बापू की प्रतिमा बनवाएं आदर्शों की बलि चढ़ाएं दिल से विदेशी देसी परिवेष राजनीति ने बदला भेस रक्षक ही भक्षक बन जाएं नित नए हथकन्डे अपनाएं बदलें नीति दल और भेष ऐसे नेता रह गए शेष गली गली दंगे भड़काएं प्रजातन्त्र का बिगुल बजाएं ना कोई धर्म ना जाति विशेष ऐसे नेता रह गए शेष कुर्सी खातिर खून बहाएं देश का अंग-अंग बांट के खाएं काले कर्म हैं उजले वेश ऐसे नेता रह गए शेष घोर घोटाले घटित कराएं तििस पर स्वयं को सही बताएं रोज़ कचहरी होते पेश ऐसे नेता रह गए शेष उमर हमारी बड़ती जाए तारीख़ अगली पड़ती जाए निपटे हम, ना निपटे केस गर्दिश में गाँधी का देश कितनी हम तफ्तीश कराएं दूजा गाँधी ढूंढ ना पाएं गायब गाँधी,लाठी शेष गुमशुदा है गाँधी का देश राजनीति अब बनी है ज़िल्लत सही नेता की है बड़ी किल्लत नेतागीरि बस रह गई शेष गर्त गिरा गाँधी का देश ।। टैगः anugunj, अनुगूँज
Entries from June 2006
अनुगूंज२०- नेतागिरी, राजनीति और नेता
June 30, 2006 · 2 Comments
Categories: अनुगूंज
आई एम सौरी
June 29, 2006 · 1 Comment
शीशे सा दिल तोड़ दिया
बाद में सौरी बोल दिया
शीशा कब जुड़ पाता है
प्रतिबिम्ब तक बंट जाता है
नज़र दरारें आती है
किरचें भीतर धंस जाती है
आँख में जब आँसू है आता
मन का कोना भीग सा जाता
मन की सीलन सालेगी
रिश्ते को दीमक खा लेगी
कब तक चाहत टालेगी
कब तक प्रीत संभालेगी
कैसे मन की बात बताएं
कैसे उनको हम समझाएं
तोहफ़ों से नहीं खाइयां पटती
मन की चोटें यूँ नहीं मिटती
चुभन तो टीस उठाती है
चोटें नासूर बनाती है
नासूर जो हद से बड़ता है
तन का कोइ अंग भी कटता है
उस अंग की कमी सताती है
तब याद घड़ी वो आती है
जब पहली चोट लगाई थी
और प्यार की नींव हिलाई थी ।।
Categories: कविता
दास्ताने-काश्मीर
June 29, 2006 · 4 Comments
जहाँ नभ से दिल की बातें कहती
चिनार की लम्बी कतार थी
लाल गुलाबी नीले पीले
फूलों की भरमार थी
जहाँ झर झर झरते झरनों की
झाझंर में झनकार थी
केसर की कलियों से महकी
बहती मन्द बयार थी
जहां चाँद से चेहरों की चितवन में
इक विश्वास समाया था
उस वादी में स्वयं सृष्टि ने
आकर स्वर्ग बसाया था
वही सृष्टि है वही नज़ारे
वही काश्मीर की धरती है
पर फ़िरन धर्म का पहन ज़िन्दगी
मौत का तांडव करती है
दो रंगों के फूलों में
खिंची आज तलवार है
नफरत की आँधी में बदली
ठन्डी मन्द बयार है
नभ से अब शर्मसार हुए है
ऊँचे पेड़ चिनार के
झर झर झरते झरने मानो
करते है चित्कार से
ज़ाफरान के खेतों में
बारूद बनाया जाता है
नींद नहीं जो आती तो
गोली से सुलाया जाता है
चाँद से चेहरों की चितवन में
अब इक ख़ौफ समाया है
सृष्टि के इस अतुल्य स्वर्ग को
असुरों ने नरक बनाया है ।।
Categories: कविता
देखो कैसा खिलखिलाया है चाँद
June 27, 2006 · 4 Comments
पेड़ो के पीछे से
बादल के नीचे से
अम्बर पर देखो
निकल आया है चाँद
आँचल ढलकाए
जुल्फें बिखराए
बिस्तर पर लेटा
अलसाया है चाँद
ये मेरा प्रतिबिम्ब है
या मेरा प्रतिद्वन्दी
देखकर परस्पर
भरमाया है चाँद
पूनम की रात है
तारों का साथ है
किस्मत पर अपनी
इतराया है चाँद
फैला उजियारा है
पिया से हारा है
हरकत पर अपनी
शर्माया है चाँद
वक्त बदल जाएगा
कल रूप ढल जाएगा
भीतर ही भीतर
घबराया है चाँद
कल किसने देखा है
ये पल तो उसका है
सोचकर यह सच
मुस्काया है चाँद
देखो कैसा खिलखिलाया है चाँद
आज कुछ ज्यादा निखर आया है चाँद ।।
Categories: कविता
वक्त के पड़ाव
June 25, 2006 · 3 Comments
कई रोज़ से परिचर्चा की कड़ाही में प्रतिक्रियायों की आँच पर टी. वी
सीरियलज़ की गर्मागर्म भजिया तली जा रही थी । एकता कपूर द्वारा
पकाए गए बाला जी के प्रसाद के प्रति भक्तों की रुचि कुछ अधिक
ही थी तो भजिया खाने और प्रसाद का स्वाद चखने को हम भी लाइन
में लग लिए ।पर जब तक अपना नम्बर आया आँच मन्दी हो गई थी
भजिया ठन्डी हो गई थी और प्रसाद के नाम पर मिली केवल उसकी
खुशबू । हमने भी इसे हरि-इच्छा और भाग्य का लेखा मान खुशबू को ही
नासिका पथ सेे मस्तक तक पहुँचा दिया । अब बाला जी के प्रसाद की
महिमा तो जगज़ाहिर है पर उसकी गन्ध तक ने क्या कमाल किया ,इसका
पूरा हाल विस्तार से सुनाते है ।धीरज धरिएगा, सफर कुछ लम्बा
है ,कथा घिसी-पिटी और बाँचनेे वाला- अब क्या कहें ——–
साल दर साल भांति रेत हाथ से फिसल गए
बीती कितनी रातें न जाने कितने दिन निकल गए
साहब सफलता की अनेकों सीड़ी चड़ गए
बच्चे बड़े होकर मेरे घोंसले से उड़ गए
हर किसी की नई राह इक नया आयाम था
मेरे चारों ओर फैला ऐश-ओ-आराम था
नहीं थी जिसे पल भर फुरसत
आज वो बेकार था
धीमे धीमे रेंगती घड़ी की
सुईयों से बेज़ार था ।
करने को नहीं था कुछ भी
वक्त कटता नहीं था काटे
सोचा सीरियल के पात्रों से
सुख-दुख ही अपना बांटे
पर था हर सीरियल का
बस एक सा ही रंग
रहते थे सारे नायक
दूजी स्त्रियों के संग
देख कर यह कारीगिरी
लगा हमको एक झटका
जाकर हमारा ध्यान
साहब की हरकतों पर अटका
सरल सुशील पति के
अजब लगने लगे ढंग
बेवजह की जिरह से
आखिर हो गए वो तंग
बोले,”इस ईडियट-बोक्स ने
अक्ल कर दी है तुम्हारी मन्द
करो काम कायदे का
और टी.वी रखो बन्द”
टी.वी किया बन्द
सोचा रिसर्च करें जारी
पर गृहस्थि की गर्त में थी
खो गई पिछली पढ़ाई सारी
पढ़ना हुया गुल तो
आई लिखने की बारी
कुछ ही दिनों में हमने
कई पैन्सिलें घिस मारी
मन लगा कर सुने जो
अब कविताएं सारी
मिलेगा ऐसा कौन
थी कठिनाई भारी
अन्त में बेचारे
पतिदेव ही फंसे
सुनकर हमारी रचना
बड़ी ज़ोर से हंसे
हंसी की उस कटार से
कुछ ऐसे कट गए
साहित्य के रण-क्षेत्र में
अब जम के डट गए
तपस्या हमारी देखकर
भगवन् को तरस आया
देवदूत भेज कर
रस्ता नया सुझाया
अन्जाने उस संसार में
जो बढ़ने लगे कदम
घड़ी की ओर ताकना भी
अक्सर भूले हम
नई सोच नए दृष्टिकोण
हमें सूझने लगे
समय की लहरों से
हंसकर हम जूझने लगे ।।
सौ बातों की एक बात, बाला जी की कृपा से एक नई शुरूवात हुई,
आप लोगों से मुलाकात हुई,मुफ्त में इतनी बात हुई,इसलिए हम तो हाथ जोड़ेगें
और बुलन्द आवाज़ में कहेंगे —बाला जी की जय !!!!
Categories: बस यूँ ही









