रत्ना की रसोई

Entries from July 2006

सावन की सौगात

July 21, 2006 · 2 Comments

चन्दा के उजले चेहरे पर
घोर घटा घिर आई
गोरी के गोरे गालों पर
काली लट लहराई
लम्पट लट की इस हरकत से
गोरी तनिक तमक गई
मेघों के छूने से नभ में
चंचल चपला चमक गई
बांवरी बदरी लगी डोलने
सखी वात के साथ
अमृत अपने अंग छुपाए
पहुँची गिरीवर के पास
मधुर मिलन का संदेशा
वर्षा धरती पर लाई
घबराती शरमाती गोरी
पिया के अंक समाई
पावन प्रेम की पावस पाकर
हरित हुई हर क्यारी
गोरी के भी आँगन की
महक उठी फुलवारी
सुदूर सृष्टि में सृजित हुया
स्नेह संगम संगीत
अवनि पर अंकुरित हुई
नई संतति की रीत ।।

Categories: कविता

गुड़िया बनाम बिटिया

July 20, 2006 · 1 Comment

बरसों पहले मेरी सखी जब
अपनी गुड़िया लाई थी
माँ का आँचल थाम कर
मैं भी ठुनकी और अकुलाई थी
प्यार-दुलार से माँ ने मुझको
गोद में तुरन्त उठाया था
मेरी पसंद की गुड़िया खातिर
सारा बाज़ार घुमाया था
नीली आँखें मटकाने वाली
गुड़िया मुझको भाई थी
उस नन्ही मूरत को पा
मेरी ममता मुस्काई थी
झूठमूठ के चूल्हे पर
दूध उसका गरमाती थी
खुद खाना खाने से पहले
निवाला उसे खिलाती थी
उसकी किलकारी से जगती
उस संग ही थी मैं सोई
ताप बुखार जब उसे हुया
टपका कर आँसू रोई
कंघी चोटी कभी मैं करती
कभी उसको थी नहलाती
सांझ ढली तो हाथ पकड़ कर
सैर कराने को जाती
थाम प्यार से गोद में उसको
हर इक से था मिलवाया
अपनी नन्ही बिटिया को
मैंने हर रिश्ता समझाया
उस गुड़िया में मानो मेरा
पूरा अस्तित्व समाया था
उसकी भोली भाली काया
मेरा ही तो साया था
मेरे संग-संग सीखा था
उसने भी लिखना पढ़ना
मेरे शैशव में शुरू किया
उसने यौवन पथ बढ़ना
भांति भांति के नए नए कपड़े
उसके लिए सिलाए थे
सूई तागे से मोती पिरो कर
सुन्दर गहने बनाए थे
देखभाल कर खोजबीन कर
उसका दुल्हा लाई थी
धूम-धाम से उस गुड़िया की
शादी मैंने रचाई थी
उसकी विदाई होती देख मैं
पर कुछ समझ न पाई थी
माँ का आँचल थाम कर
ज़ोर से रोई और चिल्लाई थी
बेटी पराया धन होती है
तब माँ ने समझाया था
उस दिन से मैंने बस केवल
गुड्डों को अपनाया था
बचपन की पर सखी आज फिर
अपनी बिटिया लाई है
उसकी गुड़िया देख कर मेरी
नज़रे फिर ललचाई है
दत्तक पुत्री की यादों ने
फिर ममत्व जगाया है
माँ के मन्दिर में,पति संग जा
मैंने दिया जलाया है ।।

Categories: कविता

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं—

July 20, 2006 · 4 Comments

सावन का पहला सोमवार था । हम सुबह-सुबह शंकर जी के ध्यान में व्यस्त थे,

आखिर उन्हीं की कृपा से हमारी रसोई ने हज़ार का स्कोर पूरा कर, दो सैन्चुरियां

और एक हाफ़ सैन्चुरी बना ली थी ।आगे भी दिन दूनी रात चौगनी प्रगति की कामना

से भगवन् को उनकी पसंद का प्रसाद पहुंचाने और मक्खन लगाने में जुटे थे कि कोई

नासपीटा,बुरी नज़र वाला,अक्ल का दुश्मन जलकुकड़ा हमारी रसोई पर, बिना कोई

नोटिस दिए ,एक बड़ा सा ताला डाल गया । मन में तो आया कि करमजले को बेलन

से बेल कर तन्दूर में उतार दें पर बेलन व तन्दूर रसोई में सील-बंद और दुखदाई,मासूमों

की बलि चढ़ा, आतंक फैलाकर एक आतंकवादी की तरह फुर्र । इसलिए उस दिन की

सारी तपस्या पर ध्यान केन्द्रित कर श्राप दे डाला ” जा दुष्ट, तेरी अक्ल का ताला तेरे

भाग्य पर जा लगे ताकि तुझे दूसरो के कष्ट का अन्दाज़ा हो । पद का मद तुझे ले डूबे ।”

उसे श्राप देकर,ठण्डा पानी पीकर जब कुछ शान्त हुए तो सोचा” उसका जो होगा, सो होगा

पर तेरा क्या होगा रत्ना । तेरी तो रसोीई बंद, अब पिछवाड़े केे चोर-दरवाज़े से एन्टरी कर

भी ले पर बिजनैस तौ गिऔ । ऊपर से यह डर कि पता नहीं कब सूंघता हुया आ धमके और

घर से उद्योग चलाने के लिए चलान कर दे। बेहतर यही है कि जमीन खरीद एक रेस्ट्रोरेन्ट

खोल दें पर जेब (अक्ल) टटोली तो पाया कि इतनी रेज़गारी (जानकारी) नही है सो फ्री की

ज़मीन देख चुपचाप अपना ढाबा य़हाँ खोल लिया । पता है खोजता हुया यहाँ भी आ मरेगा

पर तब तक इतना कमा लेगें ताकि अपना होटल खोल सकें ।

तो आप आएं, दोस्तों को लाएं और नानवेज में मटनपुलाव, चिकन बिरयानी,रौग़नजोश,

शामी कबाब,फिश-फिंगर्रज वगैहरा व वेज में काश्मीरी दमआलू खोया मटर,शाही पनीर,

मलाई कोफ्ता आदि का लुत्फ उठाएं । अचार, चटनी,पापड़ और बढ़िया बनारसी पान फ्री में ।

विशेष—– पहले सौ कदरदानों को उपहार में एक आशीर्वाद

नोट——- अच्छा टिप देनें वालों केलिए भविष्य में लकी ड्रा से इनाम देने की योजना ।

आज देवें उधार कल करेंगें व्यपार

Categories: बस यूँ ही

सावन

July 19, 2006 · 2 Comments

बंजारे बदरा जब नभ पर

अपना डेरा जमाते है

वर्षा के कण अंगुली बन कर

वसुधा की ढफली बजाते है

प्रकृति की हर शैय को छूकर

ध्वनि तरंग जगाती है

कभी गूंजकर कभी कूककर

पवन संगीत सुनाती है

ओढ़ ओढ़नी अपने पंखों की

केकी तनिक लजाता है

मस्त मगन होकर फिर वो भी

मादक नृत्य दिखाता है

दर्शक पत्ते बैठ डाल पर

झूम झूम लहराते है

खड़- खड़ तड़-तड़ कुछ अन्तर पर

ताल सभी दे जाते है

सावन का सुन्दर संयोजन

जब कवि के नयन समाता है

कागज़ पर एक चित्र अद्वितिय

अनायास बन जाता है।।

 

Categories: कविता

ब्लागस्पाट पर बैन छीन ले गया चैन

July 19, 2006 · 2 Comments

सावन का पहला सोमवार था । हम सुबह-सुबह शंकर जी के ध्यान में व्यस्त थे,आखिर उन्हीं की कृपा से हमारी रसोई ने हज़ार का स्कोर पूरा कर, दो सैन्चुरियां बना तीसरी केलिए लार टपकाई थी। आगे भी दिन दूनी रात चौगनी प्रगति की कामना से हम भगवन् को उनकी पसंद का प्रसाद पहुंचाने और मक्खन लगाने में जुटे थे कि कोई नासपीटा,बुरी नज़र वाला,अक्ल का दुश्मन जलकुकड़ा हमारी रसोई पर, बिना कोई नोटिस दिए ,एक बड़ा सा ताला डाल गया । मन में तो आया कि करमजले को बेलन से बेल कर तन्दूर में उतार दें पर बेलन व तन्दूर रसोई में सील-बंद और दुखदाई,मासूमों की बलि चढ़ा, आतंक फैलाकर एक आतंकवादी की तरह फुर्र । इसलिए उस दिन की सारी तपस्या पर ध्यान केन्द्रित कर श्राप दे डाला ” जा दुष्ट, तेरी अक्ल का ताला तेरे भाग्य पर जा लगे ताकि तुझे दूसरो के कष्ट का अन्दाज़ा हो । पद का मद तुझे ले डूबे ।”
उसे श्राप देकर,ठण्डा पानी पीकर जब कुछ शान्त हुए तो सोचा” उसका जो होगा, सो होगा पर तेरा क्या होगा रत्ना । तेरी तो रसोई बंद, अब पिछवाड़े के चोर-दरवाज़े से एन्टरी कर भी ले पर बिजनैस तौ गिऔ । ऊपर से यह डर कि पता नहीं कब सूंघता हुया आ धमके और घर से उद्योग चलाने के लिए चलान कर दे। बेहतर यही है कि जमीन खरीद एक रेस्ट्रोरेन्ट खोल दें पर जेब (अक्ल) टटोली तो पाया कि इतनी रेज़गारी (जानकारी) पास में नही है पर फिर भी कुल जमा-पूंजी जोड़ और कुछ इधर उधर से उधार लेकर अपना ढाबा वर्ड-प्रेस पर खोलने का मन बना लिया। एक बोर्ड “रत्ना का ढाबा” वहाँ लगा कर कुछ सामान भी रख आए पर ससुरा कोई दाँव- पेंच ऐसा फंसा कि ढाबा चल न पाया। सर्वज्ञ जी से कई बार सलाह-मशवरा किया पर मामला वहीं का वहीं । अब हार कर पिछवाड़े के दरवाज़े पर स्वागतम् लिख कुछ स्कीम चला रहें है।
सुस्वागतम्
(1)———–आप आएं, दोस्तों को लाएं और नानवेज में मटनपुलाव, चिकन बिरयानी रौग़नजोश,शामीकबाब,फिश-फिंगर्रज वगैहरा व वेज में काश्मीरी दमआलू खोया मटर,शाही पनीर,
मलाई कोफ्ता आदि का लुत्फ उठाएं । अचार चटनी पापड़ और एक बड़िया बनारसी पान फ्री में।
(2) विशेष—– पहले सौ कदरदानों को उपहार में एक आशीर्वाद
(3) नोट——- अच्छा टिप देनें वालों केलिए भविष्य में लकी ड्रा से इनाम देने की योजना पर विचार किया जा रहा है।
*************** आज हम देवें उधार कल करगें व्यापार****************
ध्यान दें— ढाबा चलवाने मे मदद की आवश्कता है

Categories: बस यूँ ही