संसकृतियां दो ,आदमी एक-जैसे ही पढ़ा तो शोले के गब्बर सिहं का चर्चित जुमला, “आदमी तीन और गोलियां छ:,बोहूत बेइन्साफी है” दिमाग में कौंध गया । दिमाग को झटक कर जब अभिनव जी के विचार पढ़े तो हम भी गब्बरमय हो गए और बोल उठे –”संसकृतियां दो और आदमी एक-बहुत नाइन्साफी है ।” पर साहब,ध्यान से देखिए, यह ज़िन्दगी भी तो एक नाइन्साफी है । अच्छे खासे एडम बाबा ईव बा के साथ मस्ती काट रहे थे पर जाने क्या सूझी सेब तोड़ खा लिया औऱ फोकट में आने वाली नस्लों को धरती पर तमाम नाइन्साफिय़ों के बीच पिसने को ठेल दिया ।अब जब हम सब इस जिन्दगी को झेल रहे है तो दो संसकृतियों की क्या बिसात है, हँसकर ,रोकर, कुछ लेकर,कुछ देकर निपटारा कर ही देंगे । बस जरा यह पता चल जाए कि संसकृति है किस चिड़िया का नाम । शब्दकोश उठा कर देखा तो पाया संसकृति “आचरणगत परम्परा” को कहते है,यानि वह आचरण जो परम्परा से मिला है या वो सोच जो जीवन मुल्य बन परम्परा के रूप में हमारे पास आई है। दूसरे शब्दों में संसकृति पीड़ीयों से चली आ रही सोच या आचरण का वह पुलिन्दा है जिसका भारी भरकम बोझ हमारे कन्धों पर पैदा होते ही रख दिया जाता है तथा जिसे ढो कर हमें अगली पीड़ी तक ले जाना है। किसी भी सभ्यता कौम या जाति का आचरण उसके पनपने के स्थान की भुगोलिक, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों पर बेहद निर्भर करता है। एक इन्सान परिस्थितियों के अनुसार ही ढलता है और उसका वही आचरण धीरे धीरे परम्परा बन संसकृति का रूप धर लेता है । अर्थात वर्तमान आचरण भविष्य़ में संसकृति कहलाएगा और क्योंकि प्रत्येक स्थान के वासियों का आचरण भिन्न है अत: यह धरती दो नहीं अपितु अनेक संसकृतियों की हांडी है । मैं तो यहाँ तक मानती हूँ कि एक परिवार,जो संसकृति के विराट स्वरूप की सबसे छोटीईकाई है, की अपनी एक विशेष संसकृति है जो भिन्न होते हुए भी मूल रूप से मुख्य संसकृति से जुड़ी हुई है । हर संसकृति अपने भीतर अच्छाईयों और बुराीईयों को समेटे सम्पूर्ण है,जरूरत केवल उसकी अच्छाीईयों को अपना कर, बुराईयों को नज़र-अन्दाज कर उसके मूल रूप को समझने और जानने भर की है । यहाँ पर बात क्योंकि केवल दो संसकृतियों की है और अभिनव जी का इशारा पूर्वी और पश्चिमी संसकृति की ओर है तो हम अब इसी विषय पर आते है । एक ओर तो वे प्रवासी भारतीए या एशियाई है जो पश्चिमी संसकृति के बीच रहकर अपनी धरोधर को सुरक्षित रखने का यत्न कर रहे है और दूसरी तरफ़ वे अप्रवासी जो अपनी संसकृति के दुर्ग में रह कर भी संसारीकरण के कारण उनके घरों में घुसी चली आ रही पश्चिमी आँधी से परेशान है । जहाँ तक प्रवासी जन का सवाल है तो मैं अभिनव जी के इस कथन से सहमत नहीं हूँ कि वे अपनी संसकृति से जुड़े है, बल्कि मेरे विचार से क्योकि वे अपनी संसकृति की मुख्य धारा से कटे हुए है, इसीलिए अपने साथ ले गये संसकारों को संजो कर रखना चाहते है,अपने देश से दूर रहकर उनके लिए अपनी संसकृति का महत्व बड़ गया है तभी वे उसका बीज अपनी सन्तानों में रोपित कर विदेशी धरती पर अपनी संसकृति का पौधा लगा रहे है,पर क्योंकि धरती और वातावरण भिन्न है अत: वास्तव में वे एक नई ससंकृति को जन्म दे रहेे है जििसका सम्बन्ध केवल मानवता से है और जिसका मूलभूत सिंद्दान्त केवल व्यक्तिगत आचरण है अर्थात एक व्यक्ति का संसकारी होना अधिक महत्व रखता है फिर चाहे वह किसी भी संसकृति का क्यों न हो । यही नहीं प्रवासी भारतीए पश्चिमी सभ्यता के लिए पूर्वी संसकृति के प्रतीक चिन्ह बन पश्चिमी जगत को अपनी ओर आकर्षित कर रहे है। हिन्दी भाषा की ओर रूची,हमारे रीति-रिवाजों अनुसार विवाह की चाह, हमारे प्रचीन ग्रन्थों पर शोध, धार्मिक अनुष्ठानों में हिस्सेदारी,वेषभूषा और खानपान के प्रति उत्सुकता ये सब उस नई संसकृति की नीवं को पुख्ता कर रहे है । विदेश भ्रमण से वापिस लौटते समय मेरी मुलाकात एक ऐसे अमरीकी परिवार से हुई जो भारत में पिछले कई वर्षों से केवल इसलिए रह रहा है, क्योंकि वह अपने बच्चों में भारतीए संसकार देखना चाहता है। नज़र घुमा कर देखें तो ऐसी कई नारियां पाएंगेै जो पश्चिम में पलने बड़ने के बाद भी भारतीए नागरिकों से विवाह कर पूर्णतया हमारी संसकृति में रंग गई है। कल ही का समाचार है कि एक विदेशी महिला ने जगन्नाथ मन्दिर -पुरी के रख-रखाव के लिए १.७८ करोड़ का दान दिया है ।अर्थात पश्चिम ही नहीं पूरब भी पश्चिम पर छा रहा है । अब बारी आती है अप्रवासीयों की दुविधा की । इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो जब भारत में अंग्रेज़ी पढ़ाने का चलन हुया था तो कितना हो-हल्ला मचाा था पर आज इसी भाषा को अपनाने की उदारता के चलते हम संसार में अपनी पैठ बना पाए है । शिक्षा का प्रसार,सामान अधिकार,अधिकार के प्रति सजगता,नारी उत्थान ये सब पश्चिम की ही देन है । यह सही है कि बेशर्मीी की हद तक खुलापन हमारी नींदें उड़ा रहा है पर नई पीड़ी इस खुलेपन के बीच पल बढ़ रही है,अत: यह उनकी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। बिल्कुल वैसे ही जैसे प्रेम-विवाह ,लड़के-लड़कियों का खुले-आम बेहिचक मिलना, हमारे लिए आम है,जबकि बीती पीड़ी के लिए यह सब नागवार था । हर पीड़ी को सही और गलत में फरक करने की अक्ल विरासत में मिलती है वो खुद ही अपनी राह खोज लेती है। हमें तो केवल उसे सही -गलत का नाप तोल सिखाना है। संक्षेप में पूरब और पश्चिम अपनी सीमाएं तज एक दूसरे की ओर निकल पड़े है,एक आगे बड़ रहा है दूजा चरम सीमा पर पहुँच लौट रहा है,– ” कुछ हम बदल रहे है, कुछ वो बदल रहे है, खुशी तो है इस बात की, किसी मुकाम पर मिल रहे है ।” पर जब तक दोनों उस मुकाम तक नहीं पहुँचते तब तक हम क्या करें,हम तो दोनों धारायों में गोते खाते तिनके का सहारा ढूँढ रहे है। पर ध्यान से देखिए दोनों संसकृतियों के मूल सिद्धान्तों से बना जहाज़ हमारे सामने खड़ा है, अब उस परसवार होना है तो अपने संसकारों के पुलिन्दे का अनावश्यक बोझ तो कम करना ही पड़ेगा । घबराइए मत, जिस प्रकार हम अपनी पुराने संसकारों की नौका में ज़रूरत भर के बदलाव कर यहाँ तक लाए है, नई पीड़ी भी संभल कर अक्लमंदी से इस जहाज़ को एक ऐसी बन्दरगाह पर ला खड़ा करेगी,जहाँ होगी— एक संसकृति,एक आदमी । दूध का दूध, पानी का पानी । कोई बेइन्साफी नही । पर होगीं नई परेशानियां ,कठिन चुनौतियां ,वे भी हमारी तरह ही बड़बड़ाएगें । क्योंकि उन्हें भी तो आखिर उस खाए सेब की कीमत चुकानी है । . टैगः anugunj, अनुगूँज
Entries from May 2006
अनुगूँज १९-संसकृतियां दो, आदमी एक
May 17, 2006 · 8 Comments
Categories: अनुगूंज
भारत चमक रहा है
May 15, 2006 · 8 Comments
चुनाव की थी तैयारी
विचार विमर्श हुया जारी
समस्या थी विकट
किस को दें टिकट
जो दल की स्थिती सुधारे
और नैया पार उतारे
आडवानी ने धीरे से
चाँद अपनी सहलाई
गोया दु:खती रग दिखलाई
बोले—
इन्द्रा जी की बड़ी बहू ने
किया नाक में दम
इस विदेशी ताकत से
अब कैसे निपटें हम
तिस पर वोटर चाहते है
कि तारे तोड़ कर लाओ
वरना सीधे-सीधे बच्चू
गद्दी छोड़ कर जाओ ।
यह सुनते ही अटल जी
कवि चिंतन से जागे
सरके थोड़े आगे
अनमोल वचन ये दागे
“हम श्री राम के है भक्त
भए उनकी कृपा सशक्त
सो अपना वचन निभाएंगे
तारे ला दिखलाएंगे
जब इतने सिने सितारे है
टी.वी. पर ढेरों तारे है
अपने तो वारे न्यारे है
फिर क्यों थक कर सब हारे है।
देख अटल के अटल इरादे
सब को हिम्मत आई
और चाँदनी-चौंक की टिकट
श्रद्धा से तुलसी की भेंट चढ़ाई
सोचा–
बहू है देश के टी.वी. की
नहीं अमेठी, राएबरेली की
परिवार की लाज बचाएगी
सोनिया को सबक सिखाएगी
स्वपन-सुन्दरी को फिर सबने
राज कमल भिजवाया
हेमा के संग फ्री में उन्होंने
धर्म-सम्राज्य भी पाया
सोनिया जी यह चाल देखकर
मन ही मन झुंझलाई
उनके पति की चाल गई थी
उन पर ही आज़माई
शुरू हुई फिर अभिनेता को
नेता करने की होड़
हर इक टोपी लेकर दौड़ा
बौलीवुड की ओर
प्रोडूयसर को धता बता कर
बुक की सब तारीखें
किसी को दुगनी कीमत दे दी
और किसी को टिकटें
फेंक मुखौटा अभिनेता भी
खालिस नेता बन बैठे
करेला कदाचित् नीम चढ़े तो
क्यों न कुछ कुछ ऐंठे
आखिर उनकी चमक से ही तो
भारत चमक रहा है
ना जाने क्यों चिरकुट वोटर
फिर भी सिसक रहा है ।।
Categories: कविता
माँ का पैैगाम ,बेटे के नाम
May 13, 2006 · 10 Comments
मातृ दिवस के उपलक्ष्य में माँ के गौरव में अनेक शब्द कहे गए।उसे नमन किया गया, सलाम भेजा गया और ईश्वर का फरिश्ता माना गया , पर एक माँ का अपने बेटे की जुदाई में क्या हाल होता है,उसका दिल कैसे रोता है ,यह चित्रण मैने निम्न पंक्तियों में करने का यत्न किया है—–
एक स्वपन आँख में आया था
मैने कोख में उसे छुपाया था
पर कुछ दिन भी न छिप पाया
झट गोद में आकर मुस्काया
हंसी खेल में गोद से भी खिसका
मेरा आँचल थाम ज़रा ठिठका
फिर आँचल तक सिर से फिसला
जब घर से बाहर वो निकला
थी चाह कि वो उड़ना सीखे
जब उड़ा तो क्यों नैना भीगे
उसके जाने पर घर मेरा
क्यों लगता भुतहा सा डेरा
घर में बिखरी उसकी चीज़ें
पैन्ट पुराने कसी कमीज़े
टूटे खिलौने बदरंग ताश
बने धरोहर मेरे पास
मुस्काती उसकी तस्वीरें
जब तब मुझे रूलाती है
उसकी यादें आँसू बन कर
मेरे आँचल में छुप जाती है
फोन की घन्टी बन किलकारी
मन में हूक उठाती है
पल दो पल उससे बातें कर
ममता राहत पाती है
केक चाकलेट देख कर पर
पानी आँखों में आता है
जाने क्योंकर मन भाता
पकवान न अब पक पाता है
भरा भगौना दूध का दिन भर
ज्यों का त्यों रह जाता है
दिनचर्या का खालीपन
हर पल मुझे सताता है
कब आएगा मुन्ना मेरा ?
कब चहकेगा आँगन ?
कब नज़रो की चमक बढ़ेगी ?
दूर होगा धुँधलापन ????
Categories: कविता
नारी के मनोभाव
May 11, 2006 · 7 Comments
कहने को यह घर है मेरा, अपना कोना कोई नहीं
सेज सजी है फूलों से पर, नरम बिछौना कोई नहीं
दिल में दर्द छुपा है बेहद, आँखें खुल कर रोई नहीं
जाने क्यों मुझे पड़ी काटनी, वो फ़सलें जो बोई नहीं
जिनके तन का टुकड़ा थी,मैं उनके लिए पराई थी
श्वसुर गृह के लिए सदा ही,दूजे घर की जाई थी
बरसों तक इक नाम को लेकर, मैंने पहचान बनाई थी
वो पहचान क्यों सप्तपदी की सीमा लांघ न पाई थी
प्रकृति ने मुझको सोंपा था, वंश वृद्धि का अदभुत काम
किन्तु जुड़ा न वंशावली संग, उसकी जन्मदाती का नाम
आश्रय दान के बदले में मुझसे छिन गए अधिकार तमाम
अपनी सींचित सन्तानों को , दे न पाई मैं अपना नाम
देवी का दर्जा तो मिला, पर देवी का सम्मान नहीं
शायद नारी में अपना किंचित सा भी स्वाभिमान नहीं
उद्वेलित मन के लावे में क्यों आता उबाल नहीं
धैर्यधारिणी के भीतर कहीं छुपा तो कोई भूचाल नहीं ।।
Categories: कविता
मसाले वाली चाय
May 7, 2006 · 9 Comments
कई दिनों से रत्ना की रसोई में health food पक रहा है, यानि नपा-तुला और शक्तिदायक तत्वों से भरा हुया । बेचारे मेहमान तो तरीफ़ कर खा रहे है पर पकाने वाली ज़रा बोर हो गई और सोचा कि क्यों न कुछ चटपटा व्यंजन पकाया जाए। खूब कैलोरी/शब्दों से भरपूर । अब हमारे पकवानों को परोसने के लिए डिनर-सेट (computer set) और उसकी प्रयोग विधि क्योंकि पति-देव की देन है सो इस बार उनकी पसंद पर कुछ पक रहा है , वैसे मसालेदार चाय और गर्मा-गर्म पकौड़े तो सभी को अच्छे लगते है ,फिर देर किस बात की ,बस आप भी लुत्फ़ उठाइए ।
परसों सुबह ज्यों ही आँखें हमने खोली
फोकस में थी आई पति की सूरत भोली
खिड़की से दिखता आकाश,नयन रहे थे नाप
अजीब से तेवर लिए, बैठे थे चुपचाप
अख़बार और चाय बिना चेहरा था मुरझाया
हालत उनकी देखकर हमें उन पर तरस आया
पूछा हमने प्यार से,”क्यों जी ,चाय पीएंगे?”
बोले,”बिना तुम्हारे हम किस तरह जीएंगे”
यह सुनते ही हमें हुया खुद पर कुछ अभिमान
अपनी धुन में करने लगे हम अपना गुणगान्
“जानते है जानम्,प्यार हमें हो करते
हमसे बिुछड़ने का सोच कर हर दम रहे हो डरते
तभी तो हमारी मौत का देखा है बुरा सपना
न गमगीन हो ,न दुखी हो, न जी जलाओ अपना
सपने भी साहब कभी होते है सच्चे
सपने देखकर तो घबराते है बच्चे
कसम तुम्हें हमारी हमसे न छुपाओ
क्या सोच रहे हो ज़रा हमें भी बताओ”
देखा दाएं बाएं थोड़ा हिचकिचाए
मूँछो में मुस्काते बोल ये फरमाए-
“कसम दी है तुमने तो सच कह रहे है
वरना गुलाम बन हम सालों से रह रहे है
तुम्हारे जाने का होगा यकीनन् बहुत ही गम
पर वो रोने धोने से हो पाएगा न कम
हमारी तड़प देखकर तड़पेगी रूह तुम्हारी
तुम्हें कष्ट दें यह फितरत नहीं हमारी
यही सोच जानम् खुशी से हम जीएंगे
जाम ज़िन्दगी का लुत्फ़ ले पीएंगे
अपने घर में लेंगे खुल कर हम अंगड़ाई
आखिर उमर कैद से छुट्टी है हमने पाई
सुबह-सुबह पार्क में करेंगे रोज़ कसरत
हसीनों को वहाँ देखने की पूरी होगी हसरत
कुछ भी हम करेंगे न कोई देगा ताने
पेपर पलंग पर पटक कर घुस जाएंगे नहाने
दोस्तों संग घर पर अपने शामें हम बिताएंगे
बारी-बारी उनके घर पर दावतें उड़ाएंगे
अपना कमाया पैसा करेंगे खुद पर खर्च
ख़ुदा न करे हो गया जो हमें कोई मर्ज़
तो झट से हो जाएंगे हम हस्पताल भर्ती
भली लगेंगी नर्सें हरदम सेवा करती
मिलेगी भाभियों से हरदम सहानुभूति
उस आनन्दमयी समय की क्या सुखद है अनुभूति
ऊपर तुम रहोगी देवी- देवता के साथ
नीचे हम थामेंगे किसी अप्सरा का हाथ”
उनके ख़्याली द़ेग में
पुलाव पक रहा था
जलन की ज्वाला से
हमारा दिल दहक रहा था
खांसे हम खांसी झूठी
तो तन्द्रा उनकी टूटी
हकीकत में वापिस आए
घबरा कर बड़बड़ाए-
“चलो,हटो,छोड़ो,
यूँही वक्त ना गवांओ
जाकर ज़रा गर्मा-गर्म
चाय तो ले आओ
सच कहती हो सपने
कभी होते नहीं सच्चे
सपने देखकर तो
खुश होते है बच्चे”
पाँव पटक कर हमने
ऐसी चाय थी पिलाई
आज़ तलक तक जिनाब़ को
नींद ही न आई ।।।
Categories: बस यूँ ही









