रत्ना की रसोई

Entries from September 2006

क्या आप ईश्वर/खुदा को मानते है?–

September 28, 2006 · 18 Comments

कई दिनों से घर में नन्ही- मुन्नी चुहियां आंखें मटकातीं, पूंछ सटकाती इधर से उधर इठलाती घूम रही थी। उन्हें देख हमारा दिल-फेंकू पालतु दुमकटा (cordless) चूहा भी दिवाना हो कर आशिक की तरह हरकतें करने लगा था। दो तीन बार उनसे लिपट कर मेज़ से फर्श पर जा गिरा। वो तो अच्छा हुया ज़मीन पर कालीन बिछा था वरना उसका बोलो रामहो जाता। मामला पेचीदा तब और हो गया जब नालायक जाने किस के चक्कर में काफी दिन तक गायब हो गया और जब हमने उसे मेज़ की दराज़ में फाइलों के नीचे एक मरियल सी चुहिया के संग रंगें हाथों पकड़ लिया तो शहज़ादे सलीम की तरह बगावत पर उतर आया। अब हम भी कोई शहंशाह अकबर से कम थोड़े ही हैं। तुरन्त अक्लमंदी से काम लिया। फुदकती बलायों को मोरटीन की चाकलेट चटा कर बेहोश किया। उन्हें जमीन में दफनाने का हुक्म सुनाया और अपने लाडले चूहे के सीने से आँसू टपकाता नाकारा दिल निकाल कर उसे कायदे का नया दिल (सेल/बैटरी) अता फरमाया।

इस सारे मामले को सुलझाने की हड़बड़ी में परन्तु एक गड़बडी हो गई। हम अमित जी के पोल “क्या आप ईश्वर/खुदा को मानते है” में वोट न डाल पाए। भगवान का ख़फा होना वाजिब था। ईश्वर की कृपा से हम इतने मज़े मार रिए है और जब उसके अस्तित्व पर बात आई तो हम उसके हक में एक अदद वोट तक न डाल सके। शर्म की बात थी पर सोचा वो अन्तर्यामी है, हमारी मजबूरी समझ जाएंगें और सज़ा रफा-दफा कर देंगे। किन्तु हमारा ख्याल गलत था। कलियुग का ज़माना है,भगवान भी अदले का बदला में विश्वास रखते है। नवरात्र के शुभ दिन शुरू होते ही उन्होंने हमें ढेरों अशुभ संकेत देकर अपनी नराज़गी का ऐलान कर दिया।

सुबह जैसे ही अपने हाथों को चूम कर पांव जंमीन पर रखे, पतिदेव की छींक ने स्वागत किया। हमने घूमकर सोते हुए चेहरे को घूरा और फिर सोचा अचेतन अवस्था में है, नहीं जानते ये क्या कर रहे है।

मुंह-हाथ धोकर अखबार लेने मेन गेट पर पंहुचे तो अखबार की बजाए इस्तरी लौटाने आए, शर्माइन के काने चपरासी को सामने पाया। सत्यानास! शनिवार का दिन और घर में लोहा लेकर चला आया।

बाहर बरामदे के एक कोने में इस्तरी पटकी और दरवाज़ा खटाक बंद कर लिया। पहले तो सोचा आज सुबह की सैर की छुट्टी करते है पर फिर मन को तरो ताज़ा करने के ख्याल से टहलने निकल ही लिए। राम राम करते कालोनी का गेट पार किया था कि मरी काली बिल्ली रस्ता काट गई। अब तो हमारे पसीने छूट गए और रही सही हिम्मत का टोकरा उठाए हम पलट कर, पतली गली पकड़े-पकड़े भगवान जी के हेड-क्वाटर यानि बड़े मन्दिर जा पहुँचे। मन्दिर की घन्टियां ज़ोर ज़ोर से कह रहीं थी

दु:ख में सुमिरन सब करें, सुख में करे न कोय

जो सुख में सुमिरन करे तो दुख काहे को होए।।

भगवान के दरबार में हाज़री लगाने आए लोगों की काफी भीड़ थी। लाइन में हम भी लग लिए। मालिक नराज़ थे सो हमारा नम्बर बहुत देर बाद आया। सिर झुकाए हम भगवन् के सामने जा खड़े हुए और अपनी करनी की मन ही मन माफी मांगी। कहीं से आवाज़ आई- “भय बिन होय न प्रीतहमने चोंक कर इधर-उधर देखा और सिर झुका कर हकलाते हुए बोले भगवन्, आपने हम नारियों को बनाया ही ऐसा है,बड़ी जल्दी भयभीत हो जाती है। आप ने धमकाया तो आपके द्वारे चले आए और परिचर्चा पर वोट डालने पहुँचे तो अमित जी के पांव पटकते, आग उगलते, लाल-गुलाल नन्हें डायनासोरस /ड्रेगन से डर कर उल्टे पैर लौट आए। वरना हम तो आपके पक्ष में पचास वोट डाल आते। पर साँच पर भी कभी आँच आती है। आपकी गद्दी तो अटल रही। कुल वोट पड़े सत्रह, : पक्ष में ,सात विपक्ष में और चार कभी-कभी में। यानि चार महानुभाव आपको मानते तो है ही। छ: और चार हुए दस, अर्थात आपकी महिमा सर्वोपरि रही, आपका बोल-बाला रहा। अभी महिला ब्लागर कुछ कम है, नहीं तो विपक्ष वालों की ज़मानत तक ज़ब्त हो जाती। भाई लोग चाहे हम नारियों को वहमी, अंधविश्वासी, धर्म-भीरू आदि उपाधियों से विभूषित करें , हमारी आप पर अटूट आस्था है। और फिर हमने आज तक अपने लिए कहाँ कुछ मांगा है। हमेशा पति ,पुत्र, भाई, पिता बस इन्ही जन की सुख-समृद्धि और लम्बी आयु के लिए प्रार्थना की है। यह तो आपकी कृपा है कि समृद्ध भाई लोग होते है और समृद्धि हम पर दिखती है,सुख के लिए मेहनत वे करते है सुख भोगते हम है, उन्हें पितृत्व मिलता है हमें गौरव, लब्बो-लुआब यह कि जान उनकी ,जहान हमारा। तिस पर भी नहीं समझते तो जाने दीजिए, आखिर जब लक्ष्मी के दिवाने, सरस्वती के चाहने वाले और शक्ति के उपासक है तो एक दिन आप को भी मान ही लेंगें। पिता और पुत्र के बीच छत्तीस का आँकड़ा तो चलता ही है। आप चिंता मत करें पिता और पुत्र के सम्पर्क-सूत्र हम सदैव थामे रखेंगे बस आप हमारे हिस्से की कमीशन का ध्यान रखते रहें। अब इज़ाज़त दें, प्रसाद को मिठाई मान कर खाने वाला आपका एक अंश मेरे घर पर भी सो रहा है। जाऊं और उसे जगा कर समृद्धि के मार्ग पर अग्रसर करूँ।

सिर उठा कर जो कर देखा तो भगवान मन्द मन्द मुस्कुरा रहे थे। हमने उनके गौरव गान का वायदा किया, प्रसाद लिया, चरणामृत पिया और मन ही मन प्रसन्न हो बेखौफ मुख्य सड़क के रास्ते से घर की ओर चल दिए।

Categories: बस यूँ ही

सागर और सरिता

September 23, 2006 · 5 Comments

 

जानें किस बात पर है सागर इतराता

अहंकार की गर्मी से हर पल उफनाता

सरिता जो उसमें समाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती ।

 

 

चाहत में उसकी वो बहती रही

जीवन के सुख दुख को सहती रही

पर्वत की पुत्री जब आकर मिली

अस्तित्व को उसके थी गरिमा मिली

अनुभवों की गाथा जो सुनाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती।

 

 

नाद नदी का बना उसकी गर्जन

मन की उमंग लाई लहरों में थिरकन

प्यार में उसके वो तिल तिल जली

बन कर धुंआ बादल में ढली

जो विरह में बदरी डबडबाई न होती

सागर में इतनी गहराई न होती ।।

 

 

Categories: कविता

बला की बाला

September 13, 2006 · 7 Comments

झीनी सी चूनर ओढ़े

लाज हया घर पर छोड़े

मुक्त हवा सी बल खाती

सुघड़ बनावट दिखलाती

यौवन मद के नशे में चूर

मुखड़े पर लिए अजब सा नूर

बला की बाला जो निकली

कईयों की नज़रे फिसली

वो खम्बें से जा टकराया

ये मानों है बुत की काया

एक ने उसका रूप आंका

दूजे ने भीतर तक झांका

इसने भरीं ठन्डी आहें

उसने फैला दीं बाहें

हर कोई चाहे उसको पाना

रस पीकर बस फिर उड़ जाना

रूप को अपने गोरी छुपा ले

गुणों की बोली पहले लगा ले

मिले अगर सच्चा खरीदार

दे उसको सारे अधिकार

मुश्किल में वो साथ चलेगा

उसके लिए न रूप ढलेगा

ऐसे नर का रख अरमान

जिससे मिले पूरा सम्मान।।

Categories: कविता

रोज़ी-रोटी का जुगाड़

September 8, 2006 · 12 Comments

एक दिन अपने मूषकराज पर सवारी करते हुए हम हिन्दी विकीपीडीया पर जा पहुंचे और पाया कि वहां की रसोई बिल्कुल सूनी है। पकवानों के नाम पर वहां खाना-खजाना से लाया गया केवल एक बटर चिकन रखा था। सोचा क्यों न अपनी रसोई के कुछ अन्य व्यंजन वहाँ रख दिए जाएं। रत्ना-रैस्पीज़ में व्यंजनों की विधीयां इसी ख्याल से मैंने लिखनी शुरू की है। पर फ़ीरनी परोसते ही जब शुहेब जी के मुँह से वाह की बजाए आह निकली तो मन भर आया। रोज़ी-रोटी के जुगाड़ मे अनेकों युवा पढ़ने या नौकरी करने घर से कोसों दूर चले जाते है और परदेस में दाल-रोटी तक को तरस जाते है। परिभ्रमण के दौरान केवल हफ्ता भर होटलों का खाना खाने के पश्चात् ही जब घर की दाल की याद सताने लगती है तो कई महिने और साल घर से दूर रहने वालों की क्या हालत होती है,इसकी कल्पना मात्र ही आँखे डबडबा देती है। मेरे दोनों बेटे बाहर पढ़ रहे है इसलिए शुहेब जी की व्यथा मैं अच्छी तरह समझ सकती हूँ। सोलह साल तक जो बेटे घर में पकी मुर्गी को दाल का दरज़ा दे नाक-भौं सिंकोड़ते थे, छुट्टी में घर लौटने पर जब मेरे सामने बैठ कर सुड़प-सुड़प के दाल पीते है तो दिल में एक चुभती सी टीस उठती है। हालांकि उनकी खिसियानी हंसीं परिस्थितीयों से सीखा हुया आटे दाल का भाव बयान करती है परन्तु उन की अनुपस्थिती में खाना मेरे हलक में अटकता है। रसोई में घुसने को मन नहीं करता, अवन में काकरोच बसेरा बना लेते है और मिक्सी की मोटर जाम हो जाती है। रत्ना रैस्पीज़ में शुहेब जी जैसे लोगों के लिए कई तरह की सुस्वादु दाल बनाने की सुगम और सरल विधियां लिख रही हूँ । उनके ज़रिए अगर एक प्रतिशत भी घर के खाने का स्वाद परदेस तक पहुँच पाया तो मेरी मेहनत सफल हो जाएगी। दूसरे बेटे के छात्रावास जाने पर मन के भाव उमड़ कर कविता में ढल गए थे। एक बार पहले भी पोस्ट कर चुकी हूँ। आज दुबारा घर से दूर गए बच्चों के लिए माँ की भावनायों का तोहफा। मदर-डे साल में चाहे एक बार आता है पर एक माँ के लिए तो साल भर चौदह नवम्बर रहता है।—-


एक स्वपन आँख में आया था
मैने कोख में उसे छुपाया था
पर कुछ दिन भी न छिप पाया
झट गोद में आकर मुस्काया
हंसी खेल में गोद से भी खिसका
मेरा आँचल थाम ज़रा ठिठका
फिर आँचल तक सिर से फिसला
जब घर से बाहर वो निकला

थी चाह कि वो उड़ना सीखे
जब उड़ा तो क्यों नैना भीगे
उसके जाने पर घर मेरा
क्यों लगता भुतहा सा डेरा
घर में बिखरी उसकी चीज़ें
पैन्ट पुराने कसी कमीज़े
टूटे खिलौने बदरंग ताश
बने धरोहर मेरे पास

मुस्काती उसकी तस्वीरें
जब तब मुझे रूलाती है
उसकी यादें आँसू बन कर
मेरे आँचल में छुप जाती है
फोन की घन्टी बन किलकारी
मन में हूक उठाती है
पल दो पल उससे बातें कर
ममता राहत पाती है

केक चाकलेट देख कर पर
पानी आँखों में आता है
जाने क्योंकर मन भाता
पकवान न अब पक पाता है
भरा भगौना दूध का दिन भर
ज्यों का त्यों रह जाता है
दिनचर्या का खालीपन
हर पल मुझे सताता है

कब आएगा मुन्ना मेरा ?
कब चहकेगा आँगन ?
कब नज़रो की चमक बढ़ेगी ?
दूर होगा धुँधलापन ????


Categories: बस यूँ ही

चार्ल्स से मुलाकात

September 6, 2006 · 7 Comments

 

रंग-रौगन के विज्ञापन वाली श्रीमति जी को जैसे घूमते-घूमाते “मेरे वाला पिंक “ अचानक मिल गया था, बिल्कुल उसी तरह कुछ रोज़ पहले पी.चार्ल्स अनायास मेरी नज़रों के दायरे में आ गए और जब उन्होंने बातचीत शुरू की तो मैं ज़बान तालू से चिपकाए, एक टक उन्हें देखती रह गई। मुझे मालूम है कि आप ने इस समय प्रिन्स चार्ल्स के विषय में सोचना शुरू कर दिया होगा। अजी साहब, पामिला की मुट्ठी में धंसे, दो जवान बेटों की ज़िम्मेवारी में फंसे, उड़ते बालों वाले, पिचके गालों वाले, बढ़ते सालों वाले उन हज़रात में ऐसा क्या है, जो मेरी ऐसी हालत हो जाए। हाँ, डायना से मिलने से पहले मेरे हत्थे चढ़े होते तो बात फ़रक होती। अपनी ठगी सी हालत के हालात बताने से पहले आइए आपको मेरे वाले चार्ल्स से मिलवा दूँ।

चार्ल्स हमारे एक मित्र के बेटे के संग Havard Uni में पढ़ता है। बेल्जियम निवासी है, दो पोस्ट-ग्रेजुएशन कर चुका है व तीसरी की तैयारी में लगा है। भारत की हर चीज़ से बेहद प्रभावित है और छुट्टी मिलते ही भारत-भ्रमण पर निकल पड़ता है। विद्यार्थी है इसलिए जेब की खनकार के अनुसार ही राग छेड़ता है। अर्थात सरकारी बसों का टूटी-फूटी सड़कों पर उछलना, रेलों का मन-मरज़ी से चलना, अच्छे बजट होटलों की तंगी, मच्छरों की सारंगी, गलियों में कूड़े का सड़ना, सड़कों पर जेब का कतरना,भिखारियों की रीं-रीं और बेलगाम ट्रैफिक की पीं-पींइन सबसे वो बखूबी वाकिफ़ है। पर्यटन प्रसार होने से ऐसे विदेशी प्राय: आजकल थोक के भाव दिखाई देते है, अत: जब उसनेे बेक्ड-वेजिटेबल की जगह बेंगन का भर्ता, ब्रेड को छोड़ पूरी और चाकलेट-पुडिंग की बजाए खीर के लिए लार टपकाई तो कुल मिलाकर पहली नज़र में वो मुझे एक साधारण सा विदेशी पर्यटक लगा जो हर नई चीज़ के प्रति बच्चे सी जिज्ञासा दिखाता है और हर नए अनुभव से रोमांचित हो जाता है। परन्तु घर की दिवार पर लटकी मघुबनी पेन्टिंग पर नज़र पड़ते ही वह मेहमाने-आम मेहमाने-खास मे प्रवर्तित हो गया। वेद, पुराण, उपनिषद्, रामायण,गीता, महाभारत, पाँच तत्व यानि कि हिन्दू धर्म से सम्बंधित हर विषय पर उसका ज्ञान अद्भुत था। हमारी धार्मिक पुस्तकों के लिए रुचि और हिन्दू धर्म के प्रति उसकी आस्था ने मुझे इतना प्रभावित नहीं किया जितना उसकी सटीक सोच और गहरी समझ ने किया। वो धारा प्रवाह बोल रहा था, मै उसका चेहरा देख रही थी और सोच रही थी कि जो उसने देखा वो हमारी आँखें क्यूँ नहीं देख पाईं, जो उसने समझा वह शाश्वत सत्य हम क्यों नहीं समझ पाए। उसके अनुसार— ” हिन्दू धर्म का खुलापन ही इसकी खासियत है। ढेरों विदेशी इसकी ओर केवल इस लिए आकर्षित होते है क्योंकि इसमें कट्टरता का आभाव है, इसे किसी के गले के नीचे ज़बरदस्ती नहीं उतारा जाता। तभी तो इतने आक्रमण होने पर भी यह आज तक जीवित है।
काश
! वन्देमातरम् न बोलने का आदेश देने वाले और ज़बरदस्ती बुलवाने की ज़िद करने वाले कट्टरपंथी चार्ल्स की बात को सुन पाते। काश! काश!!!

Categories: बस यूँ ही