आरक्षण का मुद्दा फिर से उछला, जन्ता का ठण्डा गुस्सा रह रह कर उबला। सड़कों पर प्रदर्शन हुए, चौराहों पर अनशन हुए। ऩेताओं के पुतले जलाए गए, सेना के दस्ते बुलाए गए और इससे पहले कि स्थिती बिगड़ती व जन्ता सारा दोष अर्जुन सिंह के मत्थे मढ़ती, हमने तुरन्त दिल्ली का टिकट कटवाया और जाकर आरक्षण विरोधी आंदोलन-कारियों को समझाया—-“ आप लोग अर्जुन सिंह की मजबूरी समझने की कोशिश करें। जब मनमोहन सिंह जी स्याह को सफेद बता कर, प्रत्येक की हाँ में हाँ मिला कर, सबका मन मोह, अपना नाम सार्थक करने में लगे है तो बेचारे अर्जुन सिंह को भी अपने नाम की लाज रखनी पड़ेगी। एक तो राजपूती खून ऊपर से नाम अर्जून। युद्ध की लालसा क्यों न करें और सामाजिक न्याय की लड़ाई कैसे न लड़ें। अनुभवी नेता है,जानते है जो कर रहे है, सर्वथा उचित है व उनकी करनी में देश का हित नीहित है। कैसे?? देखिए–
- शक्तिहीन को सहायता और प्राथमिकता देना हमारा नैतिक कर्तव्य है और क्योंकि यह शक्तिहीनता जाति विशेष को हमारे पूर्वजों की देन है, अत: इसकी भरपाई हम पर कर्ज़ है और इसका भुगतान हमारा एक मात्र धर्म। हम तो यहां तक कहते है कि 20, 30, 40,40.9, 50-60 या 70% की किश्तों में देने से अच्छा है कि हम एक साथ सीधा 100% आरक्षण दे डालें। आखिर इस देनदारी से हमारी सन्तानें ही तो कर्ज़- मुक्त हो रही है फिर यह रोना-धोना कैसा। आने वाली पीढ़ियों की खुशी के लिए इतना तो हम हंसते हंसते कर ही सकते है।
- सामाजिक दृष्टि से भी आरक्षण लाभदायक है। केवल कुछ प्रतिशत आरक्षण होने पर जब अनेक जन झूठे सर्टीफिकेट बनवा किसी जाति विशेष में शामिल होने को लालायित रहते है तो सोचिए आरक्षण बढ़ने पर क्या होगा। सभी युवतियां अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने के लिए विशेष जाति के युवकों से विवाह करना चाहेंगी और क्योंकि अब माता की जाति के आधार पर बच्चों को जाति-लाभ मिलने पर भी विचार हो रहा है इसलिए हमारे युवक भी युवतियों का अनुसरण करेंगे। अर्थात जाति-भेदभाव और उनका आपसी तेवर ताव सब खत्म। चारों ओर पूर्ण शांति, सुचारू व्यवस्था और खुशहाल जनता।
- यदि उपरोक्त लाभों को अनदेखा कर आप लोग अपनी ज़िद पर अड़े रहते है और आरक्षण विरोधी आन्दोलन जारी ऱखेंगे तो भी देश का हित ही होगा। आन्दोलन में कुछ आत्म-दाह करेगे, कुछ पुलिस की गोली से मरेगें। मरने वाले सभी प्रजनन शक्ति में सक्षम युवा वर्ग के है, सो देश की बड़ती आबादी के ग्राफ पर दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। बड़ती आबादी देश की उन्नति में मुख्य बाधक है अत: ग्राफ के नीचे आते ही प्रगति अवश्य होगी, देश सम्पन्न होगा और इसका सीधा फायदा तो जनता को मिलेगा। जनता आपका बलिदान साल में एक बार अवश्य याद कर लेगी।
- तिस पर भी आप लोग सन्तुष्ट नहीं तो हमें मजबूरन कहना पड़ेगा कि आपकी सोच बड़ी नकारत्मक है। यह क्या बात हुई कि ज़रा किसी अन्य को कुछ देने दिलाने की बात हुई नहीं कि हो-हल्ला मचा दिया। अरे सकारत्मक दिशा में कदम तो यह है कि हम आरक्षण-विरोधी आन्दोलन छोड़ जाति चयन स्वतन्त्रता के लिए आन्दोलन करें। जब हमें अपना कर्म चुनने का अधिकार है, धर्म चुनने का अधिकार है तो जाति चुनने का अधिकार क्यों नहीं?? जब कुछ भी कहने को स्वतन्त्र है, कहीं भी रहने को स्वतन्त्र है तो जाति चुनने को स्वतन्त्र क्यों नहीं??? जब माँ-बाप प्रजनन का समय मरज़ी से चुनते है,बच्चों के लिंग केलिए कई बार सिर धुनते है तो बच्चों को भी जाति चुनने का मौलिक अधिकार मिलना ही चाहिए। सच मानिए, यह अधिकार ही हर सुधार का आधार है। इसलिए हमारा सुझाव है आप लोग शांति से घर जाएं,अपने ब्लाग पर जाति-चयन स्वतन्त्रता का लोगो चिपकाएं और इस आन्दोलन को सफल बनाने के लिए एकजुट हो दोहराएं—
संविधान में करो सुधार
जाति चयन का दो अधिकार
किसी की हम न बात सुनेंगे
जाति मन मरज़ी से चुनेंगे
हर व्यक्ति पाए सम्मान
जाति चयन जो हो आसान
घर घर कर दो यह प्रचार
जाति चयन का हो अधिकार
( आन्दोलन कर्ता काफी समझदार थे, बहुत होशियार थे, हमारी बात मान गए, उड़ती चिड़िया पहचान गए और अखबार वालों के सामने असली बात पर चुप्पी तान गए। अन्दर की खबर है कि आजकल जाति-चयन के नए मुद्दे को लेकर आन्दोलन की तैयारियां गुपचुप चलनी शुरू हो गई है। )








