुलवाने की ज़िद करने वाले कट्टरपंथी चार्ल्स की बात को सुन पाते। काश! काश!!!









7 responses so far ↓
राम चन्द्र मिश्र // September 6, 2006 at 11:27 pm
बहुत अच्छा लिखा है,
प्रस्तावना..(आरम्भ)बहुत ही रोचक लगा, मुझे तो चार्ल्स डार्विन की याद आने लगी थी तब तक आपने..उसका नाम ले लिया..
राम चन्द्र मिश्र // September 6, 2006 at 11:28 pm
बहुत अच्छा लिखा है,
प्रस्तावना..(आरम्भ)बहुत ही रोचक लगा, मुझे तो चार्ल्स डार्विन की याद आने लगी थी तब तक आपने..उसका नाम ले लिया..
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पिछली टिप्पणी Akismet ने खा ली।
समीर लाल // September 7, 2006 at 7:32 am
वाकई बहुत सुंदर आलेख है एवं बहुत रोचक….लिखते रहें.
शुभकामनायें….
आशीष // September 7, 2006 at 8:44 am
लेख बहुत अच्छा लगा।
pratyaksha26 // September 7, 2006 at 9:14 am
बढिया !
SHUAIB // September 7, 2006 at 10:55 am
मुझे तो आज ही पता चला - बहुत खूब
idanamum // September 30, 2006 at 12:00 pm
काफी अच्छा, एटरीं तो जबरदस्त थी।
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