रत्ना की रसोई

फिर आया सावन

July 23, 2006 · No Comments

फिर आया सावन फिर बरसा तेज़ पानी
नयनों में नमी दे गई फिर यादें कई पुरानी

वो पेड़ों पर पड़े झूले, वो बिछुड़े हुए साथी
झूलों की ऊँची पीगें, वो हँसी खनखनाती
वो लड़ना झगड़ना वो रूठना मनाना
वो पानी के जमाव को छपाक से उड़ाना
नानी की वो कहानी दादी के कथा किस्से
प्रसाद में बंटते हुए हलवे के कई हिस्से
वो मौज भरी मस्ती वो मीठी सी मनमानी
नयनों में नमी दे गई फिर यादें कई पुरानी

अँगीठी के अंगार पर वो भुनते हुए भुट्टे
वो चुरमुरा चबेना वो चूरन मीठे खट्टे
वो बहके से अंदाज़ में पानी में भीगना
वो सुड़सुड़ाती नाक वो सर्दी से छींकना
वो माँ के हाथ की बनी पीठी भरी कचौड़ी
अदरक की चाय साथ में गर्मा-गर्म पकौड़ी
महक उनके स्वाद की लाती है मुँह में पानी
नयनों में नमी दे गई फिर यादें कई पुरानी

बूंदों से बिखर गए है जो पलों के मोती
राखी की कच्ची डोर उन्हें फिर से है पिरोती
वो चिठ्ठी से बुलाना भैया का लेने आना
वो भाबी को छकाना वो खुल के खिलखिलना
जीवन की शरद् ऋतु में फिर आई है बहार
फिर हँसता हँसाता है मायके का वो दुलार
फिर महकती मिठाइयां फिर उड़ता पल्लू धानी
फिर इन्द्रधनुष दे गया सावन का झरता पानी

हर बरस आए सावन और जम के बरसे पानी
मन में उमंग भर दें फिर बातें नई पुरानी ।।

Categories: कविता

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