सुबह होते ही fast-forward मोड में काम निपटाया और बार बार घड़ी की ओर ताकना शुरू किया कि कब ९.३० बजें और कब पतिदेव काम पर जाएं। पतिदेव ने हमारी बैचेनी को भाँपा, भटकती निगाहों को नापा और बड़े प्रेम से कहा- ” सोचता हूँ आज छुट्टी ले लूँ। ” हमारे चेहरे का उड़ा रंग और ज़ुबान पर ज़ंग देख मुस्काए और दानवीर कर्ण की तरह दो दिन हमें दान में दे डाले ताकि हम अपना झमेला सुलझा लें व वो अपनी पैन्डिंग फाइलें निपटा लें। हमने अपनी दादी को दुआएं दी जिसने ज़बरदस्ती हमसे सोमवार के व्रत रखवाए। आखिर इसकी एवज़ ही तो हम इतना बढ़िया पति फंसा पाए , फिर स्वयम् को धिक्कारा कि काहे बसा-बसाया घर छोड़ कर वर्डप्रेस की गलियों में धक्के खा रही हो। परन्तु तिस पर भी ‘ दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज़ है ‘ की तर्ज़ पर, पति देव के देहलीज से पाँव बाहर धरते ही, हम कम्प्युटर जी के पास जा बैठे।
प्राय: घर में कोई उपकरण काम नहीं करता तो दो धौल जमाने पर सकपका कर फट चालू हो जाता है।। वर्डप्रेस की गाड़ी चलाने के लिए ,कम्प्युटर की कोमल काया को ध्यान में रखते हुए, हम उसे तो दो हाथ नहीं दे सकते थे ।सो सोचा चलो अपने ढाबे पर ही चलते है और नींव से छत तक सब ठोंक कर देख लेते है शायद कोई लूज़ कनैक्शन खुद ही जुड़ जाए और हमारा काम बन जाए । अगले तीन घन्टे तक यही ठोका-पीटी चलती रही। इस बीच क्नैक्शन चालू हुया कि नहीं यह देखने के लिए हम ढाबे और नारद के बीच पैन्डूलम बने झूलते रहे। ‘ करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ‘ को चिरतार्थ करते हुए जो एक बार नारद स्टेशन पर पहुँचे तो पाया कनैक्शन फिट और हमारा स्टाल मय पकवान के प्लैटफार्म नम्बर एक पर मौजूद। खुद पर इतना गर्व हुया कि सोचा– अपना नाम ” रत्ना ” से बदल कर ” सर्वज्ञा ” कर लें। पर कहीं कोपी-राइट का लफड़ा न हो जाए इसलिए कन्ट्रोल कर लिया।
माल आने में दो दिन लग गए थे सो पकवान किस हाल में है यह जाँचने के लिए ज्यों ही हमने बरतन का ढक्कन खोला तो सीधा 440 wt झटका लगा। किसी 420ने हमारे पार्सल से माल-मत्ता उड़ाकर उसमें Error 404 की नेम प्लेट रख दी थी । ज्यादा दिन माल गोडाउन में पड़ा रहे तो किसी की नीयत डोल ही जाती है यह सोच पुरानी डिश पर ताज़ा लेबल चिपका हमने सामान दुबारा डिस्पैच कर दिया । बंद लिफाफे से मज़बून फिर गायब। हमने एक बार और हिम्मत दिखाई और फिर मुँह की खाई। इस हैटरिक पटखनी के बाद हमने समझ लिया कि चोर शातिर है अक्लमंदी इसी में है हम अपना रूट बदल लें । चुपचाप ब्लागस्पाट पर बैठ उसी रास्ते मदद की गुहार लगाते है शायद कोई भलामानस पीछे के दरवाज़े की तरफ से निकले औऱ हमारी पुकार सुन कर Error 404 के आरोपी को धर दबोचे।
शाम के पाँच बजे पतिदेव ताज़ी हवा के मस्त झोंके की तरह घर में घुसे तो घन्टियां टनटनाने लगी। जब तक हम कुछ समझते पतिदेव ने लपक कर फोन उठाया और एक पल बाद हमारे हाथ में थमा दिया। उधर से गुरूदेव ( अरे वही जिन्होंने हमें ब्लोगिंग के पूल में हाथ पैर मारने सिखाए थे) की अमृत वाणी झर रही थी– “ तुम्हारी RSS Feed काम नहीं कर रही है।ठीक कर लो ( कैसे ?? वो बताना भूल गए ,हम पूछना ) कमैन्ट कोई कर नही पाएगा और ई-मेल आईडी तुमने कहीं लिखी नहीं ।अब कोई मदद कैसे करे। हम भी बड़ी कठिनाई से तुम्हारी पोस्ट पढ़ पाए है।” हमने गुरूदेव की महाभारत के संजय के समकक्ष दिव्यदृष्टि को मन ही मन नमन किया और तुरन्त Error404 के काल सर्प का उपाय़ पूछा तो उन्होंने कहा कि अपनी पोस्ट स्लग के पाइप के कचरे को साफ कर उसमें अंग्रेज़ी टाइटल का निर्मल जल डालो, कष्ट दूर हो जाएगा। हमने तुरन्त गुरूमन्त्र का प्रयोग किया। Error404 गायब और पोस्ट दिखने लगी। पर वाक्य-सरंचना बेहद टूटी फूटी और गड्-मड् और साइड-बार गुल। गोया कि एक और दिन बरसते बरसात के पानी समान नाली में पर कोई बात नहीं अभी तो एक और दिन हमारे पास है। हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब,हम होंगे कामयाब एक दिन,हाँ हाँ मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन !!!!
ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक-भाग तीन
July 31, 2006 · 5 Comments
Categories: बस यूँ ही









5 responses so far ↓
सागर चन्द नाहर // July 31, 2006 at 9:50 pm
“हमने अपनी दादी को दुआएं दी जिसने ज़बरदस्ती हमसे सोमवार के व्रत रखवाए। आखिर इसकी एवज़ ही तो हम इतना बढ़िया पति फंसा पाए”
बहुत खूब रत्ना दी, आजकल सारी कवियत्रियाँ व्यंगकारों का धंधा चौपट करने में लगी हुई है।
eshadow // August 1, 2006 at 12:12 am
वाह वाह, बहुत मस्त है, सुबह सुबह पढकर हंसा और लगा कि दिन अच्छा जायेगा अब।
अनूप शुक्ला // August 1, 2006 at 12:51 am
पूरा लेख ही मजेदार है तब किस-किस की तारीफ करें? आगे का हाल जानने को बेकरार हैं हम।
pratyaksha // August 1, 2006 at 9:45 am
मज़ा आ रहा है, हम भी वर्डप्रेस का चम्मच चलाने वाले हैं अपनी खीर में . पर पहले आपकी फूँक लें ,चख लें फिर अपने पकाई का जुगाड शुरु करें
आशीष // August 1, 2006 at 10:18 am
“हमने अपनी दादी को दुआएं दी जिसने ज़बरदस्ती हमसे सोमवार के व्रत रखवाए। आखिर इसकी एवज़ ही तो हम इतना बढ़िया पति फंसा पाए”
लडको के लिये ऐसा कोई व्रत नही है क्या ?
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