रत्ना की रसोई

Entries from July 2006

ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक-भाग तीन

July 31, 2006 · 5 Comments

सुबह होते ही fast-forward मोड में काम निपटाया और बार बार घड़ी की ओर ताकना शुरू किया कि कब ९.३० बजें और कब पतिदेव काम पर जाएं। पतिदेव ने हमारी बैचेनी को भाँपा, भटकती निगाहों को नापा और बड़े प्रेम से कहा- ” सोचता हूँ आज छुट्टी ले लूँ। ” हमारे चेहरे का उड़ा रंग और ज़ुबान पर ज़ंग देख मुस्काए और दानवीर कर्ण की तरह दो दिन हमें दान में दे डाले ताकि हम अपना झमेला सुलझा लें व वो अपनी पैन्डिंग फाइलें निपटा लें। हमने अपनी दादी को दुआएं दी जिसने ज़बरदस्ती हमसे सोमवार के व्रत रखवाए। आखिर इसकी एवज़ ही तो हम इतना बढ़िया पति फंसा पाए , फिर स्वयम् को धिक्कारा कि काहे बसा-बसाया घर छोड़ कर वर्डप्रेस की गलियों में धक्के खा रही हो। परन्तु तिस पर भी ‘ दिल लगा गधी से तो परी क्या चीज़ है ‘ की तर्ज़ पर, पति देव के देहलीज से पाँव बाहर धरते ही, हम कम्प्युटर जी के पास जा बैठे।
प्राय: घर में कोई उपकरण काम नहीं करता तो दो धौल जमाने पर सकपका कर फट चालू हो जाता है।। वर्डप्रेस की गाड़ी चलाने के लिए ,कम्प्युटर की कोमल काया को ध्यान में रखते हुए, हम उसे तो दो हाथ नहीं दे सकते थे ।सो सोचा चलो अपने ढाबे पर ही चलते है और नींव से छत तक सब ठोंक कर देख लेते है शायद कोई लूज़ कनैक्शन खुद ही जुड़ जाए और हमारा काम बन जाए । अगले तीन घन्टे तक यही ठोका-पीटी चलती रही। इस बीच क्नैक्शन चालू हुया कि नहीं यह देखने के लिए हम ढाबे और नारद के बीच पैन्डूलम बने झूलते रहे। ‘ करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ‘ को चिरतार्थ करते हुए जो एक बार नारद स्टेशन पर पहुँचे तो पाया कनैक्शन फिट और हमारा स्टाल मय पकवान के प्लैटफार्म नम्बर एक पर मौजूद। खुद पर इतना गर्व हुया कि सोचा– अपना नाम ” रत्ना ” से बदल कर ” सर्वज्ञा ” कर लें। पर कहीं कोपी-राइट का लफड़ा न हो जाए इसलिए कन्ट्रोल कर लिया।
माल आने में दो दिन लग गए थे सो पकवान किस हाल में है यह जाँचने के लिए ज्यों ही हमने बरतन का ढक्कन खोला तो सीधा 440 wt झटका लगा। किसी 420ने हमारे पार्सल से माल-मत्ता उड़ाकर उसमें Error 404 की नेम प्लेट रख दी थी । ज्यादा दिन माल गोडाउन में पड़ा रहे तो किसी की नीयत डोल ही जाती है यह सोच पुरानी डिश पर ताज़ा लेबल चिपका हमने सामान दुबारा डिस्पैच कर दिया । बंद लिफाफे से मज़बून फिर गायब। हमने एक बार और हिम्मत दिखाई और फिर मुँह की खाई। इस हैटरिक पटखनी के बाद हमने समझ लिया कि चोर शातिर है अक्लमंदी इसी में है हम अपना रूट बदल लें । चुपचाप ब्लागस्पाट पर बैठ उसी रास्ते मदद की गुहार लगाते है शायद कोई भलामानस पीछे के दरवाज़े की तरफ से निकले औऱ हमारी पुकार सुन कर Error 404 के आरोपी को धर दबोचे।
शाम के पाँच बजे पतिदेव ताज़ी हवा के मस्त झोंके की तरह घर में घुसे तो घन्टियां टनटनाने लगी। जब तक हम कुछ समझते पतिदेव ने लपक कर फोन उठाया और एक पल बाद हमारे हाथ में थमा दिया। उधर से गुरूदेव ( अरे वही जिन्होंने हमें ब्लोगिंग के पूल में हाथ पैर मारने सिखाए थे) की अमृत वाणी झर रही थी– “ तुम्हारी RSS Feed काम नहीं कर रही है।ठीक कर लो ( कैसे ?? वो बताना भूल गए ,हम पूछना ) कमैन्ट कोई कर नही पाएगा और ई-मेल आईडी तुमने कहीं लिखी नहीं ।अब कोई मदद कैसे करे। हम भी बड़ी कठिनाई से तुम्हारी पोस्ट पढ़ पाए है।” हमने गुरूदेव की महाभारत के संजय के समकक्ष दिव्यदृष्टि को मन ही मन नमन किया और तुरन्त Error404 के काल सर्प का उपाय़ पूछा तो उन्होंने कहा कि अपनी पोस्ट स्लग के पाइप के कचरे को साफ कर उसमें अंग्रेज़ी टाइटल का निर्मल जल डालो, कष्ट दूर हो जाएगा। हमने तुरन्त गुरूमन्त्र का प्रयोग किया। Error404 गायब और पोस्ट दिखने लगी। पर वाक्य-सरंचना बेहद टूटी फूटी और गड्-मड् और साइड-बार गुल। गोया कि एक और दिन बरसते बरसात के पानी समान नाली में पर कोई बात नहीं अभी तो एक और दिन हमारे पास है। हम होंगे कामयाब, हम होंगे कामयाब,हम होंगे कामयाब एक दिन,हाँ हाँ मन में है विश्वास, पूरा है विश्वास, हम होंगे कामयाब एक दिन !!!!

Categories: बस यूँ ही

सफ़र के साथियो को सलाम

July 29, 2006 · 8 Comments

आज शनिवार है और कल इतवार,अर्थात आज आधे दिन का आराम व कल पूर्ण विश्राम। सो सोचते है कि आगे का सफरनामा (ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक-भाग तीन ) तो हम सोमवार को सुनाएं, परन्तु अपने साथ सफ़र में सवार और हमारी पीड़ा में भागीदार श्रद्धालू-जन की शंकाओं का समाधान, टिप्पणियों की व्याख्या और प्रशंसा का अमृत पिलाने वालों का धन्यवाद आज ही करदें ताकि वे भी शांत एवं प्रसन्न मन से छुट्टी का आनन्द उठाएं और हम भी यह ढेड़ दिन पूर्ण रूप से अपने पतिदेव की सेवा में बिताएं, देव कृपा का थोड़ा मोल चुकाएं और अपना अगला जन्म सधाएं। वैसे हमारी हार्दिक इच्छा थी कि प्रत्येक साथी जन का जिक्र करते समय उसका नाम कुछ ऐसे लिखें कि करसर का स्पर्श पाते ही वह नाम प्रकाशमय हो जाए और बटन दबाते ही जिज्ञासु सीधा उस महान आत्मा के दर्शन का लाभ पा लें पर क्योंकि पिछले ढाई मास के कड़े परिश्रम के बाद भी हम यह कला नहीं सीख पाएं है सो अपने अल्प ज्ञान के लिए क्षमा प्रार्थी है।
सबसे पहले अनूप जी से शुरूवात करते है। भाई जी, गद्य की अपेक्षा हम पद्य गाना इस कारण पसन्द करते है क्योंकि पद्य लिखने केलिए कम टाइप करना पड़ता है। हमारे पास टाइप करने हेतु केवल तर्जनी ही है अत: उस पर काम का अधिक बोझ नहीं डालना नहीं चाहते।अगर रुष्ट होकर अकड़ गई तो हमारी सारी व्यवस्था ही डोल जाएगी। अन्य उगंलियों को नोटिस भेजा है जैसे ही काम पर आ जाएंगी आपका अनुकरण करते हुए गद्य में पद्य पिरो कर आपके समक्ष प्रस्तुत कर देगें। दूसरा– भेजा-बाज़ार में जब ताज़ी मौसमी तरकारी उपलब्ध नहीं होती तो हम डायरी के कोल्ड-स्टोरेज़ से कविता निकाल कर परोस देते है ताकि रसोई का चुल्हा बुझने न पाए। तीसरा- हम नारी स्वभाव से पीड़ित है। दिमाग से अधिक दिल को प्राथमिकता देते है और यह सत्य तो आप स्वीकारेंगे कि गद्य दिमाग की और पद्य दिल की उपज है। ज़रा सुनिए यह सप्तम स्वर कहाँ गूंज रहा है–

जब से हमने ब्लाग बनाया
और की शुभ शुरूवात
छाया जी आप संग चले हैं
दर पोस्ट हमारे साथ
आपको कैसे नमन करें हम
कैसे आभार जताएं
गुड़ खाकर हम भए है गूंगे
अब कैसे स्वाद बताएं ।।

नारद मुनि को हमारा सादर प्रणाम। जीतु भाई, आपने दर्शन बीस तारिख को दिए थे जबकि हमने कथा केवल उन्नीस तक की सुनाई है। अधिक अधीर न हों, बीस तारिख की गाथा (सोमवार को होने वाली ) में हम आपका उचित सत्कार करेंगे। दूसरा- सफरनामे का आरम्भ ब्लागस्पाट कस्बे से किया है पर अन्त वर्डप्रेस नगरी में होगा। तीसरा- नारद जैसे ज्ञानी अगर कन्फ्यूज़ हो सकते है तो हम जैसे तुच्छ जीवों की क्या बिसात। इस विचार ने घावों पर मरहम का काम किया है। चौथा- दोनों रसोइयों का विलय कर नया नाम ” रत्ना रेस्ट्रोरेन्ट ” करने का विचार है। ढाबे पर आकर बैठना लोगों को कम पसंद आ रहा है। अत: नामकरण संस्कार की क्या विधी है, कृपया मार्ग दर्शन करें।
मानोशी दीदी, प्रेमलता जीजी और प्रत्यक्षा जी आदर सहित स्नेह युक्त नमस्कार। सफर में महिला साथी न हो तो बातचीत का मज़ा ही नहीं आता। वे ही तो कभी मनोशी दीदी की तरह पीठ ठोंकती है,कभी लता जीजी समान मिश्री के शब्दों का शरबत पिलाती है और कभी प्रत्यक्षा जी की तरह आगे बात चलाने केलिए जिज्ञासा दिखाती है।साथ न छोड़िएगा आपके रहने से हमें काफी सहारा है।
आशीश भाई अब आप एक राज़ की बात गुपचुप कान करीब लाकर सुनिए। ऐवें शब्द हम पंजाबी इलाके से स्मगल करके लाए है। किसी से कहना मत। कभी कभार आप भी इस्तमाल कर लेना कोई घिस थोड़े ही जाएगा । इसी लेन देन पर तो दुनिया कायम है।
इस कान में फूंकें मंतर के संग ही आज की सभा समाप्त होती है।सोमवार को आपको बोर करने फिर हाज़िर होगें। तब तक हमारे लिए दुआ किजीए। मनीष भाीई आपकी दुआ के चलते ही वर्डप्रेस तक पहुंच पाएंगे ।दिल खोल कर दीजिए क्योंकि–

तुम एक दुआ दोगे हम दस लाख देगें

Categories: बस यूँ ही

ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक का सफ़र- भाग दो

July 28, 2006 · 3 Comments

द्वितीय चरण ——–

सुबह आँख खुलते ही बिना दाँत चमकाए, बिना चेहरा छपाकाए, बिना बेड-टी सुड़काए, बिना पतिदेव को प्रेम से जगाए और बिना महादेव को शीश नवाए, हम बिस्तर से सीधे अपने ढाबे पर गिफ्टस ( टिप्पणियों ) का जायज़ा लेने जा पहुँचे । वहाँ जो नज़ारा देखा तो नींद से बोझिल आँखों को दो चार बार मला कि कहीं खड़े खड़े सो गए हो तो इस बुरे सपने से जग जाएं, हाथ पर चिकोटी भी काटी ताकि प्रूफ मिल जाए कि जो दिखाई दे रहा है वो वास्तव में सच है और जब बारीक सा नील का निशान बेहद साफ दिखाई पड़ा तो दिमाग ने ओवर-टाइम कर झट यह नतीजा निकाला कि हम हिन्दी चिट्ठा जगत् से निष्कासित कर दिए गए है । तभी तो ग्रह-प्रवेश के दिन भी कोई पकवान खाने तो क्या पानी पीने तक नहीं आया । हैरान परेशान दिल परन्तु यह मानने को तैयार नहीं हुया । आखिर जब हमने किसी से पंगा नहीं लिया, जितनी गिफ्ट(टिप्पणियां) मिली उतनी कमोबेश तोल कर वापिस कर दी, अच्छे नागरिक की तरह नियम कानून का पालन किया, परिचर्चा कल्ब मे भी आते जाते रहे फिर क्यों कोई हमारा हुक्का पानी बंद कर देगा। ज़रूर भगवान जी नराज़ हो गए है तभी सत्यनारायण-व्रत कथा की वणिक कन्या के समान कुछ का कुछ दिखाई दे रहा है । नहा धो कर प्रसाद खा कर आएं तो सब ठीक हो जाएगा । भारी मन से अपना काम निपटाया , पतिदेव को नाश्ता करवाया, तदोपरांत महादेव को दूध से नहलाया और मन में नन्हीं सी आशा लिए अपने ढाबे पर आ गए । दृश्य अभी भी जस का तस था । दिमाग कुलबुलाया पर दिल ने दलील दी कि अभी अभी धमाका हुया है लोग इधर उधर अटके हुए है, आवा जाही रुकी हुई है सो हो सकता है कि कोई यहाँ तक नहीं पहँच पा रहा है तो चलो हालात का जायज़ा लेने अक्षरग्राम/नारद के स्टेशन पर चलते है । वहीं यह भी देख लेगें कि हमारे पकवान का स्टाल एक नम्बर प्लेटफार्म पर है या दो, तीन या चार पर पहुँच गया है।
नारद स्टेशन पर लोग परेशान थे, मदद की पुकार लग रही थी । फिर भी स्थिति नियन्त्रण में थी । हम पाँच नम्बर प्लेटफार्म तक घूम आए पर हमारा स्टाल कहीं दिखाई नहीं दिया तो माथा ठनका कि ज़रूर कोरियर सर्विस में गड़बड़ी हुई है जब Sample ही नहीं पहुँचा तो लोग माल को कैसे जांचेगें और कैसे आंकेगे । सो गड़बड़ी का पता लगाने के लिए हम सर्वज्ञ जी के पास जा पहुँचे। उनकी पहली गेंद ” mySQL में डाटाबेस क्रियेट कीजिए ” सिर के ऊपर से निकल गई और बाकी की सब गेंदे आजू-बाजू से और हमारा स्कोर आखरी गेंद तक ज़ीरो रहा । वर्डप्रेस की पारी खेलने केलिए उन्होंने जो जो कहा था वो हमने नहीं किया था। जब वर्डप्रेस स्थापित ही नहीं किया तो गाड़ी कैसे चलेगी ? यह सोच हम मेन पैविलियन में गए और MyComputer,Places,Desktop,यहाँ तक कि Trash भी खंगाल आए पर mySQL नहीं मिला। हार कर वर्डप्रेस की गलियों में उसे खोजने चले। वहाँ पर वर्डप्रेस सिखाने का एक स्कूल दिखा तो हम मेन गेट खोल अन्दर घुस लिए पर स्कूल इतना बड़ा था कि Getting Started With WordPress का दरवाज़ा खोल जो भीतर गए तो दरवाजा दर दरवाज़ा खुलता गया और हम चक्करघिन्नी बनें बाहर निकलने की तरकीब भूल गए। अन्तत: Log Out करके ही बाहर आना पड़ा । पर वहाँ घूमते-घुमाते एक दरवाज़े पर Audio-Video Lessons का बोर्ड दिखा था सो फिरentry ली और दर दर लुढ़कते -पुढ़कते उस दरवाजें में जा घुसे। वहाँ भी सर्वज्ञ जी वाला आलाप चल रहा था सो नाक तक पके हुए हम बाहर आ गए और ठुड्डी पर हाथ धरे, बुड्ढे तोते पढ़ नहीं सकते और भैंस को बीन के सुर नहीं पचते की सत्यता पर विचार कर ही रहे थे कि पतिदेव की कार का दरवाजा खुलने बंद होने की खटाक से हमारी तन्द्रा टूटी तो पाया कि पिछले आठ घन्टे से हम लगभग लगातार वर्डप्रेस की गलियों में खाक छान रहे थे । इससे पहले कि देवों की तरह पतिदेव भी क्रोधित हो जाएं और ब्लागस्पाट की तरह हमारी ब्लोगिंग पर भी प्रतिबन्ध लग जाए, हमने प्रिय कम्प्युटर जी से, पतिदेव के काम पर जाते ही ,कल फिर मिलने का वादा कर, भारी मन से विदा ली।

इति द्वितीय चरण समाप्त ।।

Categories: बस यूँ ही

ब्लागस्पाट से वर्डप्रेस तक का सफ़र - भाग एक

July 27, 2006 · 7 Comments

बहुत सालों से उपहार में मिली डायरियों का सद्-उपयोग ( ??? ) हम मन की भड़ास निकालने केलिए करते थे पर जब पतिदेव के एक मित्र ने, जो कम्प्यूटर के महारथी और कई ब्लागों के स्वामी है हमें ब्लागिंग का गुरूमन्त्र दिया तो मानो बन्दर के हाथ झुनझुना लग गया। हम भूख-प्यास भूल ब्लागस्पाट की ट्रैक पर सरपट दौड़ पड़े, कीर्तिमान बनाया, वज़न भी घटा लिया क्योंकि कुछ तो ऊपरी माला का फालतू समान घट रहा था और कुछ की-बोर्ड पर ओवर-टाइम करते हाथ हर समय मुँह में छुट-पुट डालने में असमर्थ थे। यानि हर काम सुचारू रूप से चल रहा था और हम आम के मौसम में गुठलियों के दाम भी वसूल रहे थे कि एक धमाका हुया — ब्लागस्पाट के इलाके में कर्फ़्यु लग गया और उस ओर जाने वाली सब गाड़ियां बंद । अक्षरग्राम/नारद के जंक्शन पर खड़े हम काफी देर वर्डप्रेस की ट्रैक पर दौड़ती गाड़ियों को टुकुर-टुकुर देखते रहे और फिर एक गाड़ी पकड़ उस पौश इलाके का जायज़ा लेने वर्डप्रेस के स्टेशन पर पहुँच गए । स्टेशन पर पैर धरते ही चट नाम पूछा गया और पट एक फ्लैट हमारे नाम कर दिया गया,वो भी फ्री में। हम खुश- वाह भई ! ऊँची दुकान, मालिक मेहरबान और फ्री का सामान। सच में उपभोक्ता का ज़माना है। काश हम उस समय अपने सितारे पढ़ पाते क्योंकि उस पल के साथ ही शुरू हुया हमारा एक गड्ढे से दूसरे गड्ढे में गिरने निकलने का कष्टमयी सफर ।

प्रथम चरण——

फ्लेट मिलते ही हमें पता चला कि अन्दर तभी जा पाएंगे जब मेल बाक्स से कुंजी(password ) लेकर आएगें । खुशी-खुशी भागते हुए कुंजी लेकर वापिस पहुंचे पर बार बार लगाने पर भी ताला बंद और दरबान का सपाट सा जवाब ” incorrect password ” । दो चार बार मेलबाक्स घूम आए पर मामला वही ढाक के तीन पात । बड़ी देर बाद समझ में आया जिसे हम ” ओ ” पढ़ रहे थे वो वास्तव में जीरो था। राम-राम करते प्रवेश किया और तुरन्त ताला बदला ,एक बार चेक किया और जब बिना अड़चन ताला खुला तो हमने घर का जोगराफिया समझना शुरू किया ।
यहाँ कैटेगरी की क्यारी थी जिसमें हम अलग-अलग सब्जियां बो सकते थे । उनका import और Export भी कर सकते थे ।ब्लागस्पाट पर केवल पोस्ट लिखते थे यहां पेज भी लिख सकते थे । दोनों में फर्क क्या है पल्ले नहीं पड़ा पर सोचा चलो धीरे धीरे पता चल ही जाएगा। State of artका इलाका था सो भाषा भी हाई-फाई थी। एडिट को मैनेज़,Comment करने को Discussion करना और ब्लाग को Site कहा जाता था खैर Accent बदलने मे कितना वक्त लगता है ,साल भर अमरीका में रहकर आई बलिया की बिल्लो जब अमरीकन स्टाइल में अंग्रेज़ी बोल सकती है तो हम Edit को Manage क्यों नहीं कह सकते । अँग्रेज़ी मे M.A कोई ऐवें ही थोड़े किया है । बढ़िया इलाके में सब सुविधायों से युक्त घर मिला है अभी कुछ बदलाव करने की ज़रूरत नहीं है बस जल्दी से कुछ मीठा पका कर नारद जी को न्योता दे आएं ,यह सोच हमने अपनी शान में कुछ कसीदे लिखे (हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं——) ,सावन की डिश पकाई और नारद जी को नए घर का पता दे आए । बड़ी देर तक जब नारद जी के दर्शन नहीं हुए तो यह लगा कि एक तो हिन्दी जगत् का बोझ ऊपर से अभी- अभी भारत यात्रा से लौटे है । आजकल ग्रह-प्रवेश के न्योते भी ज्यादा ही मिल रहे है कहीं बिज़ी होंगें। देर सवेर हो ही जाती है आएंगें ज़रूर। आखिर हम उनके पुराने भक्त है। यह सोच कर इन्तज़ार करते करते रात के एक बजे आँख झपक गई और सपना देखा कि हमारे ढाबे पर लोगों की लम्बी लाइन लगी है। नारद जी सान्ताक्लाज़ की तरह गुपचुप ढाबे की चिमनी से प्रगट हो काली घनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए पकवान का आनन्द ले टिप्पणी के खाली मोज़े में बढ़िया सा गिफ्ट डाल कर जा रहे है ।

इति प्रथम चरण समाप्त

Categories: बस यूँ ही

फिर आया सावन

July 23, 2006 · No Comments

फिर आया सावन फिर बरसा तेज़ पानी
नयनों में नमी दे गई फिर यादें कई पुरानी

वो पेड़ों पर पड़े झूले, वो बिछुड़े हुए साथी
झूलों की ऊँची पीगें, वो हँसी खनखनाती
वो लड़ना झगड़ना वो रूठना मनाना
वो पानी के जमाव को छपाक से उड़ाना
नानी की वो कहानी दादी के कथा किस्से
प्रसाद में बंटते हुए हलवे के कई हिस्से
वो मौज भरी मस्ती वो मीठी सी मनमानी
नयनों में नमी दे गई फिर यादें कई पुरानी

अँगीठी के अंगार पर वो भुनते हुए भुट्टे
वो चुरमुरा चबेना वो चूरन मीठे खट्टे
वो बहके से अंदाज़ में पानी में भीगना
वो सुड़सुड़ाती नाक वो सर्दी से छींकना
वो माँ के हाथ की बनी पीठी भरी कचौड़ी
अदरक की चाय साथ में गर्मा-गर्म पकौड़ी
महक उनके स्वाद की लाती है मुँह में पानी
नयनों में नमी दे गई फिर यादें कई पुरानी

बूंदों से बिखर गए है जो पलों के मोती
राखी की कच्ची डोर उन्हें फिर से है पिरोती
वो चिठ्ठी से बुलाना भैया का लेने आना
वो भाबी को छकाना वो खुल के खिलखिलना
जीवन की शरद् ऋतु में फिर आई है बहार
फिर हँसता हँसाता है मायके का वो दुलार
फिर महकती मिठाइयां फिर उड़ता पल्लू धानी
फिर इन्द्रधनुष दे गया सावन का झरता पानी

हर बरस आए सावन और जम के बरसे पानी
मन में उमंग भर दें फिर बातें नई पुरानी ।।

Categories: कविता