रत्ना की रसोई

Entries from August 2006

आरक्षण- विरोधी आन्दोलन

August 28, 2006 · 3 Comments

आरक्षण का मुद्दा फिर से उछला, जन्ता का ठण्डा गुस्सा रह रह कर उबला। सड़कों पर प्रदर्शन हुए, चौराहों पर अनशन हुए। ऩेताओं के पुतले जलाए गए, सेना के दस्ते बुलाए गए और इससे पहले कि स्थिती बिगड़ती व जन्ता सारा दोष अर्जुन सिंह के मत्थे मढ़ती, हमने तुरन्त दिल्ली का टिकट कटवाया और जाकर आरक्षण विरोधी आंदोलन-कारियों को समझाया—-“ आप लोग अर्जुन सिंह की मजबूरी समझने की कोशिश करें। जब मनमोहन सिंह जी स्याह को सफेद बता कर, प्रत्येक की हाँ में हाँ मिला कर, सबका मन मोह, अपना नाम सार्थक करने में लगे है तो बेचारे अर्जुन सिंह को भी अपने नाम की लाज रखनी पड़ेगी। एक तो राजपूती खून ऊपर से नाम अर्जून। युद्ध की लालसा क्यों न करें और सामाजिक न्याय की लड़ाई कैसे न लड़ें। अनुभवी नेता है,जानते है जो कर रहे है, सर्वथा उचित है व उनकी करनी में देश का हित नीहित है। कैसे?? देखिए

  1. शक्तिहीन को सहायता और प्राथमिकता देना हमारा नैतिक कर्तव्य है और क्योंकि यह शक्तिहीनता जाति विशेष को हमारे पूर्वजों की देन है, अत: इसकी भरपाई हम पर कर्ज़ है और इसका भुगतान हमारा एक मात्र धर्म। हम तो यहां तक कहते है कि 20, 30, 40,40.9, 50-60 या 70% की किश्तों में देने से अच्छा है कि हम एक साथ सीधा 100% आरक्षण दे डालें। आखिर इस देनदारी से हमारी सन्तानें ही तो कर्ज़- मुक्त हो रही है फिर यह रोना-धोना कैसा। आने वाली पीढ़ियों की खुशी के लिए इतना तो हम हंसते हंसते कर ही सकते है।
  2. सामाजिक दृष्टि से भी आरक्षण लाभदायक है। केवल कुछ प्रतिशत आरक्षण होने पर जब अनेक जन झूठे सर्टीफिकेट बनवा किसी जाति विशेष में शामिल होने को लालायित रहते है तो सोचिए आरक्षण बढ़ने पर क्या होगा। सभी युवतियां अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए विशेष जाति के युवकों से विवाह करना चाहेंगी और क्योंकि अब माता की जाति के आधार पर बच्चों को जाति-लाभ मिलने पर भी विचार हो रहा है इसलिए हमारे युवक भी युवतियों का अनुसरण करेंगे। अर्थात जाति-भेदभाव और उनका आपसी तेवर ताव सब खत्म। चारों ओर पूर्ण शांति, सुचारू व्यवस्था और खुशहाल जनता।
  3. यदि उपरोक्त लाभों को अनदेखा कर आप लोग अपनी ज़िद पर अड़े रहते है और आरक्षण विरोधी आन्दोलन जारी ऱखेंगे तो भी देश का हित ही होगा। आन्दोलन में कुछ आत्म-दाह करेगे, कुछ पुलिस की गोली से मरेगें। मरने वाले सभी प्रजनन शक्ति में सक्षम युवा वर्ग के है, सो देश की बड़ती आबादी के ग्राफ पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। बड़ती आबादी देश की उन्नति में मुख्य बाधक है अत: ग्राफ के नीचे आते ही प्रगति अवश्य होगी, देश सम्पन्न होगा और इसका सीधा फायदा तो जनता को मिलेगा। जनता आपका बलिदान साल में एक बार अवश्य याद कर लेगी।
  4. तिस पर भी आप लोग सन्तुष्ट नहीं तो हमें मजबूरन कहना पड़ेगा कि आपकी सोच बड़ी नकारत्मक है। यह क्या बात हुई कि ज़रा किसी अन्य को कुछ देने दिलाने की बात हुई नहीं कि हो-हल्ला मचा दिया। अरे सकारत्मक दिशा में कदम तो यह है कि हम आरक्षण-विरोधी आन्दोलन छोड़ जाति चयन स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन करें। जब हमें अपना कर्म चुनने का अधिकार है, धर्म चुनने का अधिकार है तो जाति चुनने का अधिकार क्यों नहीं?? जब कुछ भी कहने को स्वतन्त्र है, कहीं भी रहने को स्वतन्त्र है तो जाति चुनने को स्वतन्त्र क्यों नहीं??? जब माँ-बाप प्रजनन का समय मरज़ी से चुनते है,बच्चों के लिंग केलिए कई बार सिर धुनते है तो बच्चों को भी जाति चुनने का मौलिक अधिकार मिलना ही चाहिए। सच मानिए, यह अधिकार ही हर सुधार का आधार है। इसलिए हमारा सुझाव है आप लोग शांति से घर जाएं,अपने ब्लाग पर जाति-चयन स्वतन्त्रता का लोगो चिपकाएं और इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए एकजुट हो दोहराएं

संविधान में करो सुधार

जाति चयन का दो अधिकार

किसी की हम न बात सुनेंगे

जाति मन मरज़ी से चुनेंगे

हर व्यक्ति पाए सम्मान

जाति चयन जो हो आसान

घर घर कर दो यह प्रचार

जाति चयन का हो अधिकार

( आन्दोलन कर्ता काफी समझदार थे, बहुत होशियार थे, हमारी बात मान गए, उड़ती चिड़िया पहचान गए और अखबार वालों के सामने असली बात पर चुप्पी तान गए। अन्दर की खबर है कि आजकल जाति-चयन के नए मुद्दे को लेकर आन्दोलन की तैयारियां गुपचुप चलनी शुरू हो गई है। )

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दूसरी वर्षगांठ पर फुरसतिया जी को भेंट

August 23, 2006 · 5 Comments

पिछले दो वर्षों में कानपुर नगर में बिजली की व्यवस्था बहुत गड़बड़ा गई है। लोग मनों पसीना बहा रहे है, बारम्बार नहा रहे है, उनका गुस्सा बढ़ रहा है,चक्का जाम का ग्राफ चढ़ रहा है,लाइन मैन हैरान है, बिजली इंजिनियर परेशान है जब विद्युत का इतना भन्डार है तो आखिर इस कमी का क्या आधार है। इन्क्वारी-कमेटी बिठाई गई उसमें मुफ्त की दावतें उड़ाई गई, बातचीत चली दिन-रात पर सुधरे न हालात।

अधिकारियों का कहना था पावर हाउस से लगातार बिजली आती है पर लाइनों में जाते ही जाने कैसे गायब हो जाती है। कारण का नहीं भान, दुविधा भई महान्, सकते में पड़ी है जान। कृपया आप ही कुछ इंसाफ करें, ले देकर हम को माफ़ करें।

यह कारनामा किसी साधारण व्यक्ति का नहीं है, अवश्य ही कोई दूसरे ग्रह का प्राणी है, जो यह चमत्कार दिखा रहा है और व्यवस्था को धता बता रहा है– ” कमेटी ने यह रिपोर्ट दे दी काफी सस्ते में और मामला गया ठन्डे बस्ते में।

हमारे बिद्युत-अधिकारी मित्र ने जब एक अंग्रेज़ी फिल्म से उड़ाया हुया यह UFO का नया फलसफा हम पर झाड़ा तो हमने हंसकर उन्हें लताड़ा– “ काहे इतनी ऊँची उड़ा रहे हो, बेकार हमें उल्लू बना रहे हो। ज़रूर भूमि-गत लाइन किसी औद्योगिक इलाके में बिछवा दी होगी और चुपचाप जेबें भर, सारी बिजली वहाँ भिजवा दी होगी। दूसरे ग्रह वालों को कहाँ इतनी फुरसत कि वो कानपुर शहर की बिजली गायब करें।

मित्र इन्कार में ज़ोर ज़ोर से मुन्डी हिला रहे थे और फुरसत शब्द पर अटके हमारे भेजे में हज़ारों बल्ब जगमगा रहे थे। क्योंकि अब जाकर हम समझे थे कि —-

फुरसतिया जी के अधिकतर लेख 440 वोल्ट की क्षमता कहाँ से पाते है!!!!

Categories: बस यूँ ही

है सजा यह किस कसूर की

August 22, 2006 · 8 Comments

सन्तान प्राप्ति के बाद ही नारी सम्पूर्ण कहलाती है परन्तु स्वयं नारी को आत्म-सन्तुष्टि तभी मिलती है जब वो एक पुत्री की माँ बनती है। ठीक वैसे ही जैसे पुरुष पुत्र को पा गौरवशाली महसूस करता है नारी बेटी में अपना पूरा अस्तित्व देखती है। सुभद्रा कुमारी चौहान की भांति उसे लगता है मानो उसका बचपन लौट आया है। मैं इस सुख से वंचित हूँ। बरसों से सखियों की बेटियों को देख ललचाती रही हूँ और आस-पास की कन्यायों पर अपनी अजन्मी कन्या के हिस्से की ममता लुटाती रही हूँ। परन्तु फिर भी स्त्री-भ्रूणों की हत्या की खबर देख मेरे मुँह से निकल गया– “चलो यह बीस तो जीवन भर के कष्टों से बचीं।पति और दोनों बेटे मेरी ओर फटी आँखों से देखने लगे और एक सुर में बोल उठे– “ How can you say this? It is inhuman.” हाँ, ठीक ही है जब स्त्री होने पर भी स्त्री जाति के भाग्य-बदा कोई कष्ट मुझे कभी झेलना नहीं पड़ा तो फिर शिकायत कैसी। मायके में भाई से अधिक दुलार, ससुराल में ढेर सा प्यार,पति और सन्तान से उचित सम्मान,अपने दायरे में आदरणीए स्थान यानि हर तरह से एक भरा पूरा खुशहाल जीवन जी रही हूँ, तिस पर ऐसे अमानवीए विचार। छी! छी! ग्लानि होती है खुद पर। आखिर मन में छुपी कौन सी पीड़ा का ताप ऐसे शब्दों की भाप बना प्रियजनों को झुलसा गया। अकेले में आँखें बंद कर जब मैने आत्म-मंथन किया तो अचानक मेरी स्मृति पर कई चेहरे उभर आए। हमारे धोबी की सुमुखी कन्या जिसका हर मोड़ पर मैने मार्ग-दर्शन किया,जिसे नौकरी मिली तो मैने प्रसाद चढ़ाया और जो पहला वेतन मिलने पर मेरे लिए चांदी का सिंदूर-दान लाई थी आज स्वयं चुटकी भर सिन्दूर को तरस रही है। अपने समान पढ़े-लिखे वर की लालसा में उसकी उमर बड़ रही है, मुहल्ले के लफंगे जीना हराम किए है और आज उसके लिए सबसे बड़ा मुद्दा उसकी अपनी सुरक्षा है। कठिनाइयों से लड़ते इतना थक गई है कि अब उसे अपने से २० बरस बड़े, दो बच्चों के पिता में ही अपने सपनों का राजकुमार नज़र आ रहा है। घर के पिछवाड़े रहते चपरासी की तीनों बेटियां उसके घर लौटते ही किताबें ले मेरे आंगन मे दुबक जाती है क्योंकि रोज़ वो अपने पिता को माँ को कोसते और बेटे के लिए ज़बरदस्ती करते देख नहीं पाती। माली की इंटर पास बेटी को उसका चौथी फेल पति, पढ़ी-लिखी होने का इनाम, बीढ़ी से दाग कर देता है। आंसू बहाती वो अपनी चचेरी अनपढ़ बहन जो बरतन झाड़ू-पोछां कर पैसा कमाती है और जो रोज़ पति से पिटती है,की किस्मत से रश्क करती है। माँजी, हम तो इधर के रहे न उधर केउसका यह जुमला मुझे अपराध भाव से ग्रस्त कर जाता है। क्या उन्हें पढ़ कर अपने पांव पर खड़े होने के लिए प्रेरित करना मेरी गल्ती थी?

जब हमारा समाज ही समझने को तैयार नहीं तो इनकी समझ-बूझ का क्या फायदा। यह हालात केवल किसी एक वर्ग विशेष के नहीं है बल्कि जिधर देखो नारी का किसी न किसी रूप में शोषण होता दिखाई दे जाता है। हमारे मुंशी जी चाहे दो बेटियों का दहेज़ जुटाने केलिए चप्पलें घिस रहे है पर बेटे के विवाह में मिली मोटर साइकिल बड़े गर्व से दिखाते है। यह देख लड़कियां आत्म-हत्या न करें तो क्या करें। सम्पन्न मित्र की लेडी-डाक्टर तलाकशुदा बेटी अपनी तीन बेटियों के साथ पिता के पास केवल इस लिए रह रही है क्योंकि उसने तीसरी बेटी के समय गर्भपात करवाने से मना कर दिया था। मेरी आँखों में आंसू अजन्मी कन्यायों के लिए नहीं बल्कि उनकी बेबस मातायों के लिए है जो जाने कितनी बार इस शारीरिक और मानसिक यातना से गुज़रती है। शायद सिर्फ इसलिए क्योंकि वे जानती है कि जिन्हें जन्म से पहले कोई मान नही मिल रहा उन्हे जन्म दे, इस नरक में जलते देखने का कष्ट तो न भोगना पड़े। उन अजन्मी कन्यायों को तो केवल एक बार मौत मिलती है,यहाँ रोज़ जाने कितनी लड़कियां दिन में हजारों मौत मरती है। हे ईश्वर! किस कसूर की सज़ा है यह

ईव ने एडम को था जन्नत से निकलवाया

कलंक उस कसूर का मिट आज तलक न पाया

हर जन्म हर युग में सज़ा स्त्री ने इसकी पाई

वफा करके भी हिस्से में उसके आई बेवफाई

पत्नी धर्म सीता ने अन्तिम सांस तक निभाया

परन्तु अकारण राम ने उसे वन में था पठाया

द्रोपदी के वीर पति थे उसके सिर का ताज

पर भरी सभा में उसकी लगी दांव पर लाज

कलियुग में लगाई जाती सरे-राह उसकी बोली

कोई खींचता है आँचल कोई तार करे चोली

जिस जननी ने जन्म दे इस दुनिया को बसाया

अनेकों बार कोख में गया उसको ही मिटाया

बेटी का जन्म आज भी नज़रों को है झुकाता

है बाँधती वो घर को पर पराई कहा जाता

जीवन के हर क्षेत्र में सदा आगे है खड़ी

पर दहेज की वेदी पर अक्सर बलि है चढ़ी

फर्ज़ और प्रेम के पाटों में रहे पिसती

सौगात तो अनमोल है पर कौड़ियों में बिकती

हे नाथ! नारी जाति को अब तो क्षमा का दान दो

अन्य प्राणी जगत् की तरह जीने का हक समान दो

Categories: बस यूँ ही

प्रकृति से खिलवाड़

August 20, 2006 · 4 Comments

 

बरसे बादल बरसात में

कुछ ऐसे आक्रोश से

जन जीवन जल भग्न हुया

प्रकृति के प्रकोप से

नाले नदी समान भए

सरिता मानो सागर

सुरसा भांति बड़ती जाए

जल राशि लहराकर

पानी का उन्माद है भूला

हर सीमा हर बन्धन

चारों ओर सुनाई देता

दीन दुखी का क्रन्दन

जल के उदर में उतर गए

गांव गली गलियारे

इन्द्र देव की भेंट चढ़े

कई मासूम बेचारे

इसने खोया अपना बन्धू

उसने कोई जनावर

लहरें पल में लील गई

लाखों पिचकी गागर

सरपट बड़ते रेलों ने

रौंदी खेत की फसलें

बेघर भीड़ में बेबस घूमें

भूखी प्यासी शक्लें

आँखों से टपके लाचारी

तन मन है थके हारे

काली किस्मत दगा दे गई

या हैं बुरे सितारे

दूर गगन में प्रकट हुया

किसी नेता का यान

भोली जनता ने पुन: पाया

वादों का वरदान

मिल जाएगी रोज़ी रोटी

पड़ जाएगा छप्पर

आँख खुली तो फिर देखेंगे

बाड़ का रूप भयंकर

मूर्ख मानव जो न करता

प्रकृति से खिलवाड़

बरसों बरस न पड़ता सूखा

न आती कभी बाढ़।।

—-रत्ना

Categories: कविता

आधुनिक श्याम और कलियुगी गीता-2

August 18, 2006 · 4 Comments

गोरखपुरिया ने आधा खाया अंगूर का गुच्छा पास रखी स्वर्ण तश्तरी में रखा और बड़े दु:ख से दोनों हाथों का दण्ड बना, उस पर ठुड्डी जमा, एक ठन्डी आह भरता हुए कहने लगा– “ स्वामी, कलियुग में आपको अपना आदर्श तो सभी मानते है व आप जैसे आचरण की इच्छा भी रखते है किन्तु सबकी इच्छाएं पूरी कहाँ हो पाती है,कुछ विरले ही आपके सच्चे भक्त के रूप में सफलता की चरम सीमा पर पहुँचते है। मैने भी बड़ा प्रयत्न किया कि आपका पिताम्बर ओढ़ आपके पदचिन्हों पर चल निकलूं पर मेरी माँ आपकी मैया की तरह ममतामयी और विशाल-हृदयी नहीं थी। ज़रा मैंने आपके रूप का अनुसरण किया, किसी ने घर पर जा चुगली की और वो बस रूई सा धुन देती थी। Spare the ROD and Spoil the CHILD की मूर्खता भरी कहावत को मूल मन्त्र मान कर ऐसी करारी फटकार और सुधारी मार लगाती थी कि आज भी याद कर के रूह कांप जाती है। यह तो अच्छा हुय़ा कि अभी भी धरती पर अपने किए का फल भोग रही है वरना आपकी सेवा में मुझे फटकने तक न देती। उसी का करा धरा है कि मैं आपके सच्चे शिष्यों की भांति न तो सफलता की चरम सीमा पर पहुँच पाया और न ही अपने आने वाली कई पीढ़ियों का भविष्य सुनिश्चित कर पाया। मेरे बच्चों और बीवी के साथ अब जब वो दर दर की ठोकरें खाएगी तो उसे अपनी गल्ती का एहसास होगा। परन्तु अब पछताए होत क्या जब चिड़ियां चुग गई खेत।

प्रभु ने उस मनहूस मानव को ध्यान से देखा। कहीं वो धरती पर भोगी यातनायों के कारण, उनके चरित्र पर आरोप लगा कर, बदला तो नहीं ले रहा? व्यंग्य पर व्यंग्य कर, आत्म-तृप्ति के सु:ख से, आनन्दित तो नहीं हो रहा है? किन्तु श्याम-शंका निर्मूल थी। मानव-मुख-मण्डल पर भगवन्-भक्ति का तेज चमक रहा था और प्रभु के प्रति प्रीत की रीत न निभा पाने का पश्चाताप, हृदय की पवित्रता का साक्षी बन, नयनों से गंगा-जल के रूप में टपक रहा था। वो अपने गम में इस कदर खो गया था कि चारों ओर फैले वैभव के सामान,सुगन्धित पकवान,रसभरे फल, शीतल जल,सुर-संगीत, सुरा-मय स्वर्ण-सुराही सबको भूल अविरल धारा बहा रहा था। उसके मुँह से आवाज़ तक निकलनी बंद हो गई थी। उसकी मनोस्थिती को देख प्रभु ने घन्टी बजा अनुचर को बुलाया और उस भोले नर को चुटकी भर भांग चटा किसी श्यनकक्ष में आराम से सुला देने का आदेश दिया।

कुछ भांग का नशा और कुछ नरम बिस्तर का मज़ा गोरखपुरिया चैन से सो रहा था और तीन लोकों को कुल तीन पग में नापने वाले अवतारी भगवान बेचैन भए जाग रहे थे व अपने कक्ष को कदमों से नाप रहे थे। चरित्र का हनन उन्हें खल रहा था पर हृदय के एक कोने में आशा का नन्हा दीपक अभी जल रहा था। मन कह रहा था कि जीवन के प्रसंग तो किंवदन्तियों के ज़रिए पीढ़ी दर पीढ़ी चलते है अत: सुनी-सुनाई बातों पर आधारित होने के काऱण वे दूषित हो जाते है। पर उनके उपदेश तो तो लिखित रूप में धरती पर मौजूद है। उनसे कलियुगियों को सही प्रेरणा अवश्य मिल रही होगी। परन्तु फिर ग्रन्थ की रायल्टी क्यों कम आ रही है। पुस्तक तो कलियुग के हिसाब से ही रची गई थी। बिक्री दिन दिन कम क्यो हो रही है। कहीं किसी ने उसे भी दूषित तो नहीं कर दिया। इन्हीं प्रश्नों के उत्तर की खोज मे रात्रि बिता ,सुबह होते ही प्रभु ने समाधान हेतु, कुंजी-रूपी-कलियुगी को बुला भेजा और बिना किसी लाग लपेट के अपने ग्रन्थ के विषय पर प्रकाश डालने को कहा।

आसन ग्रहण कर गोरखपुरिया बोला– “ हे नाथ! मेरे दादा के समय में यह ग्रन्थ घर-घर में नियमित रूप से पढ़ा जाता था, पिता जी के समय में शंका होने पर लोग इसे खोल कर देख लेते थे पर मेरे काल में तो इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ती क्योंकि इसमें नीहित उपदेशों का निचोड़ लोगों को ज़बानी याद हो गया है।

आपने कहा था कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन अर्थात कर्म करने में तेरा अधिकार हो फल में कभी नहीं। इसी कारण आज का मानव केवल कार्य करता है फल के विषय में सोचता ही नहीं,भी तो चोरी-चकारी, धोखा-धड़ी, मार-कुटाई करते समय वो परेशान नहीं होता। सभी कार्य सम भाव से निपटाता है। वह जानता है कि शरीर नश्वर है पर आत्मा अमर है (न जायते म्रियते वा कदाचित नायं भूत्वा भविता वा ना भूय: )। यही नहीं नैनं छिदन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:। यानि इसे न तो शस्त्र काट सकते है,न आग जला सकती हैके सत्य को पूर्ण रूप से समझ, कत्लेआम कर, बम टपका, बारूद की आग में तपा कर आत्मा की शाश्वता सिद्ध ही नहीं करता अपितु अनेक आत्मायों को नए शरीर देने में आपका हाथ भी बंटाता है क्योकि आपने ही कहा है कि जैसे शरीर नए कपड़े बदलता है वैसे ही आत्मा नया शरीर बदलती है। अब आप ही बताएं आत्मा को नए शरीर दिलवाना पुण्य का काम है या नहीं। ऐसा नहीं है कि यदा-कदा मानव के मन में अपने कर्मों के प्रति संशय नहीं होता है परन्तु ऐसे कठिन समय में आपका यह कथन कि कर्ता केवल आप है शेष सब निमित्त-मात्र है, उसे नई प्रेरणा देता है।

भगवान बिना पलक झपकाए एकटक उस मूढ़-मति को ताक रहे थे। उनके चेहरे पर निराशा, पीड़ा और अचरज देख वो सकपका कर चुप हो गया था। अब और अधिक जानकारी पाने की इच्छा न होने के कारण नारायण ने उसे विदा किया और धरती पर फैले अज्ञान को मिटाने के लिए कल्कि के अवतार में जन्म लेने की योजना बनाने में जुट गए।

Categories: बस यूँ ही